
सिद्धार्थ गोरखपुरी

ऐ मेघ ले – ले जद में अपने
इस समूचे आसमां को
कर दे गर्मी शांत अब तो
उन्माद भरे इस तपिश की
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फिर दिखा दे इस जहाँ को
के निकल जाती है गर्मी
तपिश उतनी ही सही
जितनी कोई संभाल पाए
धूप के तेवर को ज़ेवर
पहना दे नम बूंदों की अबतो
धूल की विसात ही क्या
जो उड़ रही है खामखा
हवाओं को भी दे बता के
अधिकार तुझपे है अब मेरा
तूँ जब बहेगी नम बहेगी
अब यही है काम तेरा
पारे को भी दे बता के
अब चढ़ाई न चढ़ सकोगे
आ गए हम हैं जबसे
लाजमी है लुढ़कना तेरा
सूर्य की अठखेलियों पर
बस तनिक अंकुश लगाने
आ जा लेकर कारवाँ
जमकर भिगो दे इस धरा को







