
देहरादून स्थित आईआईटी रुड़की के वैज्ञानिक प्रो. कमल जैन ने ‘ओमनीसिंक्स’ नामक एआई आधारित प्लेटफॉर्म विकसित किया है, जो कैंसर मरीजों के लिए सबसे सुरक्षित और प्रभावी दवा संयोजन चुनने में मदद करेगा। यह प्लेटफॉर्म 378 से अधिक दवाओं के 77 करोड़ संभावित संयोजनों का विश्लेषण कर महज चार घंटे में उपचार संबंधी सुझाव प्रदान करता है। शोधकर्ताओं का दावा है कि यह तकनीक कैंसर उपचार को अधिक सटीक, व्यक्तिगत और सुरक्षित बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम साबित होगी।
- चार घंटे में चुनेगा सबसे सुरक्षित इलाज, IIT वैज्ञानिक की बड़ी उपलब्धि
- कैंसर उपचार में एआई की एंट्री, 77 करोड़ दवा संयोजनों का करेगा विश्लेषण
- ओमनीसिंक्स प्लेटफॉर्म देगा मरीज के अनुसार सटीक उपचार का सुझाव
- बायोप्सी विफल होने पर भी बताएगा इलाज का रास्ता, IIT का नया शोध
देहरादून। कैंसर जैसी जटिल और जानलेवा बीमारी के उपचार में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) एक नई क्रांति लेकर आने जा रही है। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) रुड़की के वैज्ञानिक प्रो. कमल जैन ने एक अत्याधुनिक एआई और कंप्यूटेशनल सर्च आधारित प्लेटफॉर्म विकसित किया है, जो कैंसर मरीजों के लिए सबसे सुरक्षित और प्रभावी दवा संयोजन का चयन करने में चिकित्सकों की मदद करेगा। ‘ओमनीसिंक्स’ नामक यह प्लेटफॉर्म मरीज की चिकित्सकीय स्थिति, रोग की प्रकृति और संभावित दुष्प्रभावों को ध्यान में रखते हुए महज चार घंटे के भीतर उपचार संबंधी सटीक सुझाव देने में सक्षम है।
भारत में हर वर्ष लगभग 15 लाख नए कैंसर मरीज सामने आते हैं। इनमें से अधिकांश मामलों में बीमारी का पता तब चलता है जब कैंसर उन्नत या अंतिम चरण में पहुंच चुका होता है। विशेषज्ञों के अनुसार लगभग 75 प्रतिशत मरीजों में देर से पहचान होने के कारण उपचार की चुनौतियां बढ़ जाती हैं। ऐसे में चिकित्सकों को सीमित समय में मरीज की मेडिकल हिस्ट्री, जांच रिपोर्ट और उपलब्ध दवाओं के आधार पर उपचार योजना तैयार करनी पड़ती है। यही वह चुनौती है जिसे दूर करने के लिए आईआईटी रुड़की के वैज्ञानिकों ने यह नवीन प्लेटफॉर्म विकसित किया है।
प्रो. कमल जैन के अनुसार आने वाले वर्षों में देश में कैंसर मरीजों की संख्या तेजी से बढ़ने का अनुमान है। वर्ष 2045 तक यह संख्या 25 लाख के पार पहुंच सकती है। वर्तमान व्यवस्था में चिकित्सकों के पास प्रत्येक मरीज के लिए बहुत कम समय होता है, जबकि उन्हें हजारों संभावित उपचार विकल्पों में से सर्वोत्तम विकल्प चुनना पड़ता है। कई बार सही दवा संयोजन की पहचान करने में महीनों लग जाते हैं, जिससे रोग और अधिक गंभीर हो सकता है। इसी समस्या के समाधान के लिए विकसित ‘ओमनीसिंक्स’ प्लेटफॉर्म मरीज की संपूर्ण चिकित्सा जानकारी का विश्लेषण करता है। यह 378 से अधिक दवाओं के लगभग 77 करोड़ संभावित संयोजनों की जांच कर उन विकल्पों की पहचान करता है, जो मरीज के लिए अधिक प्रभावी और कम जोखिम वाले हों।
एआई तकनीक के उपयोग से यह प्रक्रिया बेहद कम समय में पूरी हो जाती है, जिससे डॉक्टरों को उपचार संबंधी निर्णय लेने में महत्वपूर्ण सहायता मिलती है। इस प्लेटफॉर्म की एक विशेषता यह भी है कि यह उन परिस्थितियों में भी उपयोगी साबित हो सकता है, जब पारंपरिक बायोप्सी से पर्याप्त जानकारी प्राप्त नहीं हो पाती। कई बार कैंसर का डीएनए रक्त में नहीं मिल पाता या मरीज की स्थिति ऐसी होती है कि बायोप्सी करना जोखिमपूर्ण हो जाता है। ऐसी परिस्थितियों में यह प्रणाली उपलब्ध वैज्ञानिक शोध, क्लिनिकल डेटा और प्रकाशित अध्ययनों के आधार पर संभावित उपचार विकल्पों का विश्लेषण कर सकती है। इससे मरीजों के लिए नए उपचार मार्ग खुल सकते हैं।
प्रो. जैन ने बताया कि इस तकनीक का उपयोग एक 63 वर्षीय थायराइड कैंसर मरीज के मामले में सफलतापूर्वक किया गया। मरीज को आरईटी-फ्यूजन थायराइड कैंसर था और पहले दी जा रही दवा के प्रति कैंसर ने प्रतिरोध विकसित कर लिया था। लिक्विड और टिशू बायोप्सी से भी कोई स्पष्ट संकेत नहीं मिला, जबकि रीढ़ की हड्डी की बायोप्सी अत्यधिक जोखिमपूर्ण थी। इसके अलावा मरीज की हृदय संबंधी स्थिति भी कमजोर थी, जिससे कई उपचार विकल्प सुरक्षित नहीं थे। ऐसे जटिल मामले में प्लेटफॉर्म ने चार घंटे के भीतर सबसे उपयुक्त दवा संयोजन सुझाया, जिससे चिकित्सकों को उपचार का नया रास्ता मिला।
वैज्ञानिकों का कहना है कि भविष्य में इस प्लेटफॉर्म को और अधिक उन्नत बनाया जाएगा। व्यक्तिगत एमआरएनए वैक्सीन डिजाइन, दवाओं के संभावित दुष्प्रभावों की पूर्व भविष्यवाणी और कैंसर के लिए व्यक्तिगत उपचार रणनीति विकसित करने जैसे क्षेत्रों में भी इस तकनीक का उपयोग किया जा सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह तकनीक व्यापक स्तर पर लागू होती है तो कैंसर उपचार की प्रक्रिया अधिक सटीक, व्यक्तिगत और प्रभावी बन सकेगी। साथ ही मरीजों को समय पर उचित उपचार मिलने से जीवन बचाने की संभावनाएं भी बढ़ेंगी। आईआईटी रुड़की का यह शोध भारत में स्वास्थ्य तकनीक और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है।






