
आलेख में हर गाँव में पुस्तकालय स्थापित करने की आवश्यकता को शिक्षा, लोकतंत्र, समानता, आर्थिक विकास और सांस्कृतिक संरक्षण से जोड़ा गया है। इसमें ग्रामीण पुस्तकालयों के लिए स्कूल-कम-सामुदायिक पुस्तकालय, मोबाइल पुस्तकालय, डिजिटल संसाधन और जनभागीदारी जैसे उपाय सुझाए गए हैं। लेखक अपने गाँव में शुरू किए गए पुस्तकालय के अनुभव का उल्लेख करते हुए पुस्तक और पढ़ने की संस्कृति को गाँव के भविष्य तथा भारत के विकास से जोड़ते हैं।
- हर गाँव में पुस्तकालय क्यों जरूरी है
- किताबों से बदलेगा गाँव का भविष्य
- पुस्तकालय नहीं तो अधूरा विकास
- हर गाँव, एक पुस्तकालय
डॉ. भगवान प्रसाद उपाध्याय
गाँव सिर्फ भूगोल नहीं, भारत का भविष्य है। यहीं से अन्न उगता है, यहीं से सेना के जवान निकलते हैं, और यहीं से लोकतंत्र की सबसे मजबूत आवाज उठती है। मगर विडंबना देखिए—जिस गाँव ने देश को विचार दिए, उसी गाँव की नई पीढ़ी आज विचारों से दूर होती जा रही है। कारण साफ है: किताबों की सुगंध गाँव के परिवेश से धीरे-धीरे गायब हो रही है।
जहाँ कभी चौपाल पर तुलसी की रामायण और कबीर के दोहे गूंजते थे, जहाँ मिट्टी की दीवार पर चिपका अखबार पूरा टोला पढ़ता था, वहाँ अब न पुस्तकालय हैं, न पढ़ने वाले। यह सिर्फ सांस्कृतिक क्षति नहीं, राष्ट्रीय क्षति है।
- अंधेरे के आयाम: समस्या कितनी गहरी है?
राष्ट्रीय पुस्तकालय मिशन के आँकड़े बताते हैं कि देश के 6.5 लाख गाँवों में से 80% से अधिक में कोई सार्वजनिक पुस्तकालय नहीं है। जो 20% में हैं भी, उनमें से आधे पर ताला लटका है—न तो वहाँ पर कोई लाइब्रेरियन, न नई किताबें, न कोई सरकारी बजट।
स्कूलों में भी लाइब्रेरी की हालत और दयनीय है। UDISE+ 2023-24 की रिपोर्ट के अनुसार 37% प्राथमिक स्कूलों में पुस्तकालय-कक्ष ही नहीं है। जहाँ कमरा है, वहाँ किताबें रजिस्टर में दर्ज होकर अलमारी में कैद हैं। बच्चे “लाइब्रेरी पीरियड” में मैदान में खेलते हैं क्योंकि किताब छूने पर डाँट पड़ती है।
दूसरी तरफ, डिजिटल विस्फोट ने एक नई दूरी पैदा की है। गाँव का बच्चा यूट्यूब पर तो है, पर यूटोपिया से दूर है। 15 सेकंड की रील्स ने 15 पन्ने पढ़ने का धैर्य छीन लिया है। माता-पिता के लिए पढ़ाई का मतलब “नौकरी वाली डिग्री” बन गया है। ऐसे में प्रेमचंद, जयशंकर प्रसाद, चंद्रधर शर्मा गुलेरी, फणीश्वर नाथ रेणु, आचार्य चतुरसेन शास्त्री, भगवती चरण वर्मा, केशव चन्द्र वर्मा, शरत चंद्र, रवींद्रनाथ, कलाम जी को कोई भी पढ़ना नहीं चाहते। सब धीरे-धीरे पाठ्यक्रम से बाहर हो गए हैं। नतीजा: डिग्रियाँ बढ़ रही हैं, विवेक घट रहा है।
- पुस्तकालय क्यों? क्योंकि यह इमारत नहीं, इंकलाब है
पुस्तकालय को हम अक्सर “किताब-घर” समझने की भूल करते हैं। असल में यह “विचार-घर” है। हर गाँव में इसके होने के चार बड़े कारण हैं:
- लोकतंत्र की पाठशाला: संविधान की प्रस्तावना को रटने वाला नागरिक और संविधान को समझने वाला नागरिक—दोनों में फर्क पुस्तकालय पैदा करता है। अंबेडकर ने कहा था—”शिक्षित बनो, संगठित रहो, संघर्ष करो।” शिक्षा की पहली सीढ़ी किताब है।
- समानता का सेतु: दिल्ली का बच्चा ब्रिटानिका पढ़े और बस्तर का बच्चा सिर्फ ककहरा—यह नया अन्याय है। पुस्तकालय गाँव और शहर की ज्ञान-खाई को पाटता है।
- आर्थिक इंजन: एक लोक सेवा आयोग की किताब किसी किसान के बेटे को कलेक्टर बना सकती है। जैविक खेती की पत्रिका फसल की लागत आधी कर सकती है। स्टार्टअप की किताब गाँव से ही अगला यूनिकॉर्न पैदा कर सकती है।
- सांस्कृतिक रीढ़: लोक-कथाएँ, भजन, लोक साहित्य, नाटक, लोक-चिकित्सा—पुस्तकालय गाँव की स्मृति का संग्रहालय है। जब तक गाँव अपनी कहानियाँ नहीं पढ़ेगा, शहर उसकी कहानी गलत लिखेगा।
- समाधान का खाका: “हर गाँव, एक पुस्तकालय” मिशन
सरकार यदि “विकसित भारत 2047” का सपना देखती है, तो उसकी नींव किताब से रखनी होगी। “हर घर नल” की तर्ज पर “हर गाँव पुस्तकालय” को राष्ट्रीय मिशन बनाया जाए।
कैसे?
- स्कूल-कम-सामुदायिक पुस्तकालय मॉडल: हर पंचायत के एक सरकारी स्कूल को “ज्ञान केंद्र” घोषित किया जाए। दिन में स्कूल के बच्चे, शाम 4-8 बजे तक पूरा गाँव उपयोग करे। इसके लिए एक अंशकालिक “ग्राम लाइब्रेरियन” का पद सृजित हो—स्थानीय युवा, सेवानिवृत्त शिक्षक या महिला स्वयं सहायता समूह की सदस्य को न्यूनतम आठ-दस हजार रुपए मासिक मानदेय पर रखा जाए।
- आधारभूत संरचना: 500 किताबों से शुरुआत—50% बच्चों की, 30% प्रतियोगी परीक्षा व कौशल विकास, 20% कृषि, स्वास्थ्य, कानून। हर साल 100 नई किताबें जोड़ी जाएँ। पंचायत भवन के एक कमरे या “अटल टिंकरिंग लैब” के साथ इसे जोड़ा जाए।
- डिजिटल और भौतिक का संगम: जहाँ इंटरनेट है, वहाँ 1 स्मार्ट टीवी + NCERT DIKSHA, e-Granthalaya, National Digital Library का लॉगिन। जहाँ नेट नहीं, वहाँ “पेन-ड्राइव पुस्तकालय”—हर महीने ब्लॉक से 64GB डेटा अपडेट होकर आए।
- मोबाइल पुस्तकालय योजना: हर ब्लॉक में एक “ज्ञान-रथ”। बैटरी-रिक्शा में 1000 किताबें, प्रोजेक्टर, स्पीकर। हफ्ते में 6 दिन, 6 गाँव। बच्चे किताब बदलें, बुजुर्ग अखबार सुनें।
- पढ़ने की संस्कृति: “कहानी शनिवार” अनिवार्य हो। हर महीने पंचायत “पाठक रत्न” चुने—सबसे ज्यादा किताब पढ़ने वाले बच्चे, महिला, बुजुर्ग को गाँव के मेले में सम्मानित किया जाए। इनाम? 5 नई किताबें।
- CSR और जनभागीदारी: कंपनी अधिनियम की धारा 135 में “ग्रामीण पुस्तकालय” को स्पष्ट रूप से CSR गतिविधि घोषित किया जाए। “एक परिवार, एक किताब दान” अभियान चले। प्रवासी ग्रामीण अपने जन्मदिन पर गाँव की लाइब्रेरी को 51 किताबें भेंट करें।
- सामग्री: क्या हो, क्या न हो
पुस्तकालय का मतलब कोर्स की किताबों का ढेर नहीं है। यहाँ होनी चाहिए:
- बच्चों के लिए: पंचतंत्र, चंदामामा, विज्ञान कॉमिक्स, अंतरिक्ष, कोडिंग की सचित्र किताबें।
- युवाओं के लिए: करियर गाइड, स्टार्टअप, डिजिटल मार्केटिंग, NDA/CDS/UPSC की सामग्री, संविधान की सरल व्याख्या।
- किसानों के लिए: जैविक खेती, मौसम विज्ञान, सरकारी योजनाओं की किताबें।
- महिलाओं के लिए: स्वास्थ्य, पोषण, कानूनी अधिकार, स्वरोजगार, आत्मकथाएँ—कल्पना चावला से लेकर अरुणिमा सिन्हा तक।
- बुजुर्गों के लिए: बड़े अक्षरों वाली रामचरितमानस, अखबार, स्वास्थ्य पत्रिकाएँ, ऑडियो-बुक।
- सिर्फ सरकार नहीं, समाज भी उठाए कलम
पुस्तकालय बनाना सरकार का काम है, चलाना समाज का धर्म है। प्रधान शाम को ताला खोलना न भूलें। शिक्षक बच्चों को खुद एक कहानी पढ़कर सुनाएँ। माँ-बाप महीने में एक बार बच्चे के साथ लाइब्रेरी जाएँ। शहर में रहने वाला बेटा गाँव के पुस्तकालय को हर साल 1000 रुपये की किताबें भेजे। प्रकाशक रद्दी में जाने वाली किताबों को ग्रामीण भारत को दान करें।
याद रखिए, इजरायल जैसा छोटा देश इसलिए ताकतवर है क्योंकि वहाँ प्रति 100 व्यक्ति पर 1 पुस्तकालय है। फिनलैंड दुनिया का सबसे खुशहाल देश इसलिए है क्योंकि वहाँ का बच्चा 5 साल की उम्र तक 1000 कहानियाँ सुन चुका होता है।
उपसंहार: अंधेरे से उजाले तक
एक बंदूक एक जान बचाती है, एक किताब पूरी नस्ल बचा लेती है। सड़क, बिजली, पानी से पेट भरता है, किताब से आत्मा भरती है। आजादी के 100 साल पूरे होने पर हमें गाँव को सिर्फ “स्मार्ट विलेज” नहीं, “सोचने वाला विलेज” बनाना है।
यहाँ पर मैं एक छोटा सा उदाहरण देना चाहता हूँ। सन सत्तर के दशक में इस लेखक ने भी अपने गाँव में एक पुस्तकालय की शुरुआत की थी जिसने बाद में बहुत विस्तार पाकर एक बड़ा पुस्तकालय का स्वरूप धारण कर लिया। इस पुस्तकालय का नाम श्री हनुमान पुस्तकालय रखा जिसने इस लेखक को एक साहित्यकार के रूप में विकसित किया। साहित्य के साथ-साथ समाज सेवा की ऐसी लगन लगी कि लेखक ने कई विद्यालयों की स्थापना की और अपने क्षेत्र के लगभग एक दर्जन से अधिक पत्र-पत्रिकाओं के प्रकाशन में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यह सब एक छोटे से पुस्तकालय के द्वारा ही संभव हुआ। इस पुस्तकालय में अनेक निर्धन छात्रों ने भी अपनी पढ़ाई के लिए पुस्तकों का सहयोग लेकर अच्छी शिक्षा प्राप्त की और वह आज एक सम्मानजनक पद पर सुशोभित हैं।
जिस दिन खेत से लौटता मजदूर थकान मिटाने प्रेमचंद की “ईदगाह” पढ़ेगा, जिस दिन चूल्हा-चौका करने वाली बेटी मैरी क्यूरी की जीवनी पढ़कर लैब का सपना देखेगी, जिस दिन पंचायत की बैठक संविधान की किताब खोलकर होगी—उस दिन मान लीजिएगा कि भारत सचमुच विश्वगुरु बनने की राह पर है।
आइए, संकल्प लें—न रहेगी कोई अलमारी सूनी, न रहेगा कोई मन अनपढ़ा। हर गाँव में ज्ञान की ज्योत जलेगी, तो तभी मिटेगा गरीबी, बेरोजगारी और अंधविश्वास का अंधेरा।
क्योंकि अंतिम सत्य यही है: कलम से ही बनेगा कल का गाँव, कलम से ही बनेगा कल का भारत।
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