
यह कविता आधुनिक शहरों की भागदौड़ में खोती जा रही ग्रामीण संस्कृति, अपनापन और मानवीय रिश्तों की याद दिलाती है। कवि शहर में फिर से गाँव जैसी सादगी, परंपरा और आत्मीयता लौटने की कामना करता है।
- शहर की भीड़ में गाँव की तलाश
- शहर में गाँव की खुशबू
- खोती संस्कृति और गाँव की याद
- आधुनिक शहर और ग्रामीण संवेदनाएँ
सिद्धार्थ गोरखपुरी
आदमी का प्रेम लौटे, अपनापन, लगाव लौटे
मुमकिन हो कि शहर में अब गाँव लौटे।
पीपल का पेड़ लौटे, कुआँ लौटे,
तहज़ीब लौटे कि नमस्ते, दुआ लौटे।
संजीदा पोखरा और चकनाली उसकी,
नीचे नीम के आदमियों से घिरा अलाव लौटे।
मुमकिन हो कि शहर में अब गाँव लौटे।
जामुन का पेड़ और शिवाला लौटे,
अपनों के साथ बैठ के निवाला लौटे।
घर की संजीदगी लौटे,
रिश्तों में पुश्तैनी ठहराव लौटे।
मुमकिन हो कि शहर में अब गाँव लौटे।
क्षीर लौटे, पूजा लौटे और बख़ीर लौटे थे,
खेल-खेल में लकड़ी की शमशीर लौटे।
जो बस गए अरसे से शहर में,
उनके भी गाँव की तरफ पाँव लौटे।
मुमकिन हो कि शहर में अब गाँव लौटे।
चमक सड़क, शोहरत और इमारत की,
पैसे के बल बड़ा बनने की चाहत की।
इन इच्छाओं पर थोड़ा अंकुश लगे,
फिर आदमी के अंदर का भाव लौटे।
मुमकिन हो कि शहर में अब गाँव लौटे।








