
कृष्णनंदन सिंह की आत्मकथा ‘जीवन संचिका’ केवल उनके निजी जीवन का दस्तावेज नहीं, बल्कि इंदुपुर और बड़हिया के पुराने ग्रामीण-कस्बाई परिवेश, सामाजिक जीवन, शिक्षा व्यवस्था और वहां के लोगों के संघर्ष एवं उपलब्धियों की कहानी भी प्रस्तुत करती है। पुस्तक में लेखक ने अपने गांव की स्मृतियों और सामाजिक जीवन के अनेक प्रसंगों को आत्मीयता के साथ दर्ज किया है।
- कृष्णनंदन सिंह की आत्मकथा में इंदुपुर की ग्राम-कथा
- ‘जीवन संचिका’ में दर्ज इंदुपुर के बीते समय की कहानी
- शिक्षक और लेखक कृष्णनंदन सिंह की साहित्यिक विरासत
- इंदुपुर के सामाजिक जीवन का रोचक दस्तावेज ‘जीवन संचिका’
राजीव कुमार झा
बिहार के लखीसराय जिले के बड़हिया स्थित इंदुपुर के लेखक कृष्णनंदन सिंह की लिखित पुस्तक ‘जीवन संचिका’ के प्रारंभिक हिस्सों में उनके अपने गांव इंदुपुर और बड़हिया के पुराने परिवेश का वर्णन है और इसमें लेखक ने अपने घर-परिवार, आस-पड़ोस, स्कूल और अपने तत्कालीन सामाजिक संपर्क के लोगों के बारे में प्रस्तुत चर्चाओं के माध्यम से आज से अस्सी-पचासी साल पहले के ग्रामीण-कस्बाई समाज में यहां के लोगों की आत्मीयता और उनके सरल-निश्छल जीवन में व्याप्त संघर्ष और प्रेम भाव का सहज चित्रण किया है। यह किताब कृष्णनंदन सिंह ने खुद प्रकाशित करवाया था और पुस्तक प्रकाशन के बारे में ठीक से सारी बातों की जानकारी नहीं होने के कारण इसमें उनको काफी कठिनाई का सामना भी करना पड़ा था।
पुस्तक की प्रस्तावना में इंदुपुर के समाजवादी नेता और कार्यकर्ता रामसागर सिंह ने अत्यंत स्नेह भाव से कृष्णनंदन सिंह के प्रति अपने प्रेम-भाव को प्रकट किया है और उनके जीवन संघर्ष, साधना, उपलब्धि के प्रति आशीर्वचन के रूप में अपने अंतर्मन के भावों की अभिव्यक्ति से सबके मन को अभिभूत किया है। कृष्णनंदन सिंह का कुछ महीने पहले देहावसान हो गया और बीमार होने पर वह इलाज के लिए बेगूसराय गए थे, लेकिन बच नहीं पाए। गुजर गए, यद्यपि उन्होंने दीर्घ जीवन प्राप्त किया और सरकारी शिक्षक के रूप में सेवानिवृत्त होने के बाद इंदुपुर में रहकर साहित्य लेखन और समाजसेवा के कार्यों में संलग्न रहे।
कृष्णनंदन सिंह की यह पुस्तक उनकी आत्मकथा है, लेकिन इसे सिर्फ इसी रूप में देखना-समझना समीचीन नहीं होगा और इसमें यह कहा जा सकता है कि उन्होंने संक्षेप में अपने गांव इंदुपुर की उन सभी कथाओं को भी शामिल किया है, जिनका प्रभाव अमिट रूप में उनके हृदय पर बाल्यावस्था से ही अंकित होता रहा। सचमुच, इस रूप में कृष्णनंदन सिंह की यह पुस्तक ग्राम-कथा के रूप में भी स्वीकार की जा सकती है और इसमें इंदुपुर में जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में उपलब्धियां अर्जित करने वाले लोगों की कहानी को लेखक ने दर्ज किया है और इन सबको पढ़ना यहां एक दिलचस्प और रोचक अनुभव बनता प्रतीत होता है।
कृष्णनंदन सिंह एक आदर्श शिक्षक थे और इस अनुरूप उन्होंने अपनी इस पुस्तक में इंदुपुर में उनके जीवन के विभिन्न कालों में यहां की शिक्षा व्यवस्था और इस क्षेत्र में होने वाले बदलावों और इसमें निरंतर उपलब्धियों को प्राप्त करने वाले लोगों और उनके कार्यों पर विशेष रूप से नजर डाली है। सचमुच, किसानों के अलावा गांवों में शिक्षा के क्षेत्र में उन्नति, प्रगति और विकास करने वाले लोग उस गांव की कथा में विकास के नए अध्यायों को लिखते हैं और वह एक तरह से उस गांव के सामुदायिक जीवन की सबसे रोचक कथा होती है, जिसमें आदमी की गरीबी, समाज के माहौल से लेकर व्यक्ति के जीवन संघर्ष से जुड़ी असंख्य बातों के बीच से वर्णित कुछ बातों को हम समाज के यथार्थ के आख्यान के रूप में भी देख सकते हैं। कृष्णनंदन सिंह की लिखित पुस्तक ‘जीवन संचिका’ को इसी अनुरूप देखा और पढ़ा जाना चाहिए।







