
लेखिका डॉ. अनामिका से उनके कविता संग्रह ‘भावनाओं की आवाज’ की विषयवस्तु, रचना प्रक्रिया, साहित्यिक प्रेरणाओं, हिंदी शिक्षा, कहानी और उपन्यास लेखन को लेकर विस्तृत बातचीत। साक्षात्कार में समकालीन साहित्य, समाज, रचनात्मकता और नई पीढ़ी के बीच हिंदी को लेकर भी विचार साझा किए गए हैं। नोएडा की लेखिका डॉ. अनामिका से राजीव कुमार झा की बातचीत…
- डॉ. अनामिका ने साझा की अपनी साहित्यिक रचना यात्रा
- भावनाओं की आवाज से उपन्यास लेखन तक डॉ. अनामिका का सफर
- हिंदी, साहित्य और रचनात्मक लेखन पर डॉ. अनामिका से बातचीत
- साहित्य समाज की सच्चाइयों को शब्द देने का सशक्त माध्यम
प्रश्न 1. आपका कविता संग्रह ‘भावनाओं की आवाज’ प्रकाशित हुआ है। इस कविता संग्रह की कविताओं की विषयवस्तु, इसके सरोकारों और रचना प्रक्रिया से जुड़ी अन्य बातों को लेकर क्या कहना चाहेंगी?
हमने अपने ‘भावनाओं की आवाज’ नामक काव्य-संग्रह में कविताओं को पाँच भागों में विभाजित किया गया है—प्रेमपरक कविताएँ, नारी-विमर्श से संबंधित कविताएँ, मातृप्रेम से जुड़ी कविताएँ, सामाजिक विषयों पर आधारित कविताएँ तथा प्रेरणापरक कविताएँ। हमारी रचनात्मक यात्रा में इस संग्रह की प्रथम कविता का विशेष महत्त्व है। यह कविता हमने अपने स्वप्न में बुनी थी और चेतन अवस्था में उसे शब्दों का आकार दिया। हमारे लिए यह अनुभव केवल कविता के जन्म की घटना नहीं, बल्कि अवचेतन और चेतन के बीच भावनाओं के एक अद्भुत संवाद का अनुभव भी है। इसी कारण यह कविता हमारे काव्य-संसार में एक विशेष स्थान रखती है।
इस काव्य-संग्रह के विषयों को पाँच अलग-अलग भागों में रखने के पीछे हमारा उद्देश्य केवल विषय-विविधता प्रस्तुत करना नहीं है, बल्कि अधिक से अधिक पाठकों तक अपनी और उनकी भावनाओं और संवेदनाओं को पहुँचाना भी है। यदि इस संग्रह में केवल एक ही प्रकार की कविताएँ होतीं, तो संभवतः इसका पाठक-वर्ग भी सीमित हो जाता। हमारे लिए कविता केवल शब्दों का संयोजन नहीं है। कविता उन भावनाओं को आवाज़ देने का माध्यम है, जो कभी कही जाती हैं, कभी अनकही रह जाती हैं। हमने इन्हीं व्यक्त और अव्यक्त भावनाओं के मिश्रण को शब्दों में बाँधने का प्रयास किया है।
हमारी इच्छा है कि पाठक इन कविताओं को केवल पढ़े नहीं, बल्कि उन्हें महसूस करे, अपने जीवन से जोड़े और कहीं न कहीं उनमें स्वयं को तलाशे। अंततः, यह काव्य-संग्रह हमारे लिए हमारी भावनाओं की वह आवाज़ है, जो शब्दों के माध्यम से पाठकों तक पहुँच रही है और उनके विचार, उनकी प्रतिक्रियाएँ और उनकी अनुभूतियाँ ही इस काव्य-यात्रा को पूर्णता प्रदान करेंगी।
प्रश्न 2. आप नोएडा के किसी कॉलेज में सहायक प्राध्यापिका के पद पर कार्यरत हैं। अपने घर-परिवार, शिक्षा-दीक्षा और शोध कार्य के अलावा अपनी अन्य रचनात्मक गतिविधियों और अभिरुचि के कार्यों के बारे में जानकारी दीजिए।
व्यावसायिक (शिक्षण) और पारिवारिक जिम्मेदारियों को निभाते हुए जो थोड़ा-सा समय हमें स्वयं के लिए मिलता है, उसमें हम कुछ पढ़ना और लेखन करना पसंद करते हैं। लेखन मेरे लिए किसी निश्चित समय-सारिणी में बँधा हुआ कार्य नहीं है। जब मन करता है, समय मिलता है और भीतर कोई भाव दस्तक देता है, तो हम उसे शब्दों में ढालने का प्रयास करते हैं। लोग जीवन में किन परिस्थितियों और समस्याओं से गुजर रहे हैं, उनके मन में कौन-सी आकांक्षाएँ हैं और वे आज के समय में समाज और जीवन में किस प्रकार का परिवर्तन लाना चाहते हैं। उनकी कही-अनकही बातों और अनुभवों को समझकर उन्हें लेखन का विषय बनाते हैं। इसीलिए हमारी रचनाओं में केवल हमारे व्यक्तिगत भाव ही नहीं, बल्कि समाज और उससे जुड़े लोगों की संवेदनाएँ भी कहीं न कहीं प्रतिबिंबित होती हैं।
आज का समय तकनीक और डिजिटल का युग है। इसलिए हमने आधुनिक संचार माध्यमों को भी अपनी रचनात्मक यात्रा का हिस्सा बनाया है। इंस्टाग्राम और यूट्यूब जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से हम अपनी रचनाओं को पाठकों और श्रोताओं तक पहुँचाने का प्रयास करते हैं। इन माध्यमों ने लेखक और पाठक के बीच की दूरी को कम किया है और मुझे अपनी रचनाओं पर लोगों की प्रतिक्रियाएँ जानने का अवसर भी शीघ्र मिल जाता है।
कभी-कभी स्वतः लेखनी से गीत फूट पड़ते हैं और हम एआई की सहायता से उन्हें स्वरबद्ध कर श्रोताओं के समक्ष प्रस्तुत करने का प्रयास करते हैं। हमारे लिए यह तकनीक रचनात्मकता का विकल्प नहीं, बल्कि अपनी रचनाओं को एक नए माध्यम और नए श्रोता-वर्ग तक पहुँचाने का साधन है। इस प्रकार शिक्षण, परिवार, समाज से जुड़ाव, पठन-पाठन, लेखन और आधुनिक डिजिटल माध्यम—ये सभी हमारी रचनात्मक यात्रा के अलग-अलग पड़ाव हैं। इन्हीं अनुभवों से मेरी भावनाएँ आकार लेती हैं और फिर शब्दों के माध्यम से पाठकों तक पहुँचती हैं।
प्रश्न 3. आपको किन-किन लेखकों की पुस्तकों और उनकी रचनाओं को पढ़ना पसंद आता रहा। इस प्रश्न को दूसरे शब्दों में भी कहना चाहूँगा कि जिन लेखकों ने आपको प्रभावित किया, उनके बारे में बताइए।
गद्य के क्षेत्र में जिन रचनाकारों की पुस्तकों और रचनाओं ने हमें विशेष रूप से प्रभावित किया है, उनमें भारतेन्दु हरिश्चंद्र, मुंशी प्रेमचंद, जयशंकर प्रसाद, महादेवी वर्मा, मैत्रेयी पुष्पा, कांता भारती, धर्मवीर भारती, भगवतीचरण वर्मा, जैनेंद्र कुमार, अज्ञेय, राजेंद्र यादव, मन्नू भंडारी, फणीश्वरनाथ ‘रेणु’, कृष्णा सोबती आदि प्रमुख हैं। इनके उपन्यासों, कहानियों और अन्य गद्य रचनाओं को पढ़ते हुए हमें यह अनुभव हुआ कि साहित्य केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं है, बल्कि वह समाज की वास्तविकताओं, विसंगतियों, संघर्षों और मानवीय संवेदनाओं को सामने लाने का सशक्त माध्यम भी है।
काव्य के क्षेत्र में भी अनेक महान कवियों की रचनाओं ने हमें संवेदना और लेखन-दृष्टि को प्रभावित किया है। कबीर, सूरदास, तुलसीदास, महादेवी वर्मा, सुमित्रानंदन पंत, सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’, रामधारी सिंह ‘दिनकर’, दुष्यंत कुमार, हरिवंश राय बच्चन, नागार्जुन, अज्ञेय, भारतेन्दु हरिश्चंद्र, मैथिलीशरण गुप्त और गजानन माधव मुक्तिबोध आदि जैसे रचनाकारों की कविताओं ने हमें विशेष रूप से प्रेरित किया है। इन कवियों की रचनाओं को पढ़ते हुए हमें यह समझने का अवसर मिला कि कविता केवल किसी एक भाव या विषय तक सीमित नहीं होती। उसमें प्रेम हो सकता है, विद्रोह हो सकता है, प्रकृति हो सकती है, सामाजिक सरोकार हो सकते हैं, व्यक्ति की पीड़ा हो सकती है, व्यवस्था पर प्रश्न हो सकते हैं और परिवर्तन की आकांक्षा भी हो सकती है।
इन सभी रचनाकारों से हमें सबसे बड़ी प्रेरणा यही मिली कि लेखनी को किसी एक विषय या क्षेत्र की सीमा में बाँधकर नहीं रखा जा सकता। लेखनी का वास्तविक उद्देश्य है—जीवन और समाज के विभिन्न पक्षों को देखना, उन्हें महसूस करना और आवश्यकता पड़ने पर उन्हें शब्द देना। इसी विश्वास के साथ हम भी अपनी लेखनी को किसी निश्चित सीमा में बाँधना नहीं चाहते। जहाँ संवेदना है, वहाँ साहित्य है; जहाँ प्रश्न है, वहाँ लेखनी है; और जहाँ कोई अनकही बात है, वहाँ उसे शब्द देने की संभावना है। हमारी कोशिश यही है कि हमारी लेखनी जीवन के अधिक से अधिक पक्षों को स्पर्श कर सके और पाठक को केवल पढ़ने के लिए नहीं, बल्कि सोचने, महसूस करने और अपने आसपास के संसार को एक नए दृष्टिकोण से देखने के लिए भी प्रेरित करे।
प्रश्न 4. आप विद्यालय हिंदी शिक्षा के क्षेत्र में भी सक्रिय रही हैं। देश में इस स्तर पर हिंदी शिक्षा को रचनात्मक रूप प्रदान करने के लिए क्या कार्य किया जाना चाहिए?
यदि हमें हिंदी को रचनात्मक रूप से समृद्ध और नई पीढ़ी के जीवन से जोड़ना है, तो इसका पहला प्रयास हमें परिवार से ही आरंभ करना होगा। माता-पिता और बच्चों को हिंदी के महत्त्व को समझना होगा। आज हिंदी बोलने वाले बहुत से लोगों के मन में भी हिंदी को लेकर एक प्रकार की हीनभावना दिखाई देती है। यहाँ एक महत्वपूर्ण बात समझने की आवश्यकता है—हिंदी केवल बोलचाल की भाषा नहीं है; हिंदी एक समृद्ध साहित्यिक और रचनात्मक भाषा भी है। उसकी अपनी व्यापक साहित्यिक परंपरा, शब्द-संपदा, अभिव्यक्ति की क्षमता और चिंतन की शक्ति है।
विशेष रूप से उन बच्चों की ओर ध्यान देने की आवश्यकता है, जिनके भीतर हिंदी के प्रति रचनात्मक प्रतिभा है। कई बार बच्चे कविता लिखना चाहते हैं, कहानी कहना चाहते हैं, निबंध लिखना चाहते हैं या अपने अनुभवों को शब्द देना चाहते हैं, लेकिन परिवार या समाज से पर्याप्त प्रोत्साहन न मिलने के कारण वे अपनी प्रतिभा को आगे नहीं बढ़ा पाते। कभी-कभी उनमें यह भावना भी उत्पन्न हो जाती है कि हिंदी में रचनात्मक कार्य करना उपयोगी नहीं माना जाएगा। ऐसी मानसिकता उनकी स्वाभाविक रचनात्मकता को दबा सकती है।
इसलिए आधुनिक डिजिटल मीडिया जैसे समय में ऑनलाइन या ऑफलाइन माध्यम द्वारा विद्यालयों, महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों में हिंदी की रचनात्मकता को प्रोत्साहित करने के लिए नियमित रूप से काव्य-गोष्ठियाँ, कहानी लेखन, निबंध लेखन, भाषण, वाद-विवाद तथा अन्य साहित्यिक प्रतियोगिताओं का आयोजन किया जाना चाहिए। बच्चों को केवल हिंदी का पाठ्यक्रम पूरा कराने के बजाय उन्हें हिंदी में सोचने, लिखने, बोलने और अपनी अनुभूतियों को अभिव्यक्त करने के अवसर भी देने चाहिए।
इसके साथ ही समय-समय पर भाषा और व्याकरण से संबंधित कार्यशालाएँ तथा रचनात्मक लेखन की कार्यशालाएँ आयोजित की जा सकती हैं। हमारा मानना है कि हिंदी की सृजनात्मक शक्ति को नई पीढ़ी तक पहुँचाने का सबसे प्रभावी तरीका है—उसे अवसर देना, उसे सुनना और उसकी रचनात्मकता को सम्मान देना।हिंदी के माध्यम से हम केवल साहित्य नहीं रचते, बल्कि अपनी संवेदनाओं, अनुभवों, प्रश्नों और विचारों को अभिव्यक्ति देते हैं। इसलिए हिंदी को केवल एक विषय के रूप में नहीं, बल्कि सृजन, चिंतन और अभिव्यक्ति की जीवंत भाषा के रूप में नई पीढ़ी के सामने प्रस्तुत करना आवश्यक है।
प्रश्न 5. आपकी अभिरुचि कहानी लेखन में भी है। महानगरीय पृष्ठभूमि के लेखकों की कहानियों में समाज और जीवन की सहज परिस्थितियों की जगह ज्यादातर उनमें वैषम्यता, चिंता, अलगाव, क्षोभ आदि मनोभावों की अभिव्यक्ति साहित्य के मूल आस्वादन में संकट की प्रवृत्तियों को कायम करती हैं। इस बारे में आपका क्या मत है। आखिर आज के लेखक, खासकर कहानीकार, समाज और परिवेश के साथ मनुष्य के रिश्तों के बारे में क्या सोचते हैं?
आज के समकालीन कहानीकारों की रचनाओं में समाज, पर्यावरण और मनुष्य के बीच बदलते संबंधों तथा उनसे उत्पन्न टकरावों को विशेष महत्त्व दिया जा रहा है। समकालीन कहानी का स्वरूप जीवन की वास्तविक परिस्थितियों से गहराई से जुड़ा हुआ दिखाई देता है। यहाँ कल्पना और आदर्शवाद की अपेक्षा यथार्थवादी दृष्टि अधिक प्रभावशाली रूप में सामने आती है। आज का कहानीकार अपने आसपास के जीवन को जिस रूप में देखता और अनुभव करता है, उसे उसी के निकटतम रूप में अपनी रचनाओं में प्रस्तुत करने का प्रयास करता है। उसके सामने समाज की विसंगतियाँ, संघर्ष, संबंधों में आते परिवर्तन, व्यक्ति की मानसिक स्थितियाँ और पर्यावरण से जुड़े प्रश्न होते हैं। वह इन परिस्थितियों को किसी कृत्रिम आदर्श के आवरण में ढकने के बजाय उनके वास्तविक स्वरूप को पाठक के सामने रखने का प्रयास करता है।
समकालीन कहानी की विशेषता यह भी है कि उसमें यथार्थ को सजाने या छिपाने के बजाय उसे पहचानने और अभिव्यक्त करने का प्रयास दिखाई देता है। इस प्रकार समकालीन कहानी हमारे समय का एक साहित्यिक दस्तावेज बन जाती है। वह हमें यह देखने का अवसर देती है कि हमारा समाज किस दिशा में बदल रहा है, मनुष्य किन परिस्थितियों से गुजर रहा है और उसके संबंधों तथा परिवेश में किस प्रकार के तनाव और परिवर्तन उत्पन्न हो रहे हैं। हमारे विचार से साहित्य का महत्त्व इसी में है कि वह अपने समय की सच्चाइयों से आँख न चुराए। जो दिखाई देता है, जो महसूस होता है और जो समाज के भीतर घटित हो रहा है, उसे ईमानदारी से शब्द देना ही यथार्थवादी लेखन की सबसे बड़ी शक्ति है।
प्रश्न 6. आप उपन्यास लेखन भी कर रही हैं। इसके बारे में बताइए। इस उपन्यास को लिखते हुए जिन मुद्दों से रूबरू होने का मौका आपको मिला है, उनसे अवगत कराएँ।
उपन्यास विधा जीवन और समाज का विस्तृत कैनवास है। जब हमारे मन में उपन्यास लिखने का विचार आया, तो सबसे पहले मेरे भीतर यह भाव आया कि उपन्यास गद्य की एक अत्यंत विस्तृत और व्यापक विधा है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता यही है कि इसमें जीवन और समाज के अनेक पक्षों को एक साथ समेटने की पर्याप्त संभावनाएँ होती हैं। इसलिए मैंने यह उचित नहीं समझा कि उपन्यास को केवल किसी एक विषय या एक समस्या तक सीमित रखा जाए।
हमारे उपन्यास की रचना के पीछे मूल उद्देश्य यही रहा है कि परिवार, समाज और हमारे आसपास के परिवेश से जुड़े विभिन्न पहलुओं को एक व्यापक दृष्टि के साथ प्रस्तुत किया जाए। हमारे दैनिक जीवन में अनेक ऐसी परिस्थितियाँ और समस्याएँ होती हैं, जो धीरे-धीरे हमारे पारिवारिक और सामाजिक जीवन को प्रभावित करती हैं। इन समस्याओं को केवल सामने रखना ही पर्याप्त नहीं है; यह समझना भी आवश्यक है कि उनके पीछे के कारण क्या हैं और उनके संभावित समाधान क्या हो सकते हैं।
इसी दृष्टि से मैंने उपन्यास में समाज, परिवार और जीवन से जुड़े विभिन्न विषयों को आधार बनाया है। प्रयास यह रहा है कि जो कुछ वास्तव में हमारे आसपास घटित हो रहा है, जो घटित होता आया है और वर्तमान परिस्थितियों में जो परिवर्तन दिखाई दे रहे हैं, उन्हें यथार्थ के धरातल पर देखा जाए। साथ ही यह प्रश्न भी उठाया जाए कि भविष्य में हमें किस प्रकार के समाज और पारिवारिक परिवेश की आवश्यकता है। हमारे लिए उपन्यास केवल घटनाओं का क्रम प्रस्तुत करने का माध्यम नहीं है। यह जीवन को व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखने और उसके विभिन्न आयामों पर विचार करने का अवसर देता है।
हमने यह भी अनुभव किया है कि समाज का कोई भी प्रश्न अकेला नहीं होता। एक समस्या दूसरी समस्या से जुड़ी होती है और उसका प्रभाव व्यक्ति से परिवार तथा परिवार से समाज तक पहुँचता है। इसी परस्पर संबंध को समझने के लिए उपन्यास की विस्तृत विधा मुझे सबसे अधिक उपयुक्त लगी। उन प्रश्नों को समझना और फिर यह विचार करना कि उसमें सकारात्मक परिवर्तन की संभावनाएँ कहाँ हैं—यही इस उपन्यास की रचनात्मक दृष्टि का एक महत्वपूर्ण आधार है।







