
वाणी में संयम, मधुरता और करुणा रखने को आत्मबल का प्रतीक बताते हुए लेख में सोच-समझकर बोलने और रिश्तों को मजबूत बनाए रखने की सीख दी गई है। साथ ही दूसरों की खूबियों को अपनाने और खामियों को नजरअंदाज कर सकारात्मक सोच के साथ जीवन जीने का संदेश दिया गया है। लेख संवाद, शांति और संवेदनशील व्यवहार के माध्यम से आपसी संबंधों में सुख, शांति और समृद्धि लाने की बात करता है।
- मीठी वाणी, मजबूत रिश्ते
- सकारात्मक सोच से सुखी जीवन
- बोलने से पहले सोचिए
- संवाद से बनते हैं बेहतर रिश्ते
सुनील कुमार माथुर
वाणी पर संयम रखना कमजोरी नहीं अपितु आत्मबल है जिसकी वाणी में करुणा होती है उसके मौन में भी सम्मान सुनाई देता है। इसलिए व्यक्ति को सोच-समझकर ही बोलना चाहिए और जहाँ आवश्यक हो वहीं बोलना चाहिए। बिना वजह बोलते रहने से हमारी स्वयं की पैठ खराब होती है। इतना ही नहीं वाणी ही वह माध्यम है जो हमारे मीठे बोल बोलने पर रिश्तों को मजबूत करती है और यहीं वाणी कड़वे बोल बोलने पर एक ही पल में वर्षों पुराने संबंधों को तुड़वा देती हैं। अतः वाणी ऐसी बोलिए जो सभी को प्रिय लगे और आपसी रिश्ते भी पहले से अधिक मजबूत बनें। याद रखिए कि इस दुनिया में अपना केवल समय है। समय सही हो तो सब अपने हैं वर्ना अपना कोई नहीं है।
खूबी और खामी
हर व्यक्ति में खूबी और खामी दोनों ही होती है। चाहे वह बालक हो या युवा। मायने यह रखता है कि आप क्या तलाशते हो। सुखी जीवन व्यतीत करने के लिए व्यक्ति को सदैव दूसरों की खामियों को अनदेखा कर देना चाहिए और उसकी खूबियों को अंगीकार कर लेना चाहिए। दूसरों में खूबियों को ढूंढ कर उन्हें जीवन में आत्मसात करना हमारी सकारात्मक सोच को दर्शाता है जबकि खामियों को खोजना हमारी नकारात्मक सोच को दर्शाता है। अतः जीवन में सदैव सकारात्मक सोच रखें और अपने नेक कर्म करते रहिए। सकारात्मक सोच के साथ जो इंसान अपना जीवन यापन करता है उसके लिए यह धरती ही स्वर्ग के समान है अन्यथा जीवन दुखों के पहाड़ के अलावा कुछ भी नहीं है।
फर्क होता है
बहुत फर्क होता है मजाक उड़ाने और करने में। मजाक उड़ाया जाता है किसी को अपमानित करने के लिए और मजाक किया जाता है किसी के चेहरे पे मुस्कान लाने के लिए। इसलिए जीवन में शांतिपूर्वक रहें और कभी भी किसी का मजाक उड़ाने का प्रयास करें। हर व्यक्ति की अपनी सोच, अपनी विचारधारा और अपनी शैली होती है। आज के दौर में तो वैसे भी संवाद का अभाव नजर आ रहा है फिर भला हम किसी का मजाक उड़ाकर क्यों संबंध बिगाड़े। कार्य ऐसा करें कि हम किसी दुःखी, पीड़ित व अशांत व्यक्ति के चेहरे पर खुशियाँ ला सकें और वह हमारे कथन से प्रभावित होकर आपसी संबंधों को पहले से भी अधिक मजबूत बना सकें। जीवन में संवाद की प्रक्रिया ही वह माध्यम है जो एक-दूसरे के जीवन में सुख, शांति और समृद्धि ला सकती है, क्योंकि यही आदर्श जीवन व्यतीत करने का मूलमंत्र है।
सुनील कुमार माथुर
स्वतंत्र लेखक व पत्रकार एवं
सदस्य अणुव्रत लेखक मंच
33 वर्धमान नगर, शोभावतों की ढाणी, खेमे का कुआँ, पालरोड, जोधपुर, राजस्थान







