- दीपावली पर बाजारवाद का प्रहार, कुम्हारों की आंखों में ठहरा त्योहार
- महंगाई और दिखावे की भेंट चढ़ती त्योहारों की परंपराएं
- मिट्टी के दीपकों से सोने-चांदी तक, बदल गई पर्वों की पहचान
- धन की चमक में खोती आस्था, निर्धन की खाली जेब पर कविता का प्रहार
डॉ. प्रियंका सौरभ
मिट्टी के दीपक गए, बिजली का बाजार।
कुम्हारों की आँख में, ठहरा है त्योहार॥
धन के आगे झुक रहा, आज मनुज का मान।
बाजारों ने बेच दी, पर्वों की पहचान॥
दीप जलें या धन जुटे, किसका है त्योहार।
महँगाई ने छीन ली, निर्धन की बाजार॥
धनवानों के पर्व में, निर्धन किसका साथ।
खाली जेबें पूछतीं, किस्मत की क्या बात॥
सोने-चाँदी की चमक, मन में भरा विकार।
रिश्तों की कीमत गिरी, ऐसा हुआ व्यापार॥
पर्व मनाने के लिए, कर्ज लिया दिन-रात।
दिखावे की होड़ में, बिगड़ी अपनी बात॥
धनतेरस का नाम ले, बिकता हर सामान।
आस्था की इस आड़ में, बढ़ता लाभ प्रधान॥
धन की पूजा हो रही, भूखा बैठा आज।
कैसा यह उत्सव हुआ, कैसा इसका राज॥
धन से ही पहचान है, कैसा यह संसार।
गुण और श्रम को भूलकर, धन का हो सत्कार॥
डॉ. प्रियंका सौरभ
पीएचडी (राजनीति विज्ञान) कवयित्री | सामाजिक चिंतक | स्तंभकार
उब्बा भवन, आर्यनगर हिसार (हरियाणा) – 125005
मिट्टी के दीपक, मिट्टी के दीपक पर कविता, दीपावली की कविता, कुम्हारों की आर्थिक स्थिति, दीपावली पर बाजारवाद, धनतेरस और महंगाई, त्योहारों में दिखावा, मिट्टी के दीयों का महत्व, डॉ. प्रियंका सौरभ कविता, सामाजिक व्यंग्य कविता




1 thought on “मिट्टी के दीपक गए, बिजली का बाजार : बदलते त्योहारों पर तीखा कटाक्ष”