
कैशलेस व्यवस्था को बढ़ावा देने के बाद अब डिजिटल भुगतान पर संभावित शुल्क को लेकर व्यंग्यकार ने सरकार की नीतियों पर सवाल उठाए हैं। लेख में दुकानदार पर लगने वाले शुल्क का बोझ अंततः ग्राहकों पर पड़ने की आशंका को उदाहरणों के साथ रखा गया है। व्यंग्य के माध्यम से पूछा गया है कि डिजिटल भुगतान की सुविधा कहीं आम नागरिक के लिए नया टोल टैक्स तो नहीं बन रही।
- कैशलेस से डिजिटल टोल तक
- क्यूआर कोड पर टोल टैक्स
- फ्री यूपीआई का बदलता दौर
- डिजिटल भुगतान की नई कीमत
आशीष तिवारी निर्मल
व्यंग्यकार/विचारक/कवि, लालगांव रीवा
डिजिटल इंडिया का डिजिटल टोल नाका
या यूं कहिए कि ऑनलाइन पेमेंट कटौती में सरकार की डकैती।
याद है 2016-17 वाला वो दौर?
मोहल्ले के पान ठेले पर भी एक लड़का आकर स्टिकर चिपका जाता था – “PhonePe / Paytm / BHIM से पेमेंट करें”। चाय की टपरी, ऑटो वाला, सब्जी वाला, सबकी दुकान पर QR कोड ऐसे चमक रहा था जैसे भारत रत्न मिल गया हो। नारा था – कैशलेस बनो, देश बदलेगा। फ्री है, जीरो MDR है, कोई चार्ज नहीं।
और हम बन भी गए। जेब में 10 रुपये का सिक्का रखना भी हमने पिछड़ापन समझ लिया।
अब कहानी का इंटरवल खत्म हुआ है, और सेकंड हाफ शुरू हो रहा है।
सरकार और उसके थिंक-टैंक अब नया ज्ञान दे रहे हैं – UPI फ्री कैसे हो सकता है? सर्वर का खर्चा है, मेंटेनेंस है, NPCI को भी तो कमाना है।
अरे? NPCI? वो संस्था जो खुद सालाना 1000 करोड़ से ज्यादा के मुनाफे में बैठी है, उसको भी अब हमारे ₹5000 के लेन-देन में से ₹20 चाहिए?
तर्क सुनिए – “ये चार्ज ग्राहक नहीं देगा, दुकानदार देगा।”
इससे बड़ा मजाक पिछले 10 साल में नहीं सुना।
इस देश में आज तक कौन सा दुकानदार है जिसने टैक्स अपनी जेब से दिया हो? सरकार तेल कंपनी से एक्साइज वसूलती है, पर ₹50 का तेल हम ₹106 में खरीदते हैं। सरकार फैक्ट्री से GST लेती है, पर साबुन-तेल का दाम हम बढ़ा हुआ चुकाते हैं।
तो जब राजू किराना वाले के खाते से ₹10,000 पर ₹40 कटेगा, तो वो क्या करेगा? वो अगले दिन दाल के भाव में ₹2 किलो जोड़ देगा। भरपाई तो आप ही करोगे।
मतलब सीधा है – आपसे ही कैश खत्म करवाया, आपको ही कैशलेस की लत लगवाई, और अब उसी लत पर टोल टैक्स लगा दिया।
ये बिल्कुल वैसा ही है जैसे पहले आपको फ्री में पार्क में टहलने की आदत डलवाई जाए, फिर कहा जाए कि अब हर चक्कर पर ₹10 लगेगा, क्योंकि घास का मेंटेनेंस है।
पहले कहा – बैंक मत जाओ, लाइन में मत लगो। अब कह रहे हैं – हर क्लिक पर पैसा दो।
सच तो ये है कि मुफ्त की चीज़ इस व्यवस्था में सिर्फ वादा होता है। सुविधा को पहले जरूरत बनाया जाता है, फिर जरूरत को मजबूरी, और फिर मजबूरी पर टैक्स लगाया जाता है।
तो अगली बार जब आप QR कोड स्कैन करो, तो सिर्फ पेमेंट मत करना, एक बार ये भी सोचना – आप सब्जी खरीद रहे हो या डिजिटल इंडिया का टोल टैक्स भर रहे हो?






