
उत्तराखंड में विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के तहत जमा किए गए मतदाता प्रपत्रों की सॉफ्टवेयर के माध्यम से जांच की जा रही है। करीब 18 लाख मतदाताओं के फॉर्म में संभावित विसंगतियों की जांच होगी और पांच प्रमुख मानकों पर बड़ी गड़बड़ी मिलने पर चुनाव आयोग नोटिस जारी करेगा। नोटिस मिलने पर संबंधित मतदाता को सात से 10 दिनों के भीतर दस्तावेजों सहित अपना पक्ष प्रस्तुत करना होगा।
- एसआईआर में बड़ी विसंगति मिलने पर सात से 10 दिन में देना होगा जवाब
- चुनाव आयोग ने एसआईआर प्रपत्रों की जांच के लिए तय किए पांच मानक
- हर 8 से 10 मतदान केंद्र पर होगी एसआईआर नोटिस की सुनवाई
- नाम और आयु की गड़बड़ी पर चुनाव आयोग भेजेगा नोटिस
देहरादून। उत्तराखंड में विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) अभियान के तहत मतदाता सूची को त्रुटिरहित और अद्यतन बनाने की प्रक्रिया तेज हो गई है। यदि किसी मतदाता ने एसआईआर प्रपत्र जमा कर दिया है, तब भी उसे चुनाव आयोग की ओर से नोटिस मिल सकता है। मुख्य निर्वाचन अधिकारी कार्यालय ने स्पष्ट किया है कि सॉफ्टवेयर के माध्यम से सभी प्रपत्रों की विस्तृत जांच की जा रही है और यदि निर्धारित मानकों के आधार पर गंभीर विसंगतियां पाई जाती हैं तो संबंधित मतदाताओं को नोटिस जारी किए जाएंगे।
मुख्य निर्वाचन अधिकारी कार्यालय के अनुसार प्रदेश में करीब 18 लाख मतदाताओं के प्रपत्र ऐसे हैं, जिनकी सॉफ्टवेयर आधारित जांच की जा रही है। यह जांच पूरी तरह तकनीकी प्रणाली के माध्यम से होगी, जिससे मतदाता विवरण में संभावित त्रुटियों और विसंगतियों की पहचान की जा सके। अधिकारियों का कहना है कि छोटी-मोटी त्रुटियों को सामान्य प्रक्रिया में ठीक कर लिया जाएगा, जबकि गंभीर विसंगति मिलने पर संबंधित मतदाता को औपचारिक नोटिस भेजा जाएगा।
अपर मुख्य निर्वाचन अधिकारी डॉ. विजय कुमार जोगदंडे ने बताया कि एसआईआर के दौरान मतदाताओं की मैपिंग में कुछ तकनीकी विसंगतियां सामने आई हैं। इन्हें दूर करने के लिए आयोग ने पांच प्रमुख मानक निर्धारित किए हैं। सॉफ्टवेयर इन्हीं मानकों के आधार पर सभी एसआईआर प्रपत्रों की जांच कर रहा है। जांच पूरी होने के बाद जिन मामलों में गंभीर अंतर मिलेगा, उन्हें नोटिस जारी किया जाएगा।
नोटिस मिलने वाले मतदाताओं को सात से 10 दिन का समय दिया जाएगा। इस अवधि में उन्हें अपने दावे के समर्थन में आवश्यक दस्तावेज और प्रमाण प्रस्तुत करने होंगे। दस्तावेजों की जांच के बाद संबंधित अधिकारी अंतिम निर्णय लेंगे कि मतदाता का रिकॉर्ड संशोधित किया जाए या पूर्ववत रखा जाए।
चुनाव आयोग ने जिन पांच प्रमुख मानकों के आधार पर छंटनी की व्यवस्था की है, उनमें सबसे पहला नाम में अंतर है। यदि मतदाता या उसके परिवार के सदस्य के नाम में पुराने रिकॉर्ड और वर्तमान एसआईआर प्रपत्र के बीच महत्वपूर्ण अंतर पाया जाता है तो मामला जांच के दायरे में आएगा।
दूसरा मानक न्यूनतम आयु अंतर है। यदि माता-पिता और संतान के बीच आयु का अंतर 15 वर्ष से कम पाया जाता है तो इसे तकनीकी विसंगति माना जाएगा।
तीसरा मानक अधिकतम आयु अंतर से जुड़ा है। यदि माता-पिता और संतान के रूप में दर्ज दो व्यक्तियों के बीच आयु का अंतर 50 वर्ष से अधिक मिलता है तो ऐसे मामलों की भी जांच होगी।
चौथा मानक प्रोजनी (संतान) की संख्या है। यदि किसी एक मतदाता के साथ छह से अधिक संतानों की मैपिंग दर्ज मिलती है तो सॉफ्टवेयर उसे संभावित त्रुटि मानकर जांच के लिए चिह्नित करेगा।
पांचवां मानक पीढ़ीगत आयु अंतर है। यदि दादा-दादी या नाना-नानी के रूप में दर्ज व्यक्ति और संबंधित मतदाता के बीच आयु का अंतर 40 वर्ष से कम पाया जाता है तो इसे भी गंभीर विसंगति मानते हुए नोटिस जारी किया जा सकता है।
मतदाताओं की सुविधा के लिए चुनाव आयोग ने सुनवाई की प्रक्रिया को भी विकेंद्रीकृत किया है। डॉ. जोगदंडे के अनुसार सभी लोगों को सीधे निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी (ईआरओ) यानी एसडीएम कार्यालय जाने की आवश्यकता नहीं होगी। प्रत्येक आठ से 10 मतदान केंद्रों के समूह पर एक सहायक निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी (एईआरओ) की नियुक्ति की जाएगी, जो स्थानीय स्तर पर ही नोटिस से जुड़े मामलों की सुनवाई करेंगे। इससे मतदाताओं को अनावश्यक दौड़-भाग से राहत मिलेगी और शिकायतों का निस्तारण भी अधिक तेजी से किया जा सकेगा।
चुनाव आयोग ने मतदाताओं से अपील की है कि यदि उन्हें एसआईआर से संबंधित कोई नोटिस प्राप्त होता है तो निर्धारित समय सीमा के भीतर आवश्यक दस्तावेजों के साथ अपना पक्ष अवश्य प्रस्तुत करें, ताकि मतदाता सूची में उनका विवरण सही और अद्यतन बना रहे।





