
लेख में श्रद्धा, विवेक, सकारात्मक सोच और ईमानदारी के महत्व को रेखांकित किया गया है। मोह, अहंकार और लोभ से दूर रहकर दया, परोपकार, धैर्य, सहनशीलता और अहिंसा के मार्ग पर चलने को आदर्श जीवन का आधार बताया गया है।
- ईमानदारी से निखरता है व्यक्तित्व
- अहंकार मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु
- सकारात्मक सोच से मिलती है नई ऊर्जा
- मोह और अहंकार का त्याग जरूरी
सुनील कुमार माथुर
हमारे साधु-संत कहते हैं कि जिस पर भी श्रद्धा करें, पूर्ण तन्मयता के साथ करें, क्योंकि श्रद्धा परीक्षा अवश्य ही लेती है। परीक्षा की घड़ी में यदि व्यक्ति डगमगा गया तो उसका भटकाव निश्चित है। जीवन में कैसी भी परिस्थिति आए, व्यक्ति को विवेकपूर्वक उसका सामना करना चाहिए। कठिनाइयां व्यक्ति को कमजोर नहीं, बल्कि सशक्त बनाती हैं। प्रत्येक चुनौती जीवन को निखारने के लिए आती है। यह भाव सदैव मन में बनाए रखना चाहिए।
लेकिन इंसान आज मोह और अहंकार में जी रहा है, जो उसकी सबसे बड़ी भूल है। जो व्यक्ति मोह व अहंकार में जीता है, उसे ये ऐसे बर्बाद कर देते हैं कि फिर उसे बर्बाद करने के लिए किसी शत्रु की जरूरत नहीं है। अहंकार ही मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु है। अहंकार, मोह-माया, लोभ-लालच में इंसान अच्छे-बुरे का फर्क तक भूल जाता है। अतः वे उस वक्त उसी कार्य को सर्वश्रेष्ठ मानते हैं, जिससे उन्हें लाभ होता हो। वे गलत को सही मानते हुए स्वतः ही पतन के गर्त में गिरते जाते हैं और जब उन्हें अपनी गलती का अहसास होता है, तब तक काफी देर हो चुकी होती है।
अतः इंसान को मोह व अहंकार का त्याग करना चाहिए और सकारात्मक सोच के साथ जीवन में आगे बढ़ते रहना चाहिए। सकारात्मक सोच से नई ऊर्जा का संचार होता है और हमें उत्साह व उमंग की प्राप्ति होती है, जिसके कारण हम अपनी मंजिल को पूरी ईमानदारी व निष्ठा के साथ प्राप्त कर सकते हैं। ईमानदारी जीवन का अनमोल रत्न है, जो हमें कंचन की तरह बनाता है, वहीं दूसरी ओर हमारे व्यक्तित्व में निखार आता है।
इसलिए इंसान को लड़ाई-झगड़ों से दूर रहना चाहिए और दया, परोपकार, धैर्य, सहनशीलता, मिलनसारिता, वात्सल्य, अहिंसा, त्याग, संयम का मार्ग अपनाते हुए आदर्श जीवन व्यतीत करना चाहिए। जो अहंकार-मुक्त जीवन व्यतीत करता है, वही सुखी रहता है और महान व्यक्तित्व का धनी कहलाता है।
सुनील कुमार माथुर
सदस्य अणुव्रत लेखक मंच एवं
स्वतंत्र लेखक व पत्रकार, पालरोड,
जोधपुर, राजस्थान






