
आदर्श जीवन के लिए संयम, धैर्य, सहनशीलता, प्रेम, दया और करुणा जैसे गुणों को आवश्यक बताते हुए लेख में क्रोध से बचने और सकारात्मक सोच अपनाने पर जोर दिया गया है। लेखक ने मानवीय संवेदनशीलता, प्रभावी संवाद, सदाचार और अपनत्व को व्यक्तित्व निखारने का आधार बताया है। साथ ही बड़ों के अनुभवों से सीखने, सादगी और सद्व्यवहार को जीवन में अपनाने की प्रेरणा दी गई है।
- संयम और सद्व्यवहार से निखरता व्यक्तित्व
- क्रोध नहीं, संवाद से मिले समाधान
- सकारात्मक सोच ही जीवन का मूलमंत्र
- आदर्श जीवन की पहचान
सुनील कुमार माथुर
आदर्श जीवन व्यतीत करना भी एक कला है। चूँकि जीवन में संयम, धैर्य, सहनशीलता, त्याग, प्रेम, दया, करुणा, ममता, वात्सल्य जैसे आदर्श गुणों का होना नितांत आवश्यक है। लेकिन आज का युवा बात-बात पर क्रोधित हो जाता है व हिंसा, तोड़-फोड़, मारपीट पर उतारू हो जाता है, जो उचित नहीं है। वह यह भूल जाता है कि सकारात्मक सोच रखकर हम दिन भर में जितनी ऊर्जा अर्जित करते हैं, क्रोध करते ही वह सारी ऊर्जा एक क्षण में ही समाप्त हो जाती है, फिर भला क्रोध करके अपनी शक्ति का नाश क्यों करना।
जीवन को शांतिपूर्ण जीने के लिए मानवीय संवेदनशीलता, प्रभावी संवाद, धैर्य, आमजन के प्रति सकारात्मक संवाद व व्यवहार काफी महत्वपूर्ण है। जीवन में हर किसी से संयमित व्यवहार रखें। दूसरों के दुःख-सुख को अपना दुःख-सुख समझें और उन्हें सम्मान भी दें ताकि हर किसी के आप भरोसेमंद साथी बन सकें। आज के सोशल मीडिया के युग में समूचा विश्व एक मुट्ठी में समा गया है। किसी की कार्यकुशलता, कार्य प्रणाली व व्यवहार किसी से भी छिपा नहीं रह सकता है। तत्काल वीडियो और व्हाट्सऐप के जरिए उजागर हो जाता है। इसलिए अपने व्यवहार में सदाचार, शिष्टाचार, सद्भाव व अपनत्व के गुणों को संजोना होगा।
आज का युवा वर्ग तत्काल समस्याओं का समाधान चाहता है, ऐसे में संयमित व्यवहार करना हमारी नैतिक जिम्मेदारी बनती है। आज के समय में सभी को साथ लेकर चलना पड़ता है, तभी कार्य में सफलता प्राप्त होती है। इसलिए सभी साथियों के दुःख-सुख को अपना सुख-दुःख समझना चाहिए। उन्हें अपने परिवार के सदस्यों के समान मान-सम्मान दीजिए। इसी के साथ ही साथ सादगी व सद्व्यवहार के गुण को जीवन में अंगीकार करें।
जीवन का यह मूल मंत्र है कि अगर आपकी सोच सकारात्मक है तो जीवन भी सुखमय होगा। अगर आप अपने कर्तव्य पालन के दौरान किसी बात पर क्रोधित हो जाएँ तो उसी समय एक गहरी लंबी साँस लेकर छोड़ें। खुद के स्वभाव को शांत प्रवृत्ति व सद्भावना में बदलना ही व्यक्तित्व की पहचान है। इसी के साथ ही साथ क्रोध पर नियंत्रण करने के लिए फिजिकल एक्सरसाइज व शांत स्वभाव रखने से भी मदद मिलती है।
हमारा व्यवहार ही हमारे व्यक्तित्व को निखारता है। इसलिए हर समस्या का समाधान शांति के साथ मिल-बैठकर निकालना चाहिए। क्रोध हमारे आदर्श जीवन का सबसे बड़ा शत्रु है। इसलिए सभी के साथ प्रेमपूर्वक व्यवहार करें। क्रोध से पहले खुद और फिर दूसरों को तकलीफ़ व परेशानी होती है। इसलिए क्रोध से बचकर रहें। जो लोग बात-बात पर क्रोध करते हैं, उनके साथ कोई भी बातचीत नहीं करना चाहता है। मजबूरी में बात करना अलग बात है।
आदर्श जीवन जीना भी एक कला है, जो आदर्श संस्कारों से ही मिलती है। कहीं बाजार में नहीं मिलती। अतः सुबह-शाम जब भी वक्त मिले तब अपने से बड़ों के संग उठें-बैठें। उनसे संवाद करें, बड़े-बुजुर्गों का आशीर्वाद प्राप्त करें और उनके संग बैठकर उनके जीवन के अनुभवों का लाभ लीजिए। बेकार में समय नष्ट न करें। हर वक्त कुछ नया सीखने की जिज्ञासा को बनाए रखिए। यही जीवन का मूल मंत्र है, जो हमारे जीवन को यादगार बनाने में मदद करता है।
सुनील कुमार माथुर
सदस्य अणुव्रत लेखक मंच
(स्वतंत्र लेखक व पत्रकार) जोधपुर, राजस्थान







