
भरसार विश्वविद्यालय में किसानों की आय बढ़ाने के उद्देश्य से कृषि एवं बागवानी फसलों में जैविक प्रणाली के अंतर्गत समेकित रोग एवं कीट प्रबंधन विषय पर तीन दिवसीय क्षमता संवर्धन प्रशिक्षण कार्यक्रम शुरू हुआ। 13 गांवों के 25 कृषकों को आधुनिक वैज्ञानिक एवं पर्यावरण-अनुकूल खेती की तकनीकों का प्रशिक्षण दिया जा रहा है। कार्यक्रम का आयोजन हिम्मोत्थान सोसाइटी, देहरादून के सहयोग से किया जा रहा है।
- भरसार विश्वविद्यालय में किसानों को आधुनिक जैविक खेती का प्रशिक्षण
- समेकित रोग एवं कीट प्रबंधन पर तीन दिवसीय कार्यशाला शुरू
- 13 गांवों के 25 किसान सीख रहे टिकाऊ कृषि की तकनीक
- किसानों की आय बढ़ाने के लिए विश्वविद्यालय की नई पहल
देहरादून। किसानों की आय में वृद्धि, जैविक खेती को बढ़ावा देने तथा कृषि एवं बागवानी फसलों को रोग एवं कीटों से सुरक्षित रखने के उद्देश्य से वीर चन्द्र सिंह गढ़वाली उत्तराखण्ड औद्यानिकी एवं वानिकी विश्वविद्यालय के पर्वतीय कृषि महाविद्यालय, रानीचैरी परिसर में तीन दिवसीय क्षमता संवर्धन प्रशिक्षण कार्यक्रम का शुभारंभ किया गया। 28 से 30 जुलाई 2026 तक आयोजित इस प्रशिक्षण कार्यक्रम का आयोजन पादप रोग विज्ञान विभाग द्वारा हिम्मोत्थान सोसाइटी के सहयोग से किया जा रहा है।
विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. भगवती प्रसाद भट्ट के दिशानिर्देशन, वानिकी महाविद्यालय एवं पर्वतीय कृषि महाविद्यालय के अधिष्ठाता प्रो. (डॉ.) तारा सिंह मेहरा तथा निदेशक शैक्षणिक डॉ. अरविंद बिजल्वाण के मार्गदर्शन में आयोजित इस कार्यक्रम का विषय “कृषि एवं बागवानी फसलों में जैविक प्रणाली के अंतर्गत समेकित पादप रोग एवं कीट प्रबंधन” रखा गया है। प्रशिक्षण का उद्देश्य किसानों को आधुनिक वैज्ञानिक, जैविक एवं पर्यावरण-अनुकूल कृषि तकनीकों से जोड़ना है, जिससे उत्पादन बढ़ाने के साथ-साथ खेती की लागत कम हो और किसानों की आय में वृद्धि हो सके।
कार्यक्रम का समन्वयन पादप रोग विज्ञान विभाग की विभागाध्यक्ष डॉ. लक्ष्मी रावत द्वारा किया जा रहा है। सह-समन्वयक के रूप में डॉ. तौफीक अहमद तथा डॉ. अंकित टम्टा कार्यक्रम के संचालन में सहयोग प्रदान कर रहे हैं। उद्घाटन सत्र में हिम्मोत्थान सोसाइटी, देहरादून के प्रतिनिधि डॉ. अक्षित कुकरेती एवं संदीप रतूड़ी भी विशेष रूप से उपस्थित रहे।
तीन दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम में थलीसैंण, मालदेवता, जड़ीपानी, देवाल, उत्तरकाशी तथा दुगड्डा क्लस्टरों के अंतर्गत चयनित 13 गांवों से कुल 25 कृषक प्रतिभागी हिस्सा ले रहे हैं। प्रशिक्षण के दौरान किसानों को कृषि एवं बागवानी फसलों में रोग एवं कीटों की पहचान, उनके समेकित एवं जैविक प्रबंधन, जैविक संरक्षण उपायों तथा पर्यावरण-अनुकूल खेती की नवीनतम तकनीकों की जानकारी दी जा रही है। साथ ही उन्हें सुरक्षित, टिकाऊ एवं लाभकारी कृषि पद्धतियों को अपनाने के लिए भी प्रेरित किया जा रहा है।
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि के रूप में निदेशक शैक्षणिक डॉ. अरविंद बिजल्वाण ने किसानों को संबोधित करते हुए कहा कि आधुनिक वैज्ञानिक तकनीकों और पारंपरिक ज्ञान के समन्वय से ही कृषि को अधिक लाभकारी बनाया जा सकता है। उन्होंने किसानों से विश्वविद्यालय द्वारा विकसित नई तकनीकों को अपनाने और वैज्ञानिक खेती के माध्यम से उत्पादन बढ़ाने का आह्वान किया।
कार्यक्रम समन्वयक डॉ. लक्ष्मी रावत ने बताया कि प्रशिक्षण का प्रमुख उद्देश्य किसानों को केवल सैद्धांतिक जानकारी देना नहीं, बल्कि उन्हें व्यावहारिक प्रशिक्षण उपलब्ध कराना है ताकि वे अपने खेतों में जैविक एवं समेकित रोग-कीट प्रबंधन तकनीकों का प्रभावी उपयोग कर सकें। उन्होंने विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. भगवती प्रसाद भट्ट तथा अधिष्ठाता प्रो. तारा सिंह मेहरा के सतत मार्गदर्शन, प्रेरणा एवं सहयोग के प्रति आभार भी व्यक्त किया।
उद्घाटन सत्र में डॉ. आर. के. प्रसाद, डॉ. पंकज कुमार, डॉ. संजीव वर्मा, डॉ. संजीव रवि, डॉ. गिरीश दांगी, डॉ. अमन डबराल, डॉ. उदय भानु प्रताप, डॉ. शिखा टम्टा, डॉ. बिजेंद्र लाल, रजनी रमोला, ललिता, सौरभ रावत, नीलम नेगी तथा मुकेश कोठारी सहित 60 से अधिक वैज्ञानिक, कृषक एवं विश्वविद्यालय के अधिकारी एवं कर्मचारी उपस्थित रहे।
कार्यक्रम के आयोजकों ने बताया कि इस प्रकार के क्षमता संवर्धन प्रशिक्षण किसानों को नवीन वैज्ञानिक तकनीकों से जोड़ने, जैविक खेती को बढ़ावा देने तथा कृषि को अधिक लाभकारी और टिकाऊ बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ऐसे प्रशिक्षणों के माध्यम से उत्तराखंड के कृषकों को आधुनिक कृषि तकनीकों का लाभ मिलेगा, जिससे उनकी उत्पादकता बढ़ेगी और आय में भी सकारात्मक वृद्धि होने की संभावना है।






