
Institute of Agriculture Training and Research ने दो वर्षों के शोध के बाद चीड़ की पिरूल (पाइन नीडल्स) को सब्सट्रेट बनाकर ऑयस्टर, मिल्की, बटन और गैनोडर्मा मशरूम की सफल खेती की तकनीक विकसित की है। इस पहल से उत्पादन लागत घटेगी, वनाग्नि की समस्या कम होगी और पहाड़ी क्षेत्रों में रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे।
- पिरूल बनेगी किसानों की कमाई का जरिया, देहरादून में नई तकनीक लॉन्च
- चीड़ की सूखी सुइयों से उगेंगे मशरूम, किसानों की लागत घटेगी
- IATR का नवाचार: पिरूल से कंपोस्ट और मशरूम उत्पादन शुरू
- जंगलों की आग से बचाव और किसानों की आय बढ़ाने की नई पहल
देहरादून | देहरादून में स्थित Institute of Agriculture Training and Research ने पर्यावरण संरक्षण और कृषि नवाचार की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए चीड़ की पिरूल (पाइन नीडल्स) से मशरूम उत्पादन की नई तकनीक लॉन्च की है। दो वर्षों के गहन अनुसंधान और विकास के बाद इस तकनीक के माध्यम से ऑयस्टर, मिल्की, बटन और गैनोडर्मा जैसे उच्च गुणवत्ता वाले मशरूम की सफल खेती संभव हो पाई है। संस्थान ने इसके साथ ही पाइन पीट और पाइन ऑर्गेनिक कंपोस्ट का उत्पादन भी शुरू किया है, जो पारंपरिक कृषि के लिए उपयोगी साबित होगा।
यह पहल सामाजिक उद्यमिता का उदाहरण है, जिसका उद्देश्य पर्यावरण संरक्षण, ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करना और स्थानीय समुदायों को सशक्त बनाना है। हिमालयी क्षेत्रों, खासकर उत्तराखंड में चीड़ के जंगलों से हर साल बड़ी मात्रा में पिरूल गिरती है। यह अत्यधिक ज्वलनशील होने के कारण गर्मियों में जंगलों में आग लगने का प्रमुख कारण बनती है। नई तकनीक के जरिए इस अपशिष्ट पदार्थ का उपयोग कर किसानों की उत्पादन लागत में 30 से 50 प्रतिशत तक कमी लाई जा सकती है, क्योंकि महंगे स्ट्रॉ की जगह पिरूल का उपयोग किया जाएगा।
प्रसिद्ध पर्यावरणविद् और पद्मश्री से सम्मानित कल्याण सिंह रावत ने इस पहल की सराहना करते हुए कहा कि यह तकनीक पहाड़ी क्षेत्रों के किसानों के लिए बेहद उपयोगी है। इससे स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर बढ़ेंगे और जंगलों में आग लगने की समस्या को भी काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकेगा। इस नवाचार के पीछे संस्थान की रिसर्च एवं डेवलपमेंट टीम का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। टीम में मनमोहन सिंह बिष्ट, डॉ. आदित बिष्ट, नवीन नौटियाल, डॉ. भवना, वैशाली थापा और गुरसिमरन शामिल हैं।
संस्थान के सीईओ अमित उपाध्याय ने बताया कि पिछले दो वर्षों से टीम लगातार इस तकनीक पर काम कर रही थी। अब पाइन से पिरूल कंपोस्ट, पाइन पीट और मशरूम उत्पादन सफलतापूर्वक किया जा रहा है। आने वाले समय में इसे बड़े स्तर पर लागू करने की योजना है, जिससे हजारों ग्रामीण किसानों को लाभ मिलेगा और स्थानीय उद्यमिता को बढ़ावा मिलेगा।
प्रमुख लाभ
- वनाग्नि की समस्या में कमी
- मशरूम उत्पादन की लागत में कमी
- ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के अवसर
- जैविक खेती को बढ़ावा
- हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र की रक्षा
National Skill Development Corporation और Ministry of Skill Development and Entrepreneurship से संबद्ध यह संस्थान कृषि कौशल विकास, उद्यमिता और अनुसंधान के क्षेत्र में कार्य कर रहा है। यह पहल न केवल उत्तराखंड की ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई दिशा देगी, बल्कि पूरे हिमालयी क्षेत्र के लिए एक मॉडल बन सकती है।






