
देहरादून के स्कूलों में आयोजित लेखन प्रतियोगिता में सामने आया कि अधिकांश छात्र सामान्य हिंदी शब्द भी सही नहीं लिख पा रहे हैं, जिससे मातृभाषा की स्थिति चिंताजनक हो गई है। Central Board of Secondary Education से जुड़े विद्यालयों के छात्रों में भी यह समस्या व्यापक रूप से देखी गई। विशेषज्ञों का मानना है कि हिंदी की उपेक्षा और विदेशी भाषाओं पर अधिक जोर इसके प्रमुख कारण हैं।
- विदेशी भाषाओं के बीच हिंदी की स्थिति चिंताजनक
- लेखन प्रतियोगिता में छात्रों की वर्तनी कमजोर
- स्कूलों में हिंदी पर घटता ध्यान, बढ़ी चिंता
- हिंदी बोलने पर जुर्माना, शिक्षा व्यवस्था पर सवाल
देहरादून: आधुनिक शिक्षा प्रणाली में विदेशी भाषाओं के बढ़ते प्रभाव के बीच मातृभाषा हिंदी की स्थिति लगातार कमजोर होती जा रही है। हाल ही में Dehradun जिले के विभिन्न विद्यालयों में आयोजित लेखन प्रतियोगिता में यह चिंताजनक सच्चाई सामने आई कि अधिकांश छात्र सामान्य हिंदी शब्द भी सही ढंग से लिखने में असमर्थ हैं। यह प्रतियोगिता बच्चों की रचनात्मकता और लेखन क्षमता को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से आयोजित की गई थी, जिसमें आठवीं से ग्यारहवीं कक्षा तक के छात्रों ने भाग लिया।
लेकिन जब उनके द्वारा लिखे गए पत्रों और लेखों का मूल्यांकन किया गया, तो पाया गया कि करीब 90 प्रतिशत छात्र ‘देहरादून’, ‘सरकार’, ‘कारण’, ‘स्कूल’, ‘निवेदन’ जैसे सामान्य शब्दों की सही वर्तनी तक नहीं लिख पाए। स्थिति इतनी गंभीर रही कि कई छात्र अपना नाम तक सही ढंग से नहीं लिख सके। विशेष रूप से Central Board of Secondary Education (सीबीएसई) से संबद्ध विद्यालयों के छात्रों में भी यही समस्या देखने को मिली, जो यह दर्शाता है कि यह किसी एक स्कूल तक सीमित नहीं, बल्कि व्यापक स्तर पर फैली हुई समस्या है।
विशेषज्ञों का मानना है कि वर्तमान शिक्षा प्रणाली में अंग्रेजी, जर्मन और इटालियन जैसी विदेशी भाषाओं को अधिक महत्व दिया जा रहा है, जबकि हिंदी विषय को अपेक्षित प्राथमिकता नहीं मिल रही। इसके चलते छात्रों की मातृभाषा पर पकड़ कमजोर होती जा रही है। कुछ विद्यालयों में तो हिंदी बोलने पर जुर्माना तक लगाने की शिकायतें सामने आई हैं, जिससे बच्चों में हिंदी के प्रति हीन भावना विकसित हो रही है। शिक्षाविदों का सुझाव है कि इस स्थिति को सुधारने के लिए विद्यालयों में हिंदी लेखन, पठन और व्याकरण पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए।
बच्चों को नियमित रूप से हिंदी अखबार, कहानी, कविता और अन्य साहित्य पढ़ने के लिए प्रेरित किया जाए। साथ ही उन्हें रोजाना लेखन अभ्यास कराने की आदत विकसित की जाए, ताकि उनकी भाषा दक्षता और अभिव्यक्ति में सुधार हो सके। विशेषज्ञों ने यह भी स्पष्ट किया कि इस समस्या के लिए केवल बच्चे जिम्मेदार नहीं हैं, बल्कि अभिभावक और शिक्षा प्रणाली भी समान रूप से उत्तरदायी हैं। यदि घर और स्कूल दोनों स्तरों पर हिंदी को महत्व दिया जाए, तो आने वाले समय में इस स्थिति में सुधार संभव है।







