- मोदी शासन के विवादित फैसले और जनता के सवाल
- विकास के दावों के बीच अधूरे वादों की कहानी
- सत्ता बड़ी, लेकिन जवाबदेही के सवाल भी बड़े
- देश को चाहिए भाषण नहीं, समस्याओं का समाधान
(राज शेखर भट्ट)
किसी भी लोकतांत्रिक सरकार का मूल्यांकन केवल उसके नारों, प्रचार अभियानों और उपलब्धियों के दावों से नहीं किया जा सकता। सरकार की वास्तविक परीक्षा इस बात से होती है कि उसके फैसलों का आम नागरिक के जीवन पर क्या प्रभाव पड़ा, आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों की स्थिति में कितना सुधार हुआ, युवाओं को कितने अवसर मिले और लोकतांत्रिक संस्थाओं की विश्वसनीयता कितनी मजबूत हुई। वर्ष 2014 में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र में सत्ता परिवर्तन के बाद देश ने कई बड़े नीतिगत फैसले देखे। इन फैसलों के समर्थकों ने उन्हें परिवर्तनकारी बताया, लेकिन अनेक निर्णयों और घटनाओं ने गंभीर सवाल भी पैदा किए। इन सवालों को किसी दल के पक्ष या विपक्ष की राजनीति से ऊपर उठकर देखना आवश्यक है।
मोदी सरकार के कार्यकाल की आलोचनात्मक समीक्षा करते समय यह ध्यान रखना चाहिए कि हर समस्या का एकमात्र कारण केंद्र सरकार नहीं होती। कुछ विषय राज्य सरकारों, वैश्विक परिस्थितियों, न्यायपालिका, प्रशासनिक संस्थाओं और लंबे समय से चली आ रही आर्थिक संरचनाओं से भी जुड़े हैं। फिर भी, जिस सरकार के पास राष्ट्रीय नीतियां बनाने, संसाधनों का वितरण करने और प्रमुख संस्थागत सुधार लागू करने की शक्ति होती है, उससे उसके फैसलों के परिणामों पर जवाब मांगना स्वाभाविक है। लोकतंत्र में बहुमत सरकार को शासन करने का अधिकार देता है, लेकिन उसे आलोचना से मुक्त नहीं करता।
नोटबंदी: काले धन पर प्रहार या अर्थव्यवस्था पर चोट?
8 नवंबर 2016 को रात में घोषित नोटबंदी मोदी सरकार के सबसे बड़े और विवादित आर्थिक फैसलों में शामिल रही। सरकार ने इसका उद्देश्य काले धन, नकली मुद्रा और आतंकवाद के वित्तपोषण पर अंकुश लगाना बताया था। अचानक पुराने 500 और 1,000 रुपये के नोटों को अमान्य किए जाने से देशभर में बैंक शाखाओं और एटीएम के बाहर लंबी कतारें लगीं। नकदी पर निर्भर छोटे कारोबारियों, दिहाड़ी मजदूरों और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को तत्काल कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। जिन लोगों की आजीविका रोजाना की कमाई पर निर्भर थी, उनके लिए यह फैसला विशेष रूप से चुनौतीपूर्ण साबित हुआ।
नोटबंदी के औचित्य पर सबसे महत्वपूर्ण सवाल तब उठा, जब भारतीय रिजर्व बैंक के आंकड़ों के अनुसार अमान्य किए गए नोटों का लगभग पूरा मूल्य बैंकिंग प्रणाली में वापस आ गया। इससे यह बहस तेज हुई कि काले धन की नकदी को समाप्त करने के घोषित उद्देश्य को कितनी सफलता मिली। सरकार के समर्थकों ने डिजिटल भुगतान, औपचारिक अर्थव्यवस्था और कर अनुपालन में वृद्धि को इससे जुड़े सकारात्मक परिणामों के रूप में प्रस्तुत किया। लेकिन इन लाभों के दावों के बावजूद यह सवाल कायम रहा कि क्या इतने बड़े आर्थिक व्यवधान से होने वाले नुकसान का पर्याप्त आकलन किया गया था और क्या ऐसे बदलाव को कम कठिनाई के साथ लागू किया जा सकता था।
नोटबंदी का सबक केवल एक आर्थिक फैसले तक सीमित नहीं है। जब किसी नीति का असर करोड़ों नागरिकों की रोजमर्रा की जिंदगी पर पड़ता हो, तब उसकी तैयारी, विकल्पों और संभावित दुष्परिणामों का गंभीर मूल्यांकन होना चाहिए। सरकार को यह बताना चाहिए कि किसी बड़े निर्णय के घोषित लक्ष्य कितने पूरे हुए और उसकी सामाजिक तथा आर्थिक लागत कितनी रही। देशभक्ति या राष्ट्रहित की भावना किसी नीति की प्रभावशीलता का विकल्प नहीं हो सकती। सही नीति वही है, जो घोषित उद्देश्यों को हासिल करने के साथ आम जनता पर अनावश्यक बोझ भी कम करे।
कोरोना महामारी: स्वास्थ्य व्यवस्था की कठिन परीक्षा
कोरोना महामारी के दौरान भारत ने अभूतपूर्व मानवीय संकट का सामना किया। विशेष रूप से 2021 में दूसरी लहर के दौरान कई शहरों से अस्पतालों में बिस्तरों, ऑक्सीजन, दवाओं और आवश्यक चिकित्सा सुविधाओं की कमी की खबरें सामने आईं। अनेक परिवार अपने परिजनों के उपचार के लिए भटकते रहे। महामारी ने देश की स्वास्थ्य व्यवस्था में मौजूद कमियों, सार्वजनिक स्वास्थ्य पर निवेश की जरूरत और आपातकालीन तैयारी की सीमाओं को उजागर कर दिया। यह संकट केवल भारत तक सीमित नहीं था, लेकिन उसकी गंभीरता ने केंद्र और राज्य सरकारों की तैयारी तथा समन्वय पर सवाल उठाए।
केंद्र सरकार की जिम्मेदारी थी कि राज्यों के साथ समन्वय स्थापित करके ऑक्सीजन, चिकित्सा उपकरणों और जरूरी संसाधनों की आपूर्ति को प्रभावी बनाया जाए। साथ ही, नागरिकों को समय पर विश्वसनीय जानकारी उपलब्ध कराई जाए और संक्रमण की संभावित लहरों के लिए तैयारी की जाए। महामारी के दौरान विभिन्न राज्यों की परिस्थितियां अलग थीं और स्वास्थ्य सेवाओं का बड़ा हिस्सा राज्य सरकारों के अधीन था। इसलिए हर कमी का दोष केवल केंद्र पर डालना तथ्यात्मक रूप से उचित नहीं होगा। फिर भी, राष्ट्रीय स्तर पर आपूर्ति, दिशा-निर्देशों और समन्वय से संबंधित निर्णयों की समीक्षा करना आवश्यक है।
इस संकट ने यह प्रश्न भी उठाया कि क्या स्वास्थ्य सुविधाओं को पर्याप्त प्राथमिकता दी गई थी। किसी भी देश की आर्थिक प्रगति का अर्थ तभी पूरा होता है, जब संकट के समय उसके नागरिकों को समय पर उपचार और आवश्यक सुविधाएं मिल सकें। महामारी के अनुभव से सबक लेते हुए सार्वजनिक अस्पतालों, ऑक्सीजन उत्पादन, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों, चिकित्सा कर्मचारियों और आपातकालीन प्रबंधन को मजबूत करना चाहिए। यदि संकट के बाद भी कमियों को दूर करने की गंभीर कोशिश नहीं होती, तो भविष्य में ऐसी त्रासदियों का जोखिम बना रहता है। सरकार की जिम्मेदारी केवल संकट के दौरान राहत देने की नहीं, बल्कि उससे सीखकर व्यवस्था को बेहतर बनाने की भी है।
किसान आंदोलन: कानून वापसी तक पहुंचा संघर्ष
केंद्र सरकार ने 2020 में कृषि क्षेत्र में बदलाव के उद्देश्य से तीन कृषि कानून लागू किए। सरकार का तर्क था कि इनसे किसानों को अधिक बाजार विकल्प मिलेंगे, निजी निवेश बढ़ेगा और कृषि क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा मिलेगा। लेकिन बड़ी संख्या में किसानों, विशेष रूप से पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसान संगठनों ने इन कानूनों को लेकर आशंकाएं जताईं। उन्हें डर था कि मौजूदा मंडी व्यवस्था और न्यूनतम समर्थन मूल्य की व्यवस्था कमजोर पड़ सकती है तथा बड़ी कंपनियों के सामने किसानों की सौदेबाजी की क्षमता घट सकती है।
दिल्ली की सीमाओं पर लंबे समय तक चले किसान आंदोलन ने देश की राजनीति और कृषि नीति को व्यापक चर्चा के केंद्र में ला दिया। आंदोलन के दौरान सर्दी, गर्मी और महामारी जैसी कठिन परिस्थितियों में किसानों ने धरना जारी रखा। इस संघर्ष में कई किसानों की मृत्यु हुई, हालांकि हर मृत्यु का कारण आंदोलन ही था, ऐसा कहना उचित नहीं होगा। सरकार और किसान संगठनों के बीच कई दौर की बातचीत हुई, लेकिन लंबे समय तक सहमति नहीं बन पाई। नवंबर 2021 में प्रधानमंत्री ने तीनों कृषि कानून वापस लेने की घोषणा की और बाद में संसद ने उन्हें निरस्त कर दिया।
कानूनों की वापसी यह दिखाती है कि बड़े नीतिगत बदलावों के लिए केवल सरकार की मंशा पर्याप्त नहीं होती; प्रभावित समुदायों का विश्वास और व्यापक संवाद भी जरूरी है। सरकार का उद्देश्य कृषि क्षेत्र में सुधार करना हो सकता है, लेकिन सुधारों की स्वीकार्यता इस बात पर निर्भर करती है कि किसानों की चिंताओं को कितनी गंभीरता से सुना जाता है। कृषि संकट, खेती की लागत, किसानों की आय, कर्ज और बाजार तक पहुंच जैसे सवाल आज भी महत्वपूर्ण हैं। इन समस्याओं का समाधान टकराव के बजाय परामर्श, पारदर्शी नीति और किसानों की भागीदारी से तलाशा जाना चाहिए।
बेरोजगारी और युवाओं का भविष्य
देश की बड़ी युवा आबादी को रोजगार, बेहतर शिक्षा और आर्थिक सुरक्षा की आवश्यकता है। मोदी सरकार ने कौशल विकास, स्टार्टअप, विनिर्माण और स्वरोजगार को प्रोत्साहित करने के लिए कई कार्यक्रम शुरू किए। इसके बावजूद बेरोजगारी, गुणवत्तापूर्ण रोजगार की कमी और सरकारी नौकरियों के लिए अत्यधिक प्रतिस्पर्धा जैसे विषय लगातार सार्वजनिक बहस का हिस्सा रहे हैं। आर्थिक विकास के आंकड़े महत्वपूर्ण हैं, लेकिन उनका मूल्यांकन इस आधार पर भी होना चाहिए कि नए रोजगार कितनी संख्या में पैदा हुए और उनकी गुणवत्ता कैसी रही।
युवाओं की परेशानी केवल नौकरी नहीं मिलने तक सीमित नहीं है। बड़ी संख्या में अभ्यर्थी प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में कई वर्ष और परिवार की बचत खर्च करते हैं। जब भर्ती प्रक्रिया में देरी होती है, परीक्षाएं रद्द होती हैं या प्रश्नपत्र लीक होने के आरोप सामने आते हैं, तो उनके सामने आर्थिक और मानसिक दबाव बढ़ जाता है। 2024 में नीट-यूजी परीक्षा को लेकर विवाद और बाद के वर्षों में सामने आए परीक्षा संबंधी मामलों ने भर्ती तथा प्रवेश परीक्षाओं की विश्वसनीयता पर गंभीर प्रश्न खड़े किए। इन मामलों में प्रत्येक आरोप की जांच और संबंधित संस्थाओं की भूमिका का तथ्यात्मक आकलन जरूरी है।
सरकार के लिए रोजगार सृजन को केवल योजनाओं और घोषणाओं की संख्या से मापना पर्याप्त नहीं है। आवश्यक है कि नियमित रोजगार, सामाजिक सुरक्षा, श्रमिकों की आय, महिला रोजगार और युवाओं के कौशल विकास से जुड़े परिणाम सार्वजनिक रूप से सामने रखे जाएं। यदि आर्थिक विकास का लाभ समाज के बड़े हिस्से तक नहीं पहुंचता, तो विकास की गुणवत्ता पर सवाल उठेंगे। युवा देश की सबसे बड़ी संभावनाओं में से एक हैं, लेकिन यह संभावना तभी वास्तविक शक्ति बन सकती है जब उन्हें शिक्षा, रोजगार और आगे बढ़ने के समान अवसर मिलें।
चुनावी बॉन्ड और राजनीतिक चंदे की पारदर्शिता
राजनीतिक दलों को मिलने वाला धन लोकतांत्रिक व्यवस्था का महत्वपूर्ण विषय है। वर्ष 2017 में शुरू की गई चुनावी बॉन्ड योजना के तहत व्यक्ति और कंपनियां राजनीतिक दलों को ऐसे बॉन्ड के माध्यम से चंदा दे सकती थीं, जिनके दानदाताओं की पहचान सार्वजनिक रूप से प्रकट नहीं होती थी। सरकार ने राजनीतिक चंदे की व्यवस्था में सुधार और नकद लेनदेन को कम करने जैसे उद्देश्यों का समर्थन किया। लेकिन आलोचकों ने कहा कि दानदाताओं की पहचान सार्वजनिक न होने से राजनीतिक वित्तपोषण में पारदर्शिता और नागरिकों के सूचना के अधिकार पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
फरवरी 2024 में सुप्रीम कोर्ट ने चुनावी बॉन्ड योजना को असंवैधानिक घोषित कर दिया। न्यायालय ने राजनीतिक दलों के वित्तपोषण की जानकारी नागरिकों के सूचना के अधिकार से जुड़ी होने पर जोर दिया और योजना से संबंधित जानकारी सार्वजनिक करने के निर्देश दिए। प्रकाशित आंकड़ों के अनुसार, इस योजना के माध्यम से प्राप्त चंदे में भारतीय जनता पार्टी सबसे बड़ी लाभार्थी थी। हालांकि, किसी दल को चंदा मिलने मात्र से यह साबित नहीं होता कि उसके बदले कोई अनुचित लाभ दिया गया था। ऐसे निष्कर्षों के लिए अलग और ठोस प्रमाण आवश्यक हैं।
इस प्रकरण ने राजनीतिक चंदे के नियमों की निष्पक्षता और पारदर्शिता पर गंभीर बहस को जन्म दिया। लोकतंत्र में नागरिकों को यह जानने का अधिकार है कि राजनीतिक दलों को धन कहां से मिलता है और राजनीतिक वित्तपोषण की व्यवस्था किस प्रकार काम करती है। यदि चंदे की व्यवस्था में पारदर्शिता कमजोर होगी, तो जनता का संस्थाओं पर भरोसा प्रभावित हो सकता है। सरकार और सभी राजनीतिक दलों की जिम्मेदारी है कि वे राजनीतिक वित्तपोषण को अधिक पारदर्शी बनाने वाली व्यवस्थाओं का समर्थन करें और नियमों को इस तरह लागू करें कि किसी दल या दानदाता को अनुचित लाभ की आशंका कम हो।
जांच एजेंसियां और विपक्ष के साथ व्यवहार
भारत में प्रवर्तन निदेशालय, केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो और आयकर विभाग जैसी संस्थाएं कानून लागू करने तथा वित्तीय अनियमितताओं की जांच में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। इन संस्थाओं की स्वतंत्रता और निष्पक्षता लोकतंत्र के लिए आवश्यक है। मोदी सरकार के कार्यकाल में विपक्षी दलों के नेताओं के विरुद्ध जांच और कार्रवाई को लेकर कई बार राजनीतिक विवाद हुए। विपक्ष ने आरोप लगाया कि केंद्रीय एजेंसियों का उपयोग राजनीतिक दबाव बनाने के लिए किया जा रहा है, जबकि सरकार ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि जांच कानून के अनुसार होती है।
इन आरोपों की गंभीरता को देखते हुए जरूरी है कि जांच एजेंसियों की कार्यवाही का मूल्यांकन प्रमाणों और कानूनी प्रक्रिया के आधार पर किया जाए। केवल किसी नेता के विरुद्ध जांच शुरू होने से उसे दोषी नहीं माना जा सकता, और केवल राजनीतिक व्यक्ति होने के कारण किसी को जांच से छूट भी नहीं मिल सकती। असली सवाल यह है कि क्या समान परिस्थितियों में समान मानदंड लागू किए जा रहे हैं, क्या जांच समयबद्ध है और क्या एजेंसियां राजनीतिक हस्तक्षेप से स्वतंत्र होकर काम कर रही हैं। पारदर्शिता और न्यायिक समीक्षा ऐसे मामलों में भरोसा कायम रखने के महत्वपूर्ण साधन हैं।
सरकार की आलोचना का अर्थ यह नहीं कि भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच नहीं होनी चाहिए। उसी तरह भ्रष्टाचार के विरुद्ध कार्रवाई का दावा भी जांच एजेंसियों को जवाबदेही से मुक्त नहीं कर सकता। कानून का समान और निष्पक्ष प्रयोग ही लोकतंत्र की बुनियाद है। यदि संस्थाओं के कामकाज पर संदेह उत्पन्न होता है, तो सरकार को स्वतंत्रता, प्रक्रिया और परिणामों के बारे में स्पष्ट जानकारी देनी चाहिए। संस्थाओं की विश्वसनीयता राजनीतिक लाभ से अधिक महत्वपूर्ण है, क्योंकि उनका प्रभाव किसी एक दल के शासनकाल तक सीमित नहीं रहता।
जम्मू-कश्मीर: सुरक्षा, अधिकार और लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व
अगस्त 2019 में केंद्र सरकार ने जम्मू-कश्मीर का विशेष संवैधानिक दर्जा समाप्त करने से संबंधित निर्णय लिया और तत्कालीन राज्य को दो केंद्रशासित प्रदेशों—जम्मू-कश्मीर तथा लद्दाख—में पुनर्गठित किया। सरकार ने इस फैसले को राष्ट्रीय एकीकरण, विकास और सुरक्षा की दृष्टि से महत्वपूर्ण बताया। दूसरी ओर, इस निर्णय के साथ लगाए गए प्रतिबंधों, राजनीतिक नेताओं की हिरासत, संचार व्यवस्था पर रोक और राज्य के दर्जे के सवाल को लेकर आलोचना हुई। इस विषय पर राष्ट्रीय सुरक्षा और नागरिक अधिकारों के बीच संतुलन को लेकर व्यापक बहस हुई।
दिसंबर 2023 में सुप्रीम कोर्ट ने अनुच्छेद 370 को निरस्त करने के फैसले को बरकरार रखा और जम्मू-कश्मीर में विधानसभा चुनाव कराने तथा राज्य का दर्जा बहाल करने की दिशा में कदम उठाने की बात कही। यह कानूनी स्थिति स्पष्ट करती है कि फैसले की संवैधानिक वैधता और उसके राजनीतिक, प्रशासनिक तथा सामाजिक प्रभाव अलग-अलग प्रश्न हैं। किसी निर्णय को न्यायालय से वैधता मिलने के बाद भी उसके क्रियान्वयन, स्थानीय प्रतिनिधित्व और नागरिकों के अनुभवों का मूल्यांकन किया जा सकता है।
जम्मू-कश्मीर के संदर्भ में सरकार की जिम्मेदारी केवल सुरक्षा व्यवस्था बनाए रखने तक सीमित नहीं है। नागरिकों का विश्वास, राजनीतिक भागीदारी, आर्थिक अवसर और लोकतांत्रिक संस्थाओं का सामान्य संचालन भी महत्वपूर्ण हैं। राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े वास्तविक जोखिमों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता, लेकिन लंबे समय तक सामान्य राजनीतिक प्रक्रिया कमजोर रहने से लोगों की भागीदारी प्रभावित हो सकती है। स्थायी शांति के लिए सुरक्षा के साथ संवाद, विकास और जवाबदेह प्रशासन की आवश्यकता बनी रहती है।
सामाजिक ध्रुवीकरण और लोकतांत्रिक वातावरण
भारत की विविधता उसकी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा है। धर्म, भाषा, जाति और क्षेत्र के आधार पर अलग-अलग समुदायों का साथ रहना भारतीय समाज की वास्तविकता है। मोदी सरकार के कार्यकाल में नागरिकता संशोधन कानून, राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर की आशंकाओं, धार्मिक पहचान और सार्वजनिक भाषणों से जुड़े मुद्दों पर देशभर में तीखी बहस हुई। नागरिकता संशोधन कानून के समर्थकों ने इसे पड़ोसी देशों में उत्पीड़ित कुछ धार्मिक अल्पसंख्यकों को नागरिकता देने की व्यवस्था बताया, जबकि आलोचकों ने धर्म आधारित वर्गीकरण और समानता के संवैधानिक सिद्धांतों को लेकर प्रश्न उठाए।
इन मुद्दों पर असहमति का होना लोकतांत्रिक समाज में असामान्य नहीं है। लेकिन जब सार्वजनिक विमर्श में समुदायों के बीच अविश्वास बढ़ता है या किसी समूह के विरुद्ध भेदभाव और हिंसा की घटनाएं सामने आती हैं, तो प्रशासन और राजनीतिक नेतृत्व की जिम्मेदारी बढ़ जाती है। किसी विशेष घटना की जवाबदेही तय करने के लिए उसके तथ्य, संबंधित व्यक्तियों की भूमिका और कानूनी कार्रवाई को देखना चाहिए। व्यापक आरोपों के बजाय प्रमाणों पर आधारित चर्चा अधिक उपयोगी होती है।
सरकार की जिम्मेदारी है कि कानून का संरक्षण सभी नागरिकों को समान रूप से मिले और किसी भी समुदाय के विरुद्ध हिंसा या भेदभाव के मामलों में निष्पक्ष कार्रवाई हो। राजनीतिक नेतृत्व के शब्दों का सार्वजनिक वातावरण पर प्रभाव पड़ता है, इसलिए सार्वजनिक संवाद में संयम और संवैधानिक मूल्यों का सम्मान आवश्यक है। भारत की एकता केवल प्रशासनिक शक्ति से नहीं, बल्कि नागरिकों के बीच भरोसे और समान अधिकारों की भावना से मजबूत होती है।
पर्यावरण, प्रदूषण और विकास की कीमत
देश में बुनियादी ढांचे, सड़कों, रेल, औद्योगिक परियोजनाओं और शहरी विकास का विस्तार किसी भी सरकार की प्राथमिकताओं का हिस्सा हो सकता है। मोदी सरकार ने भी बड़े पैमाने पर निर्माण और संपर्क परियोजनाओं पर जोर दिया है। लेकिन विकास के साथ पर्यावरणीय प्रभावों का आकलन करना उतना ही आवश्यक है। दिल्ली और उत्तर भारत में वायु प्रदूषण, हिमालयी क्षेत्रों में संवेदनशील पारिस्थितिकी, जंगलों पर दबाव और जलवायु परिवर्तन से जुड़ी चुनौतियां लगातार ध्यान मांगती हैं।
प्रदूषण के लिए केवल केंद्र सरकार को जिम्मेदार ठहराना पर्याप्त नहीं होगा, क्योंकि इसमें राज्य सरकारों, स्थानीय निकायों, परिवहन, उद्योग, कृषि अवशेष जलाने और मौसमी परिस्थितियों की भी भूमिका होती है। फिर भी, केंद्र के पास राष्ट्रीय मानक, वित्तीय सहायता, पर्यावरण नीति और राज्यों के बीच समन्वय की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है। जब प्रदूषण का असर बच्चों, बुजुर्गों, श्रमिकों और आम नागरिकों के स्वास्थ्य पर पड़ता है, तब इसे केवल मौसमी समस्या मानकर टालना उचित नहीं है।
विकास की सफलता का मूल्यांकन इस आधार पर भी होना चाहिए कि उससे पर्यावरण और नागरिकों के स्वास्थ्य पर कितना असर पड़ा। परियोजनाओं की मंजूरी, पर्यावरणीय आकलन, प्रभावित समुदायों से परामर्श और नुकसान की भरपाई पारदर्शी तरीके से होनी चाहिए। यदि आर्थिक विकास प्राकृतिक संसाधनों को दीर्घकालिक नुकसान पहुंचाता है, तो उसकी लागत आने वाली पीढ़ियों को चुकानी पड़ सकती है। इसलिए सरकार को विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन स्थापित करने के लिए प्रभावी निगरानी और जवाबदेही सुनिश्चित करनी चाहिए।
अर्थव्यवस्था और असमानता का सवाल
भारत की अर्थव्यवस्था ने पिछले दशक में कई क्षेत्रों में विस्तार देखा है और देश वैश्विक अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण स्थान रखता है। लेकिन तेज आर्थिक वृद्धि अपने आप यह सुनिश्चित नहीं करती कि उसका लाभ सभी वर्गों तक समान रूप से पहुंचे। रोजगार की गुणवत्ता, छोटे कारोबारों की स्थिति, ग्रामीण आय, महंगाई और संपत्ति के वितरण जैसे विषय यह समझने के लिए आवश्यक हैं कि विकास आम नागरिकों के जीवन में कितना बदलाव ला रहा है। आर्थिक नीतियों का आकलन केवल सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि से नहीं, बल्कि नागरिकों की आर्थिक सुरक्षा से भी होना चाहिए।
महामारी के दौरान छोटे कारोबारों और असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों पर गंभीर दबाव पड़ा। इसके बाद आर्थिक गतिविधियों में सुधार के बावजूद सभी वर्गों की परिस्थितियां एक जैसी नहीं रहीं। छोटे उद्यमों के लिए ऋण, बाजार तक पहुंच, लागत और प्रतिस्पर्धा से जुड़े प्रश्न बने रहे। गरीब परिवारों के लिए खाद्य सुरक्षा और सामाजिक कल्याण योजनाओं का महत्व भी इस बात को दर्शाता है कि बड़ी आबादी को आर्थिक असुरक्षा से बचाने के लिए सार्वजनिक सहायता आवश्यक बनी हुई है।
सरकार की आर्थिक नीति की कसौटी यह होनी चाहिए कि विकास के अवसर व्यापक हों, रोजगार पैदा हों और कमजोर वर्गों को आगे बढ़ने के साधन मिलें। यदि अर्थव्यवस्था बढ़ती है, लेकिन बड़ी संख्या में युवा स्थिर रोजगार के लिए संघर्ष करते रहते हैं, तो नीतिगत प्राथमिकताओं पर चर्चा जरूरी है। सरकार को उपलब्धियों के साथ चुनौतियों के आंकड़े भी सामने रखने चाहिए और उन क्षेत्रों में सुधार करना चाहिए जहां विकास का लाभ पर्याप्त रूप से नहीं पहुंच रहा है।
निष्कर्ष: जवाबदेही से ही मजबूत होगा लोकतंत्र
मोदी सरकार के कार्यकाल की समीक्षा करते समय नोटबंदी, कोरोना महामारी, किसान आंदोलन, बेरोजगारी, परीक्षा विवाद, चुनावी बॉन्ड, जांच एजेंसियों की स्वतंत्रता, जम्मू-कश्मीर, सामाजिक ध्रुवीकरण और पर्यावरण जैसे मुद्दों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। इनमें कुछ निर्णयों पर राजनीतिक और आर्थिक मतभेद हैं, कुछ घटनाओं ने प्रशासनिक कमियों को उजागर किया और कुछ मामलों में न्यायालयों ने स्पष्ट संवैधानिक निर्णय दिए। इन सभी को एक ही श्रेणी में रखकर निष्कर्ष निकालने के बजाय प्रत्येक मामले के तथ्यों, परिणामों और जिम्मेदारियों की अलग-अलग समीक्षा की जानी चाहिए।
लोकतंत्र में सरकार की आलोचना देश की आलोचना नहीं होती। सरकारें आती-जाती रहती हैं, लेकिन संस्थाएं और नागरिक अधिकार स्थायी महत्व रखते हैं। जिस सरकार से जनता ने विकास और बेहतर भविष्य की अपेक्षा की हो, उससे उन वादों की प्रगति का हिसाब मांगना नागरिकों का अधिकार है। इसी तरह सरकार को भी अपनी उपलब्धियों के साथ कमियों को स्वीकार करने, आलोचना का उत्तर देने और नीतियों में सुधार करने के लिए तैयार रहना चाहिए।
देश को किसी एक राजनीतिक दल के पक्ष या विपक्ष में स्थायी भावनात्मक विभाजन से अधिक आवश्यकता है—ऐसी व्यवस्था की, जहां रोजगार के अवसर हों, स्वास्थ्य सेवाएं मजबूत हों, किसानों को उचित सुरक्षा मिले, परीक्षाएं निष्पक्ष हों, राजनीतिक चंदा पारदर्शी हो और कानून सभी नागरिकों पर समान रूप से लागू हो। मोदी सरकार का मूल्यांकन भी इन्हीं कसौटियों पर होना चाहिए। अंततः लोकतंत्र की वास्तविक ताकत सत्ता की लोकप्रियता में नहीं, बल्कि उसकी जवाबदेही, संस्थाओं की स्वतंत्रता और नागरिकों के जीवन में आने वाले सकारात्मक बदलाव में निहित है।
संदर्भ स्रोत
- सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया — चुनावी बॉन्ड पर निर्णय: आधिकारिक न्यायिक आदेश।
- नोटबंदी, कृषि कानून और सरकारी नीतियों से जुड़े विवाद: नीतिगत विवादों का विवरण।
- बेरोजगारी और आर्थिक असमानता पर विशेषज्ञों के विचार: आर्थिक असमानता पर रिपोर्ट।
- परीक्षा विवाद और युवाओं की नाराजगी: युवा आंदोलन पर रिपोर्ट।


