बूढ़ा दिसम्बर, सदी को 20 तैईसवां बरस लग रहा है। दि–दिलों का सं– संबन्ध ब– बरकरार र–...
साहित्य लहर
कविता : सबकी प्यारी गुडिया, नाना-नानी कहने लगे देखों घर में दो दो गुडियां, एक गुडिया छुटकी है...
कविता : समझ, समझदारी से अगर कुछ समझ आया भी, तो इसे समझ का नाम-ओ-निशां न समझ, तेरी...
कविता : मेरी नजर में, सुनहरी किरणों का कोमल जाल अरी सुंदरी अब बीत जाएगा यह साल जो...
कविता : इस नए साल में क्या लिखूं, कंबल विहीन का शीत लिखूं, या गर्म रक्त की...
कविता : जाता हुआ दिसंबर, आओ समेट लो खुशियां तुम, मना लो त्यौहार मैं जा रहा हूं!, आने...
कविता : सच सच कह दिया, जाग कर चांदनी रातों में खत जो लिखे। ख्याल मन में जो...
कविता : उजियारा, हम उसी वक्त से अब तक रहे समाये यारों की यह बस्ती आज खौफ...
कविता : फर्क, भर आते हैं नैन! लुट जो गये हैं चैन दुश्मन देश की दुल्हा वाली.....
होठों से वो गीत छूट ही गया, मैं भी चल पड़ा मिलने! होंठों को सुना न आंखें...














