
यह कविता बसंत ऋतु के आगमन के साथ प्रकृति की सुंदरता और प्रेमभाव को दर्शाती है। चारों ओर फैली हरियाली, फूलों की महक, कोयल की मधुर कूक और झरनों का संगीत वातावरण को आनंदमय बना देते हैं। कवि मानव को प्रकृति के प्रेम और सौंदर्य को अपनाने का संदेश देता है।
- ऋतुराज बसंत का सुंदर संदेश
- बसंत में महकती प्रकृति और प्रेम का अहसास
- हरियाली और उल्लास का मौसम बसंत
- कोयल की कूक और फूलों की खुशबू का बसंत
मुकेश कुमार ऋषि वर्मा
चहुँओर हरीतिमा छाई,
प्रकृति दुल्हन बन आई।
आया बसंत—छाया बसंत,
ऋतु ऐसी, गुम हुआ संत।
महक रही कली-कली,
कोयल घोली मिश्री की डली।
मन बेचारा है बौराया,
ऋतुराज बसंत है आया।
निर्मल-कोमल पत्ते-फूल,
हृदय में चुभता प्रेम-शूल।
भँवरे-तितली सुंदर-सुंदर,
छेड़ रहे अद्भुत स्वर।
झर-झर झरनों का संगीत,
आँखों से हृदय तक प्रीत।
प्रेम प्रकृति का है स्वभाव,
रे मानव! तू मत खा भाव।
– मुकेश कुमार ऋषि वर्मा
ग्राम पंचायत रिहावली, डाक घर तारौली गूजर, फतेहाबाद, आगरा, उत्तर प्रदेश – 283111
मो. 9627912535









