
कैग की रिपोर्ट के अनुसार उत्तराखंड में महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना के तहत 100 दिन रोजगार की गारंटी होने के बावजूद 2019 से 2024 के बीच औसतन 6.54 लाख परिवारों को साल में केवल 21 दिन का काम मिला। रिपोर्ट में योजना के क्रियान्वयन और वित्तीय प्रबंधन में कई कमियों का भी उल्लेख किया गया है।
- कैग रिपोर्ट में खुलासा, मनरेगा में 27 लाख परिवारों को मिला रोजगार
- वित्तीय प्रबंधन में कमी, देरी से निधि जारी होने पर ब्याज देनदारी
- मनरेगा जॉब कार्ड में गड़बड़ी, 39 प्रतिशत बिना फोटो के पाए गए
- पात्र परिवारों की पहचान के लिए घर-घर सर्वे नहीं हुआ
भराड़ीसैंण (चमोली)। उत्तराखंड विधानसभा में प्रस्तुत Comptroller and Auditor General of India (कैग) की रिपोर्ट में Mahatma Gandhi National Rural Employment Guarantee Act (मनरेगा) के क्रियान्वयन से जुड़े कई अहम तथ्य सामने आए हैं। रिपोर्ट के अनुसार ग्रामीण परिवारों को साल में 100 दिन रोजगार की गारंटी देने वाली इस योजना के बावजूद अप्रैल 2019 से मार्च 2024 के बीच औसतन हर वर्ष करीब 6.54 लाख परिवारों को केवल 21 दिन का ही रोजगार मिल पाया।
कैग रिपोर्ट के अनुसार इस अवधि में राज्य को 3647.21 करोड़ रुपये की धनराशि उपलब्ध हुई थी, जिसमें से 3638.95 करोड़ रुपये खर्च किए गए। इस राशि से कुल 27.04 लाख परिवारों को मजदूरी आधारित रोजगार उपलब्ध कराया गया। रिपोर्ट में बताया गया कि मजदूरी भुगतान के रूप में 2340.06 करोड़ रुपये खर्च किए गए और इसके माध्यम से कुल 11.56 करोड़ मानव-दिवस (मैन-डेज) का सृजन हुआ।
ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए अहम योजना
मनरेगा ग्रामीण परिवारों को आजीविका सुरक्षा देने के उद्देश्य से शुरू की गई प्रमुख योजना है। उत्तराखंड में 66 प्रतिशत से अधिक आबादी ग्रामीण क्षेत्रों में निवास करती है, इसलिए यह योजना राज्य के ग्रामीण विकास और गरीबी उन्मूलन के लिए विशेष महत्व रखती है। खासकर पर्वतीय जिलों में, जहां भौगोलिक परिस्थितियां कठिन हैं और रोजगार के अवसर सीमित हैं, वहां यह योजना ग्रामीणों के लिए सहारा बनती है।
वित्तीय प्रबंधन में सामने आई कमियां
कैग रिपोर्ट में योजना के वित्तीय प्रबंधन और क्रियान्वयन में कई खामियां भी सामने आई हैं। रोजगार गारंटी निधि को समय पर जारी नहीं किए जाने के कारण राज्य पर लगभग 2.03 करोड़ रुपये की ब्याज देनदारी हो गई। इसके अलावा सामग्री मदों में 122.40 करोड़ रुपये की देनदारी लंबित पाई गई। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि पात्र परिवारों की पहचान के लिए दिशा-निर्देश होने के बावजूद घर-घर सर्वे नहीं कराया गया। जांच में शामिल किसी भी ग्राम पंचायत में 2019 से 2024 के बीच ऐसा सर्वे नहीं किया गया।
जॉब कार्ड में भी गड़बड़ी
कैग के अनुसार मनरेगा के तहत जारी किए जाने वाले जॉब कार्ड मजदूरों की पात्रता का महत्वपूर्ण दस्तावेज होते हैं। लेकिन जांच में पाया गया कि लगभग 39 प्रतिशत जॉब कार्ड बिना फोटो के जारी किए गए थे, जो नियमों के विपरीत है।








