
‘बरगद की छाँव’ बाल कहानी में बच्चों द्वारा अपनी समस्याओं के समाधान के लिए बाल पंचायत बनाने और सामूहिक पहल करने की प्रेरणादायक कहानी प्रस्तुत की गई है। बच्चों ने सफाई, शुद्ध पेयजल और बाल पुस्तकालय जैसी समस्याओं को चिन्हित कर पहले स्वयं श्रमदान किया और फिर ग्राम पंचायत से सहयोग मांगा। कहानी स्वच्छता, लोकतांत्रिक मूल्यों, सामूहिक प्रयास तथा ज्ञान और तर्क के महत्व का संदेश देती है।
- बच्चों ने बनाई अपनी बाल पंचायत
- बाल पंचायत ने बदली गाँव की तस्वीर
- छोटे कदम, बड़ा बदलाव
- बरगद की छाँव से बदलाव की शुरुआत
सत्येन्द्र कुमार पाठक
गाँव की सुबह हमेशा की तरह शांत और ताज़ी थी। पक्षियों की चहचहाहट से पूरा माहौल गूंज रहा था। गाँव के मुहाने पर बने दादा जी के बड़े से दालान में धूप छन-छनकर आ रही थी।
दालान में बिछी चारपाई पर दादा जी बैठे अखबार पढ़ रहे थे। पास ही माता जी सबके लिए गर्म चाय और बिस्कुट ला रही थीं, जबकि पिता जी खेतों में जाने की तैयारी कर रहे थे। उसी समय घर के बच्चे—डुग्गू, पुच्चू, पीहू, शशांक और अंशिका—दालान में इकट्ठा हुए।
डुग्गू सबसे छोटा और नटखट था। उसने आते ही कहा, “दादा जी! आज हमारी छुट्टी है। हम सब स्कूल के पास वाले मैदान में खेलने जा रहे हैं।”
दादा जी ने चश्मा नाक पर टिकाते हुए चिंता जताई, “डुग्गू बेटा, उस मैदान के आसपास तो गाँव के कुछ लोग बहुत कचरा फेंकते हैं। वहाँ बदबू रहती है और मक्खियाँ भिनभिनाती हैं। वहाँ खेलना ठीक नहीं है।”
अंशिका, जो सबसे समझदार और सातवीं कक्षा में पढ़ने वाली बालिका थी, बोली, “दादा जी, यही तो समस्या है! हर महीने गाँव की पंचायत बैठती है, बड़े-बड़े फैसले होते हैं, लेकिन हमारे खेलने की जगह, स्कूल में पीने के पानी की व्यवस्था और बाल-पुस्तकालय जैसी बातों पर कोई ध्यान ही नहीं देता।”
पीहू ने भी सुर में सुर मिलाया, “हाँ दादा जी! कल जब पिता जी पंचायत की बैठक से आए थे, तो हमने पूछा था कि बच्चों के लिए क्या फैसला हुआ? तो उन्होंने कहा कि ‘तुम लोग पढ़ाई करो, पंचायत बड़ों का काम है।'”
पिता जी ने हाथ में कुल्हाड़ी लेते हुए मुस्कुराकर कहा, “बेटा, पंचायत में गाँव के बड़े-बड़े मुद्दों पर बात होती है—जैसे सड़क, नाली और खेती-किसानी। बच्चों के लिए अलग से समय कहाँ मिलता है?”
यह सुनकर शशांक और पुच्चू थोड़े उदास हो गए। लेकिन दादा जी ने अपने पोते-पोतियों के चेहरों को देखा और एक गहरी साँस ली।
दादा जी बोले, “बच्चों! अगर बड़े तुम्हारी समस्याओं पर ध्यान नहीं दे पा रहे हैं, तो इसका मतलब यह नहीं कि तुम चुप बैठो। लोकतंत्र में हर किसी को अपनी आवाज़ उठाने का अधिकार है। क्यों न तुम सब मिलकर अपनी खुद की ‘बाल पंचायत’ बनाओ?”
“बाल पंचायत?” पुच्चू ने अपनी आँखें बड़ी करते हुए पूछा। “दादा जी, क्या बच्चे भी पंचायत लगा सकते हैं?”
माता जी ने चाय का कप रखते हुए कहा, “बिल्कुल! अगर बच्चे अनुशासित होकर अपनी बात कहें, तो बड़े भी उनकी बात सुनने को मजबूर हो जाते हैं।”
दादा जी की बात ने बच्चों के मन में एक नई ऊर्जा भर दी। दोपहर में, जब गाँव के सभी लोग आराम कर रहे थे, पाँचों बच्चे—डुग्गू, पुच्चू, पीहू, शशांक और अंशिका—गाँव के बीचों-बीच स्थित विशाल बरगद के पेड़ की छाँव में इकट्ठा हुए।
बरगद की घनी छाँव ठंडी हवा दे रही थी। बच्चों ने पेड़ के चबूतरे की सफाई की और गोल घेरा बनाकर बैठ गए।
अंशिका ने सभा की शुरुआत करते हुए कहा, “दोस्तों! आज हम सब यहाँ अपनी ‘बाल पंचायत’ का गठन करने आए हैं। हमारी इस पंचायत का मुख्य उद्देश्य गाँव के बच्चों की समस्याओं को पहचानना और उनका समाधान खोजना है।”
सर्वसम्मति से बच्चों ने अपना-अपना कार्यभार चुना:
अंशिका को सर्वसम्मति से ‘बाल सरपंच’ चुना गया, क्योंकि वह सबसे बड़ी और विचारशील थी।
शशांक को ‘उप-सरपंच और अनुशासन प्रभारी’ बनाया गया।
पीहू को ‘शिक्षा एवं स्वास्थ्य सचिव’ का दायित्व मिला।
पुच्चू को ‘सफाई एवं पर्यावरण मंत्री’ बनाया गया।
छोटे डुग्गू को ‘बाल दूत’ बनाया गया, जिसका काम गाँव के अन्य बच्चों तक बाल पंचायत के संदेश पहुँचाना था।
शशांक ने एक डायरी निकाली और कहा, “चलो, अब हम अपनी समस्याओं की सूची बनाते हैं।”
पुच्चू ने तुरंत कहा, “सबसे पहली समस्या है मैदान में फैला कचरा और वहाँ जमा गंदा पानी।”
पीहू बोली, “दूसरी समस्या है हमारे प्राथमिक विद्यालय के हैंडपंप से निकलने वाला जंग लगा पानी। उस पानी को पीकर कई बच्चे बीमार पड़ जाते हैं।”
डुग्गू उछलकर बोला, “और तीसरी समस्या! हमें कहानियों की किताबें पढ़ने के लिए कोई जगह नहीं है। हमारे पास बाल-पुस्तकालय होना चाहिए!”
अंशिका ने सभी बिंदुओं को ध्यान से सुना और कहा, “हमारी बाल पंचायत का नियम है—हम केवल माँग नहीं करेंगे, बल्कि पहले खुद काम करके दिखाएँगे। जो काम हमारे बस में है, उसे हम खुद करेंगे और जो बड़े काम हैं, उनके लिए हम ग्राम पंचायत से सहयोग माँगेंगे।”
अगले ही दिन, पुच्चू और शशांक की अगुवाई में गाँव के लगभग पंद्रह-बीस बच्चे बरगद की छाँव में झाड़ू, बाल्टी और टोकरी लेकर एकत्र हुए।
बच्चों ने सबसे पहले खेलने वाले मैदान की सफाई शुरू की। झाड़ियों को काटा गया, प्लास्टिक की पन्नियों को इकट्ठा करके कूड़ेदान में डाला गया और मैदान को समतल बनाया गया।
जब गाँव के कुछ लोग वहाँ से गुजरे, तो उन्होंने छोटे-छोटे बच्चों को पसीना बहाते देखा।
गाँव के एक काका ने डुग्गू से पूछा, “अरे डुग्गू! तुम सब यह क्या कर रहे हो? यह काम तो सफाई कर्मचारी का है।”
डुग्गू ने मासूमियत लेकिन दृढ़ता से कहा, “काका जी, खेलेंगे हम, तो मैदान साफ करना भी तो हमारी जिम्मेदारी है! अगर हम अपना घर साफ रख सकते हैं, तो अपना मैदान क्यों नहीं?”
काका का सिर शर्म से झुक गया। उन्होंने तुरंत अपने साथ के दो-तीन लोगों को बुलाया और बच्चों के साथ सफाई में जुट गए। देखते ही देखते, कुछ ही घंटों में वह बदबूदार मैदान एक सुंदर खेल के प्रांगण में बदल गया।
मैदान साफ करने के बाद, बाल पंचायत ने अपनी सबसे बड़ी परीक्षा का सामना करने का फैसला किया।
उस दिन रविवार था और दादा जी के दालान के पास वाले चौपाल पर गाँव की मुख्य ग्राम पंचायत की बैठक चल रही थी। सरपंच जी, गाँव के पंच, पिता जी और दादा जी सहित गाँव के कई सम्मानित बुजुर्ग वहाँ उपस्थित थे।
तभी अंशिका, शशांक, पीहू, पुच्चू और डुग्गू हाथ में एक फाइल लेकर अनुशासित तरीके से चौपाल में दाखिल हुए।
सरपंच जी ने आश्चर्य से पूछा, “अरे अंशिका बेटा! तुम सब बच्चे यहाँ क्या कर रहे हो?”
अंशिका ने आगे बढ़कर सरपंच जी और सभी बुजुर्गों को प्रणाम किया और कहा, “सरपंच जी, हम यहाँ ‘सुंदरपुर बाल पंचायत’ के प्रतिनिधि बनकर आए हैं। हमने बरगद की छाँव में अपनी पंचायत बनाई है और गाँव की समस्याओं पर विचार किया है।”
गाँव के कुछ लोग मुस्कुराने लगे, लेकिन दादा जी ने गर्व से अपने पोते-पोतियों को देखा।
शशांक ने अपनी फाइल खोली और सरपंच जी के सामने रखी। पीहू ने बोलना शुरू किया, “सरपंच जी! हमारी बाल पंचायत ने मैदान की सफाई का काम खुद श्रमदान करके पूरा कर लिया है। लेकिन दो समस्याएँ ऐसी हैं जिनके लिए हमें ग्राम पंचायत के सहयोग की आवश्यकता है।”
अंशिका ने स्पष्ट शब्दों में कहा:
शुद्ध पेयजल: स्कूल के हैंडपंप में वाटर फिल्टर (Water Filter) लगाया जाए ताकि बच्चे दूषित पानी पीकर बीमार न पड़ें।
बाल पुस्तकालय: गाँव के पंचायत भवन के एक खाली कमरे में बच्चों के लिए एक छोटी लाइब्रेरी बनाई जाए, जहाँ ज्ञानवर्धक और कहानियों की किताबें रखी जाएँ।
पिता जी ने फाइल को देखा और चौंकते हुए बोले, “इन बच्चों ने तो पूरी योजना और बजट का अनुमान भी तैयार किया है!”
सरपंच जी बच्चों की इस समझदारी, अनुशासन और आत्मविश्वास से बेहद प्रभावित हुए। वे अपनी कुर्सी से खड़े हुए और उन्होंने अंशिका और शशांक की पीठ थपथपाई।
सरपंच जी ने भरी सभा में कहा, “आज इन बच्चों ने हमें एक बड़ा सबक सिखाया है। हम बड़े अक्सर बड़ी-बड़ी बातों में अपनों से छोटों की बुनियादी जरूरतों को भूल जाते हैं। बाल पंचायत ने न केवल समस्या बताई है, बल्कि खुद पहल करके समाधान का रास्ता भी दिखाया है।”
सरपंच जी ने तुरंत घोषणा की:
स्कूल में अगले दो दिनों के भीतर नया वाटर प्यूरीफायर लगा दिया जाएगा।
पंचायत भवन का एक कमरा ‘बाल पुस्तकालय’ के लिए आवंटित किया जाएगा।
गाँव के विकास कोष से किताबों के लिए राशि दी जाएगी।
कुछ ही हफ़्तों में गाँव का नज़ारा बदल गया। स्कूल में बच्चों को साफ पानी मिलने लगा। पंचायत भवन में बना ‘बाल पुस्तकालय’ अब गाँव का सबसे पसंदीदा स्थान बन गया था, जहाँ शाम को डुग्गू, पुच्चू, पीहू, शशांक, अंशिका और गाँव के अन्य बच्चे बैठकर ज्ञानवर्धक किताबें और कहानियाँ पढ़ते थे।
एक शाम, दादा जी के दालान में पूरा परिवार बैठा हुआ था। माता जी ने सबके लिए गर्म-गर्म पकौड़े बनाए थे।
पिता जी ने कहा, “आज हमारी ग्राम पंचायत की बैठक में यह तय हुआ है कि अब से हर महीने की पहली तारीख को बड़ों की पंचायत से पहले ‘बाल पंचायत’ की बैठक होगी, ताकि बच्चों के सुझावों को गाँव की योजनाओं में शामिल किया जा सके।”
दादा जी ने मुस्कुराते हुए डुग्गू को अपनी गोद में उठाया और कहा, “देखा बच्चों! जब नीयत साफ हो और प्रयास सच्चे हों, तो छोटे-छोटे कदम भी बड़े बदलाव ला सकते हैं। तुम सबने मिलकर गाँव को एक नई दिशा दी है।”
बरगद की छाँव से शुरू हुई वह छोटी सी ‘बाल पंचायत’ आज पूरे गाँव के लिए प्रेरणा का स्रोत बन चुकी थी।
मुख्य शिक्षाएँ:
स्वच्छता और नैतिक जिम्मेदारी: अपनी समस्याओं के लिए हमेशा दूसरों या सरकार पर निर्भर रहने के बजाय खुद से श्रमदान और पहल करनी चाहिए।
लोकतांत्रिक मूल्य: संवाद, अनुशासन और संगठन के माध्यम से बड़ी से बड़ी बात शांतिपूर्ण तरीके से मनवाई जा सकती है।
सामूहिक प्रयास: जब बच्चे या नागरिक एक होकर काम करते हैं, तो समाज में सकारात्मक बदलाव आता है।
ज्ञान और तर्क का महत्व: सही तथ्य और नम्रता के साथ रखी गई बात को हर कोई स्वीकार करता है।






