
यह लेख राजस्थान में सरकारी अनुदानित शिक्षण संस्थानों से समायोजित शिक्षकों को सेवानिवृत्ति के बाद पेंशन न मिलने की समस्या को उठाता है। लेखक का कहना है कि वर्षों तक सेवा देने वाले इन शिक्षकों को उनकी प्रथम नियुक्ति तिथि से पेंशन का लाभ मिलना चाहिए।
- समायोजित शिक्षकों के साथ पेंशन में भेदभाव
- बुढ़ापे की लाठी है पेंशन
- ओल्ड पेंशन स्कीम से वंचित शिक्षक
- शिक्षकों को पेंशन से वंचित करना अन्याय
सुनील कुमार माथुर
सेवानिवृत्त हर सरकारी कर्मचारी पेंशन का हकदार है और उसे सरकारी नियमानुसार सेवानिवृत्ति पर पेंशन दी जाती है। चूंकि पेंशन कर्मचारी की खुशहाली का जीवन बीमा है। उसके बुढ़ापे की लाठी है। इतना ही नहीं, सेवानिवृत्त कर्मचारी को आर्थिक एवं सामाजिक सुरक्षा प्रदान करती है और कर्मचारी की मृत्यु पर आश्रित को पेंशन मिलती है। लेकिन राजस्थान में सरकारी अनुदानित शिक्षण संस्थाओं से समायोजित शिक्षक आज सेवानिवृत्ति के बाद पेंशन को तरस रहे हैं।
बढ़ती महंगाई के इस दौर में, जहां राजस्थान सरकार सामाजिक सुरक्षा के अंतर्गत वृद्धजनों, विकलांगों, विधवाओं को घर बैठे जीवन-यापन के लिए हर माह उनके खातों में पेंशन राशि डाल रही है, वहीं दूसरी ओर समायोजित शिक्षकों को पेंशन के लाभ से वंचित कर रखा है, जिसके कारण उनके समक्ष आर्थिक संकट उत्पन्न हो गया है।
राजस्थान में सरकार ने 80 प्रतिशत अनुदानित शिक्षण संस्थाओं में कार्यरत शिक्षकों को 01 जुलाई 2011 से सरकारी स्कूलों में (ग्रामीण स्कूलों में) समायोजन के नाम पर लगाया और सेवाकाल के दौरान 9-18-27 का लाभ भी दिया और सर्विस बुक भी पहले वाली को लगातार जारी रखा, लेकिन सेवानिवृत्ति के बाद उन शिक्षकों को अन्य लाभों से वंचित कर दिया, जिसमें पेंशन भी शामिल है। पेंशन नहीं मिलने से वे आर्थिक कठिनाइयों के दौर से गुजर रहे हैं और येन-केन प्रकारेण अपने परिवार को दो वक्त की रोटी उपलब्ध करा पा रहे हैं। सरकार एक ओर नारा देती है कि कोई भूखा न सोए, वहीं दूसरी ओर समायोजित शिक्षकों व कर्मचारियों को पेंशन से वंचित कर दिया है।
राजस्थान सरकार ने समायोजन के दौरान इन शिक्षकों से एक शपथ पत्र भरवा लिया था कि वे ग्रामीण इलाकों में सरकारी नौकरी करते हुए पुराने कोई लाभ की मांग नहीं करेंगे। उक्त शर्त तर्कसंगत नहीं है। चूंकि सर्विस बुक को लगातार जारी रखा, 9-18 का लाभ भी दिया। स्कूल अनुदानित शिक्षण संस्थान थे, फिर सेवाकाल के बीच में कर्मचारियों के विरुद्ध यह कैसी शर्त?
एक ओर सरकार अपने आपको लोक कल्याणकारी सरकार कहती है और समानता की बात करती है और साथ ही साथ कर्मचारियों को पेंशन से भी वंचित कर रही है। ये कर्मचारी 01 जुलाई 2011 से सरकारी कर्मचारी न होकर अपनी प्रथम नियुक्ति से शिक्षक हैं। इसलिए राजस्थान सरकार समायोजित शिक्षकों को पेंशन देने के लिए गणना 1 जुलाई 2011 से न कर उनकी प्रथम नियुक्ति से गणना कर पेंशन का लाभ दे। चूंकि इन कर्मचारियों ने अपने जीवन का अमूल्य समय करीबन 25 से 30 साल तक अनुदानित शिक्षण संस्थाओं में अपनी सेवाएं दे चुके हैं। अब उन्हें पेंशन से वंचित रखना न्यायसंगत नहीं कहा जा सकता है।
राज्य सरकार बार-बार यह दोहरा रही है कि हमने ओल्ड पेंशन स्कीम (ओपीएस) योजना शुरू कर दी है, लेकिन समायोजित शिक्षकों को ओल्ड पेंशन स्कीम का लाभ देने के बारे में मौन धारण कर रखा है, जिससे इस महंगाई के दौर में उन्हें अपना व अपने परिवारजनों का जीवन-यापन करना मुश्किल हो गया है। अतः सरकार तत्काल उन्हें उनकी प्रथम नियुक्ति तिथि से पेंशन दे और अनावश्यक रूप से जोड़ी गई शर्त वापस ले। जब ओल्ड पेंशन स्कीम लागू की है तो फिर समायोजित शिक्षकों को इस लाभ से वंचित करना न्यायसंगत नहीं कहा जा सकता है।
एक ओर सरकार सामाजिक सुरक्षा के नाम पर घर बैठे लोगों को बिना कोई काम किए पेंशन दे रही है और जनप्रतिनिधियों को पांच साल के कार्यकाल के बाद पेंशन व अन्य कई सुविधाएं उपलब्ध करा रही है, तो फिर अनुदानित शिक्षण संस्थाओं के उन शिक्षकों को पेंशन के हक से वंचित क्यों किया जा रहा है, जिन्होंने पूरी ईमानदारी और निष्ठा के साथ अपनी सेवाएं दीं। इतना ही नहीं, बच्चों का भविष्य संवारने वाले शिक्षकों को पेंशन से वंचित किया जा रहा है। यह कैसी दोहरी मानसिकता? कहां गए समानता के अधिकार? पेंशन पाना समायोजित शिक्षकों का हक है, जो समय रहते उन्हें तत्काल प्रभाव से मिलना चाहिए।
सुनील कुमार माथुर
सदस्य अणुव्रत लेखक मंच एवं
स्वतंत्र लेखक व पत्रकार
33, वर्धमान नगर, शोभावतों की ढाणी,
खेमे का कुंआ, पाल रोड, जोधपुर, राजस्थान।






Bilkul sahi baat hai, Sarkar galat ko sahi kare
धन्यवाद
Sahi baat hai ,sabhi ko pension benefits milna chahiye
धन्यवाद