
बुराइयों का पुतला… भारत भूमि वीरों की भूमि हैं। यह तपोभूमि हैं। साधु संतों और ऋषि मुनियों कि भूमि हैं। फिर भला बुराइयों को छोडने में आनाकानी क्यों। जैसे कडवी दवा हम धीरे धीरे लेते हैं… पढ़ें जोधपुर (राजस्थान) से सुनील कुमार माथुर की कलम से…
इंसान को वही कार्य करना चाहिए जो ईश्वर को स्वीकार हो। ठीक उसी प्रकार भगवान को वही भोग लगाएं जो उसे स्वीकार हो। इंसान तो बुराइयों का पुतला हैं। उसमे ढेरों बुराइयां हैं। अगर वह चाहे तो धीरे धीरे वह इन बुराइयों से मुक्त हो सकता हैं और फिर आराम से ईश्वर की भक्ति में अपना समय देकर जीवन को खुशहाल बना सकता हैं। बस इन बुराइयों से छुटकारा पाने के लिए उसे दृढ संकल्प लेना होगा.
भारत भूमि वीरों की भूमि हैं। यह तपोभूमि हैं। साधु संतों और ऋषि मुनियों कि भूमि हैं। फिर भला बुराइयों को छोडने में आनाकानी क्यों। जैसे कडवी दवा हम धीरे धीरे लेते हैं, ठीक उसी प्रकार पहले छोटी छोटी बुराइयों का त्याग करे ताकि मन दुखी न हो फिर धीरे धीरे बडी बडी बुराइयों का त्याग करे। आपके चाहने से सब कुछ हो सकता हैं। बस हम प्रयास नही करते हैं।
शराबी कहता है कि क्या करे शराब छूटती ही नहीं हैं उसने हमें पकड रखा हैं जबकि हकीकत यह है कि आपने शराब को पकड रखा हैं और छोडना ही नहीं चाहते है। मन तो एकदम गंगा के जल की तरह पवित्र होना चाहिए। जब भी किसी के साथ बात करें तब विनम्रता के साथ बात करें। अंहकार में आकर नहीं। ईश्वर सर्वत्र हैं फिर भी आज का इंसान अपराध कर रहा हैं। वह भी निर्भय होकर। यह कैसी विडम्बना है।
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इससे स्पष्ट होता है कि आज के इंसान का नैतिक पतन इतना हो चुका है कि वह सही गलत को भी ताक पर रख बैठा है। उसका दिनों दिन नैतिक व चारित्रिक पतन होता जा रहा है। जैसे रोग को मिटाने के लिए दवा आवश्यक है। ठीक उसी प्रकार इंसान को संस्कारवान बनाने के लिए कथाओं का आयोजन होना नितांत आवश्यक है। चूंकि कथावाचकों की वाणी ईश्वर की वाणी होती है।
उनके मुख से बोली गई वाणी हमारा कल्याण कर सकती हैं। लेकिन आज इंसान का इतना चारित्रिक पतन हो गया है कि वह मंदिरों और पूजा स्थलों से देवी देवताओं कि मूर्तियां, उनके छत्र, गहने, दानपेटी, नगाडे, पूजा के बर्तन, टंकोरा, घंटी, लोठा व मंदिर परिसर में लगे नल तक चुराने लगा है जो शर्मनांक बात हैं।
ऐसे आपराधिक प्रवृति के लोग व उनके सहयोगी तथा परिजन कभी भी सुखी नहीं रह सकते। ईश्वर सब देखता है और ऐसे दुष्ट लोगों को दंड अवश्य ही देता हैं। भगवान के यहां देर है पर अंधेर नहीं।
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