
उत्तराखंड में पहली बार झरनों, गाड़-गदेरों और अन्य प्राकृतिक जलस्रोतों का व्यापक सर्वेक्षण किया जा रहा है। अब तक करीब 48 हजार जलस्रोतों का रिकॉर्ड तैयार कर उनकी जियो-टैगिंग की जा चुकी है। सर्वेक्षण पूरा होने के बाद राज्य में जलस्रोतों का प्रामाणिक डाटाबेस तैयार होगा, जिससे संरक्षण, पुनर्जीवन और जल प्रबंधन की योजनाओं को नई दिशा मिलेगी।
- उत्तराखंड में पहली बार प्राकृतिक जलस्रोतों का वैज्ञानिक सर्वेक्षण
- एक महीने में पूरा होगा झरनों की गणना अभियान, जियो-टैगिंग भी जारी
- सूखते जलस्रोतों के संरक्षण की तैयारी, 155 स्रोतों का उपचार शुरू
- जल संकट से निपटने की पहल, प्रदेशभर के झरनों का तैयार हो रहा रिकॉर्ड
देहरादून। उत्तराखंड में पहली बार झरनों, गाड़-गदेरों और अन्य प्राकृतिक जलस्रोतों की व्यवस्थित गणना और दस्तावेजीकरण का कार्य बड़े पैमाने पर किया जा रहा है। इस महत्वाकांक्षी अभियान का उद्देश्य राज्य में मौजूद प्राकृतिक जलस्रोतों की वास्तविक संख्या, उनकी वर्तमान स्थिति तथा संरक्षण की आवश्यकता का वैज्ञानिक आकलन करना है। सर्वेक्षण पूरा होने के बाद राज्य सरकार के पास पहली बार प्रदेश के जलस्रोतों का एक व्यापक और प्रामाणिक डाटाबेस उपलब्ध होगा, जो भविष्य की जल संरक्षण योजनाओं, भूजल पुनर्भरण कार्यक्रमों और जल संकट से निपटने की रणनीतियों के लिए आधार बनेगा। लघु सिंचाई विभाग की ओर से संचालित इस सर्वेक्षण में अब तक लगभग 48 हजार प्राकृतिक जलस्रोतों का रिकॉर्ड तैयार किया जा चुका है।
इनमें झरने, नौले, धार, गाड़-गदेरे तथा अन्य प्राकृतिक जलधाराएं शामिल हैं। विभाग का लक्ष्य अगले एक महीने के भीतर सर्वेक्षण कार्य को पूर्ण करना है, जिसके बाद प्रदेश में उपलब्ध जलस्रोतों की वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सकेगी। अधिकारियों के अनुसार पिछले कुछ वर्षों में जलवायु परिवर्तन, अनियंत्रित निर्माण गतिविधियों, वनावरण में कमी और बदलते वर्षा चक्र के कारण अनेक जलस्रोत प्रभावित हुए हैं। कई स्थानों पर झरने पूरी तरह सूख चुके हैं, जबकि अनेक स्रोतों में जल प्रवाह लगातार कम होता जा रहा है। ऐसे में यह सर्वेक्षण केवल आंकड़े जुटाने तक सीमित नहीं है, बल्कि जल संकट की गंभीरता को समझने और उसके समाधान की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
लघु सिंचाई विभाग के मुख्य अभियंता बी.के. तिवारी ने बताया कि यह अभियान केवल उत्तराखंड तक सीमित नहीं है। केंद्र सरकार के निर्देशों के तहत देशभर में विभिन्न राज्यों की एजेंसियों और विभागों के सहयोग से प्राकृतिक जलस्रोतों की गणना की जा रही है। इसका उद्देश्य राष्ट्रीय स्तर पर एक ऐसा डाटाबेस तैयार करना है, जिससे जलस्रोतों की संख्या, उनकी स्थिति और संरक्षण संबंधी आवश्यकताओं का आकलन किया जा सके। सर्वेक्षण को अधिक सटीक और विश्वसनीय बनाने के लिए आधुनिक तकनीकों का उपयोग किया जा रहा है। प्रत्येक जलस्रोत की जियो-टैगिंग की जा रही है तथा मोबाइल एप्लिकेशन के माध्यम से उसकी भौगोलिक स्थिति, जल प्रवाह की मात्रा, उपयोगिता और आसपास की परिस्थितियों का डिजिटल रिकॉर्ड तैयार किया जा रहा है।
इससे भविष्य में इन जलस्रोतों की निगरानी, संरक्षण और पुनर्जीवन कार्यक्रमों को अधिक प्रभावी ढंग से लागू किया जा सकेगा। अधिकारियों का कहना है कि वर्तमान सर्वेक्षण मुख्य रूप से राजस्व क्षेत्रों में स्थित जलस्रोतों तक सीमित है। वन क्षेत्रों में मौजूद बड़ी संख्या में झरने और जलधाराएं अभी इस गणना का हिस्सा नहीं हैं। इसलिए वास्तविक संख्या वर्तमान आंकड़ों से कहीं अधिक होने की संभावना है। सर्वेक्षण पूरा होने के बाद यह भी स्पष्ट हो सकेगा कि कौन-कौन से जलस्रोत सुरक्षित स्थिति में हैं, कौन संकटग्रस्त हैं और किन क्षेत्रों में तत्काल संरक्षण कार्यों की आवश्यकता है। विभाग ने सर्वेक्षण के साथ-साथ जलस्रोतों के पुनर्जीवन की दिशा में भी कार्य शुरू कर दिया है। अधिकारियों के अनुसार मोबाइल एप और स्थानीय स्तर से प्राप्त सूचनाओं के आधार पर ऐसे कई जलस्रोतों की पहचान हुई है जो सूखने की कगार पर हैं।
इनमें से 155 जलस्रोतों को प्राथमिकता के आधार पर चयनित कर उनका उपचार और पुनर्जीवन कार्य शुरू किया गया है। रायपुर, कालसी, सहसपुर, चकराता, डोईवाला और विकासनगर सहित कई क्षेत्रों में जलस्रोत संरक्षण की गतिविधियां संचालित की जा रही हैं। इसके अतिरिक्त पुराने नौलों, धारों और पारंपरिक जलस्रोतों को पुनर्जीवित करने के प्रयास भी जारी हैं। भूजल स्तर को सुधारने के लिए विभिन्न क्षेत्रों में 21 रिचार्ज शाफ्ट स्थापित किए गए हैं, जिनके माध्यम से वर्षा जल को भूमि के भीतर पहुंचाकर जलभंडारों को पुनर्भरित करने का प्रयास किया जा रहा है।
प्रारंभिक आंकड़ों के अनुसार अल्मोड़ा जिले में सबसे अधिक लगभग 9,600 प्राकृतिक जलस्रोत दर्ज किए गए हैं। इसके बाद चमोली में 8,077, टिहरी में 4,415, उत्तरकाशी में 4,191 और चंपावत में 3,911 जलस्रोतों का रिकॉर्ड तैयार किया गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह सर्वेक्षण भविष्य में जल संरक्षण नीतियों को वैज्ञानिक आधार प्रदान करेगा और उत्तराखंड के पारंपरिक जलस्रोतों के संरक्षण एवं पुनर्जीवन के लिए एक मजबूत आधार तैयार करेगा। राज्य में बढ़ते जल संकट और बदलती पर्यावरणीय परिस्थितियों के बीच यह पहल जल सुरक्षा सुनिश्चित करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकती है।





