
रक्षाबंधन केवल भाई-बहन के प्रेम और सुरक्षा का पर्व नहीं, बल्कि रिश्तों, संस्कारों, समाज, संस्कृति और राष्ट्र के प्रति जिम्मेदारी का संदेश देने वाला पर्व भी है। राखी की डोर हमें अपने कर्तव्यों का स्मरण कराते हुए माता-पिता के सम्मान, बुजुर्गों की देखभाल, जरूरतमंदों की सहायता और राष्ट्र के प्रति ईमानदार जिम्मेदारी निभाने का संकल्प देती है। इस रक्षाबंधन पर एक राखी भाई की कलाई पर और एक संकल्प प्रकृति की रक्षा के लिए लेकर पर्व को सामाजिक और पर्यावरणीय जिम्मेदारी से जोड़ने का आह्वान किया गया है।
- राखी की डोर से रिश्तों, समाज और राष्ट्र को जोड़ने का संदेश
- रक्षाबंधन: भाई-बहन के रिश्ते से आगे जिम्मेदारियों का पर्व
- एक राखी कलाई पर, एक संकल्प हृदय में
- इस रक्षाबंधन पर रिश्तों के साथ प्रकृति की रक्षा का लें संकल्प
देहरादून। रक्षाबंधन का पर्व भारतीय संस्कृति में भाई-बहन के प्रेम, विश्वास और सुरक्षा के पवित्र रिश्ते का प्रतीक माना जाता है। बहन जब भाई की कलाई पर राखी बांधती है तो उसके पीछे केवल एक परंपरा नहीं, बल्कि भावनाओं, स्मृतियों, विश्वास और जीवनभर साथ निभाने का संकल्प जुड़ा होता है। वहीं भाई के लिए भी राखी केवल कलाई पर बंधा धागा नहीं, बल्कि बहन की सुरक्षा, सम्मान और उसके सुख-दुख में साथ खड़े रहने की जिम्मेदारी का प्रतीक होती है।
कल्पना कीजिए उस बहन की, जो अपने भाई की कलाई पर राखी बांधते हुए मन ही मन कहती होगी- “भैया! तुम देश की सीमा पर रहकर लाखों बहनों की रक्षा करना, मैं यहां तुम्हारे लौटने की प्रार्थना करूंगी।” यह भाव केवल किसी एक परिवार का नहीं है, बल्कि पूरे राष्ट्र की भावना को व्यक्त करता है। हालांकि राष्ट्र की रक्षा केवल सीमा पर तैनात सैनिक ही नहीं करते, बल्कि समाज का प्रत्येक जिम्मेदार नागरिक अपने कर्तव्यों का ईमानदारी से पालन करके राष्ट्र निर्माण में योगदान देता है। रक्षाबंधन के अवसर पर पढ़ा जाने वाला रक्षा सूत्र मंत्र भी इसी भावना को व्यक्त करता है-
“येन बद्धो बलिराजा दानवेन्द्रो महाबलः।
तेन त्वामभिबध्नामि रक्षे मा चल मा चल॥”
अर्थात जिस रक्षा सूत्र से महाबली राजा बलि को बांधा गया था, उसी रक्षा सूत्र से मैं तुम्हें बांधता हूं। हे रक्षासूत्र! तुम अडिग रहना और अपने संकल्प से कभी विचलित मत होना। रक्षाबंधन पर धागे में बंधा यह संकल्प वास्तव में रिश्तों की मजबूती का प्रतीक है। बहन जब भाई की कलाई पर राखी बांधती है तो वह केवल एक धागा नहीं बांधती। वह अपने बचपन की यादों, साझा अनुभवों, पारिवारिक संस्कारों और विश्वास को भी उस डोर में पिरोती है। उसकी आंखों में एक मौन प्रार्थना होती है कि जीवन चाहे कितना भी बदल जाए, भाई-बहन के रिश्ते में विश्वास और अपनापन कभी कम न हो। भाई के मन में भी इसी समय एक संकल्प जन्म लेता है कि बहन के जीवन में जब भी कोई कठिनाई आएगी, वह उसके साथ खड़ा रहेगा।
रुद्रपुर में आठ सड़कों का होगा निर्माण, हॉटमिक्स और डामरीकरण
यही भावना रक्षाबंधन को महज एक त्योहार से आगे बढ़ाकर रिश्तों और जिम्मेदारियों का पर्व बनाती है। भारतीय संस्कृति की खूबसूरती यह है कि वह किसी भी पर्व को केवल व्यक्तिगत संबंधों तक सीमित नहीं रखती। एक छोटे से पारिवारिक संस्कार को भी व्यापक सामाजिक संदेश में बदलने की क्षमता भारतीय पर्वों में दिखाई देती है। रक्षाबंधन भी इसी परंपरा का हिस्सा है। रक्षा केवल बहन की नहीं करनी है। रक्षा रिश्तों की करनी है। रक्षा संस्कारों की करनी है। रक्षा समाज की करनी है। रक्षा संस्कृति की करनी है। रक्षा राष्ट्र की करनी है और उस प्रकृति की भी करनी है, जिसके बिना मानव जीवन की कल्पना संभव नहीं है। आज जब परिवारों में संवाद की कमी, पीढ़ियों के बीच बढ़ती दूरी और सामाजिक जिम्मेदारियों से बचने की प्रवृत्ति दिखाई देती है, ऐसे समय में रक्षाबंधन हमें अपने रिश्तों और दायित्वों की ओर लौटने का अवसर देता है।
सैनिकों की राखी में राष्ट्र की सुरक्षा का संदेश
हम अक्सर कहते हैं कि देश की रक्षा सैनिक करते हैं। यह सत्य है और इस सत्य के सामने प्रत्येक नागरिक का सिर श्रद्धा से झुक जाता है। सीमा पर खड़ा सैनिक अपने घर की राखी, परिवार का स्नेह और व्यक्तिगत सुख पीछे छोड़कर राष्ट्र की सुरक्षा के लिए तैनात रहता है। किसी सैनिक की कलाई पर बंधी राखी में केवल उसकी बहन का प्रेम नहीं होता, बल्कि भारत माता की रक्षा का आशीर्वाद भी होता है। जब देश की लाखों बहनें अपने भाइयों की कलाई पर रक्षा सूत्र बांधती हैं, तब कहीं न कहीं उस भावना का विस्तार राष्ट्र की सुरक्षा तक भी होता है। लेकिन राष्ट्र की रक्षा केवल सीमा पर बंदूक उठाने से नहीं होती।
जब कोई शिक्षक अपने विद्यार्थियों में चरित्र और जिम्मेदारी का निर्माण करता है, तब वह भी राष्ट्र की रक्षा करता है। जब किसान कठिन परिश्रम करके खेतों में अन्न उगाता है, तब वह राष्ट्र की सेवा करता है। जब चिकित्सक ईमानदारी और संवेदनशीलता से रोगी का उपचार करता है, तब वह समाज को मजबूत बनाता है। जब कोई वैज्ञानिक देश को आत्मनिर्भर बनाने के लिए अनुसंधान करता है और जब कोई सामान्य नागरिक ईमानदारी से अपना कर्तव्य निभाता है, सार्वजनिक संपत्ति की रक्षा करता है, कानून का सम्मान करता है तथा देश की एकता और सामाजिक सद्भाव को मजबूत करता है, तब वह भी राष्ट्र निर्माण में अपनी भूमिका निभाता है। इसलिए इस रक्षाबंधन पर हमें अपने भीतर एक ऐसी अदृश्य राखी बांधने की जरूरत है, जो हमें अपने कर्तव्य से जोड़ सके।
आधुनिकता के साथ संस्कृति की रक्षा जरूरी
आज का भारत विज्ञान, तकनीक और आधुनिकता के क्षेत्र में तेजी से आगे बढ़ रहा है। दुनिया के साथ कदम से कदम मिलाना समय की आवश्यकता है। लेकिन आधुनिकता का अर्थ अपनी जड़ों और सांस्कृतिक मूल्यों को भूल जाना नहीं है। राखी बाजार से खरीदा हुआ केवल एक धागा नहीं है। इसके पीछे हजारों वर्षों की सांस्कृतिक चेतना, पारिवारिक परंपराएं और सामाजिक मूल्यों की भावना जुड़ी हुई है। भारतीय पर्व जीवन मूल्यों को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंचाने वाले माध्यम रहे हैं।
हमारे त्योहार हमें जोड़ते हैं। वे हमें बताते हैं कि जीवन केवल अपने लिए जीने का नाम नहीं है। परिवार, समाज, प्रकृति और राष्ट्र के प्रति भी हमारा दायित्व है। इस दृष्टि से हमारे पर्व वास्तव में संस्कृति की जीवित पाठशालाएं हैं। संस्कृति की रक्षा का अर्थ केवल पुरानी परंपराओं को दोहराते रहना नहीं है। संस्कृति की वास्तविक रक्षा तभी होगी, जब उसके मूल्यों को अपने जीवन में उतारा जाएगा।
प्रकृति की रक्षा की भी जरूरत
आज प्रकृति लगातार मानव समाज को संकेत दे रही है कि उसके संसाधनों का असीमित दोहन भविष्य के लिए गंभीर चुनौती बन सकता है। जलस्रोतों का प्रदूषण, पेड़ों की कटाई, बढ़ता तापमान और पर्यावरणीय असंतुलन मानव जीवन को प्रभावित कर रहे हैं। ऐसे में क्यों न इस रक्षाबंधन पर एक नई परंपरा शुरू की जाए- एक राखी भाई की कलाई पर और एक राखी वृक्ष की शाखा पर। यदि प्रत्येक परिवार हर वर्ष कम से कम एक वृक्ष की जिम्मेदारी लेने का संकल्प करे और उसे केवल लगाने तक सीमित न रखते हुए उसके संरक्षण की जिम्मेदारी भी निभाए, तो आने वाली पीढ़ियों के लिए एक बड़ी प्राकृतिक विरासत तैयार की जा सकती है। रक्षा का अर्थ केवल अधिकार नहीं, बल्कि उत्तरदायित्व भी है। जिस व्यक्ति, रिश्ते, समाज या प्रकृति की रक्षा करने का हम संकल्प लेते हैं, उसके प्रति हमारी जिम्मेदारी भी बढ़ जाती है।
एक राखी, अनेक संकल्प
इस बार जब बहन अपने भाई की कलाई पर राखी बांधे तो भाई केवल उपहार देने तक सीमित न रहे। दोनों मिलकर कुछ ऐसे संकल्प लें, जिनका प्रभाव उनके परिवार और समाज पर भी पड़े। वे संकल्प ले सकते हैं कि माता-पिता का सम्मान करेंगे। परिवार में संवाद बनाए रखेंगे। बुजुर्गों को अकेला नहीं छोड़ेंगे। बच्चों को अच्छे संस्कार देंगे। जरूरतमंदों की सहायता करेंगे। सार्वजनिक संपत्ति को अपनी संपत्ति की तरह समझेंगे। प्रकृति को नुकसान नहीं पहुंचाएंगे। पानी और पेड़ों का संरक्षण करेंगे तथा देश की एकता और सामाजिक सद्भाव को मजबूत करने में अपनी भूमिका निभाएंगे।
यदि रक्षाबंधन केवल राखी बांधने और उपहार देने का पर्व न रहकर इन संकल्पों का पर्व बन जाए, तो समाज की कई समस्याएं धीरे-धीरे कम हो सकती हैं। वस्तुएं समय के साथ पुरानी हो जाती हैं, लेकिन सच्चा संकल्प जीवनभर साथ रहता है। उपहार कुछ समय के लिए खुशी देता है, जबकि एक अच्छा संकल्प पूरे जीवन की दिशा बदल सकता है।
कलाई पर राखी और हृदय में संकल्प
रक्षाबंधन की राखी कलाई पर बंधती है, लेकिन उसका वास्तविक अर्थ हृदय में उतरना चाहिए। उसकी डोर हमें बचपन से जोड़ती है, परिवार से जोड़ती है, समाज से जोड़ती है, संस्कृति से जोड़ती है और अंततः राष्ट्र से जोड़ती है। यह पवित्र धागा हमें याद दिलाता है कि जीवन में केवल अपने सुख की चिंता करना पर्याप्त नहीं है। हमारे आसपास मौजूद लोगों, प्रकृति और समाज के प्रति भी हमारी जिम्मेदारी है। इसलिए इस रक्षाबंधन पर एक राखी कलाई पर बांधिए और एक संकल्प हृदय में। एक रिश्ता बचाइए। एक बुजुर्ग का हाथ थामिए। किसी जरूरतमंद की सहायता कीजिए। एक वृक्ष बचाइए। एक जलस्रोत को स्वच्छ रखिए। सार्वजनिक संपत्ति की रक्षा कीजिए और अपने कर्तव्य को ईमानदारी से निभाने का संकल्प लीजिए। तभी राखी का यह धागा वास्तव में मजबूत होगा।








