
यह कविता वसंत ऋतु और होली के उल्लासपूर्ण वातावरण का सुंदर चित्रण करती है। प्रकृति की हरियाली, तितलियों, भंवरों और रंगों की मस्ती के बीच मन की उमंग और उत्सव का आनंद व्यक्त किया गया है। कविता में होली के रंग, संगीत और प्रकृति की सुंदरता का जीवंत चित्र मिलता है।
- होली में झूमता पवन और वसंत
- प्रकृति के संग रंगों की मस्ती
- वसंत ऋतु में उमंग का उत्सव
- रंगों और वसंत का आनंद
डॉ. उषाकिरण श्रीवास्तव
मुजफ्फरपुर, बिहार
अबकी होली में हुरदंग,
खुशी से झूमे पवन-वसंत।
हरियाली नव पल्लव के संग,
उड़ाओ भर पिचकारी रंग।
बिछाया प्रकृति ने सब रंग,
गदराया मंज़र से अंग-अंग।
बौराया भँवरा कली के संग,
उड़ाओ भर पिचकारी रंग।
उड़ती तितली रंग-बिरंग,
लाया जीवन में नव-रंग।
हुलसित मन में है उमंग,
उड़ाओ भर पिचकारी रंग।
होली का रंग चढ़ा है मस्त,
खिला है पोर-पोर सब अंग।
बजाओ ढोल-झाल-मृदंग,
उड़ाओ भर पिचकारी रंग।









