
अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि महिलाओं के सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक अधिकारों के लिए हुए लंबे संघर्षों की याद दिलाने वाला दिन है। इतिहासकार सत्येंद्र कुमार पाठक ने इसके ऐतिहासिक महत्व पर प्रकाश डालते हुए बताया कि यह दिवस लैंगिक समानता और महिला सशक्तिकरण के संकल्प का प्रतीक है।
- महिला अधिकारों के संघर्ष का प्रतीक है 8 मार्च
- अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस का ऐतिहासिक महत्व
- महिला सशक्तिकरण से ही राष्ट्र की प्रगति
- लैंगिक समानता के संकल्प का दिन
जहानाबाद। अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के गरिमामयी अवसर पर जिले के प्रख्यात साहित्यकार एवं इतिहासकार सत्येंद्र कुमार पाठक ने इस विशेष दिन की ऐतिहासिक जड़ों और इसके वैश्विक महत्व पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि 8 मार्च का दिन केवल औपचारिक उत्सव नहीं, बल्कि महिलाओं के सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक अधिकारों के लिए किए गए दशकों लंबे संघर्ष का सम्मान है।
श्री पाठक ने ऐतिहासिक तथ्यों को साझा करते हुए बताया कि इस दिवस की नींव 8 मार्च 1917 को रूस में महिला श्रमिकों द्वारा की गई ‘ब्रेड एंड पीस’ (रोटी और शांति) नामक ऐतिहासिक हड़ताल से पड़ी थी। प्रथम विश्व युद्ध के कठिन समय में भोजन और शांति की मांग को लेकर शुरू हुए इस आंदोलन ने रूसी सरकार को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया, जिसके परिणामस्वरूप वहाँ की महिलाओं को मतदान (वोट) का अधिकार प्राप्त हुआ। यह वैश्विक इतिहास में महिला सशक्तिकरण की एक युगांतरकारी घटना थी।
उन्होंने आगे जानकारी दी कि महिलाओं के इन बिखरे हुए आंदोलनों को वैश्विक स्तर पर एकजुटता प्रदान करने के लिए संयुक्त राष्ट्र ने वर्ष 1975 में इसे आधिकारिक मान्यता दी। तब से हर साल 8 मार्च को पूरे विश्व में लैंगिक समानता को बढ़ावा देने और महिलाओं के योगदान को सराहने के लिए यह दिवस मनाया जाता है।
अपने संबोधन के अंत में सत्येंद्र कुमार पाठक ने जोर देकर कहा कि: “यह दिन केवल महिला शक्ति की प्रशंसा करने के लिए नहीं, बल्कि समाज से लैंगिक भेदभाव को जड़ से मिटाने और महिलाओं को उनके वास्तविक अधिकार दिलाने का दृढ़ संकल्प लेने का दिन है।”
उनका मानना है कि जब तक महिलाओं को समान अवसर और सुरक्षा नहीं मिलेगी, तब तक एक सशक्त समाज की कल्पना अधूरी है। यह दिवस हमें निरंतर याद दिलाता है कि महिला सशक्तिकरण ही राष्ट्र की प्रगति का आधार है।







