
यह हास्य-व्यंग्य रचना आज के साहित्यिक जगत की विडंबना को उजागर करती है, जहां कुछ लोग बिना मौलिक लेखन के भी पैसे और जुगाड़ के सहारे प्रसिद्धि और सम्मान पा रहे हैं। एक काल्पनिक साक्षात्कार के माध्यम से लेखक ने साहित्य की गिरती गुणवत्ता और दिखावे की प्रवृत्ति पर तीखा व्यंग्य किया है।
- पैसे देकर बनते आज के वरिष्ठ साहित्यकार
- साहित्य में बढ़ती दिखावे की प्रवृत्ति
- सम्मान और प्रसिद्धि की अंधी दौड़
- व्यंग्य में उजागर हुआ साहित्य का कड़वा सच
सुनील कुमार माथुर
रविवार का दिन था। मैं चाय की चुस्कियों के साथ रविवार की छुट्टी का आनंद ले रहा था। मेरे साथ में मेरे मित्र चेतन चौहान, चांद मोहम्मद घोसी और गोपाल सिंह राठौड़ भी बैठे थे। तभी एक कार आकर रुकी और उसमें से दो सज्जन उतरे। एक तो पत्रकार संतोष कुमार जी थे और दूसरे सज्जन मेरे लिए अनजान थे।
दोनों अंदर आए और अभिवादन करते हुए पास में लगी कुर्सियों पर बैठ गए। मैंने संतोष जी से आने का कारण पूछा तो बोले, सुनील जी! यह मेरे मित्र हैं और इनकी साहित्य सृजन में गहन रुचि है तथा शहर के जाने-माने वरिष्ठ साहित्यकार हैं। यह एक इंटरव्यू देना चाहते हैं, जिसे आप अपनी लेखनी के जरिए सुंदर शब्दों में लिखकर विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित कराने का श्रम करें, ताकि इन्हें और अधिक ख्याति मिल सके और समाज में इनका मान-सम्मान, प्रतिष्ठा व रुतबा बढ़ सके और विभिन्न संस्थाओं द्वारा समय-समय पर सम्मानित होते रहें।
संतोष जी की बात सुनकर मैं बोला, जब यह खुद वरिष्ठ साहित्यकार हैं तो फिर ये खुद लिखकर क्यों नहीं भेज देते। आजकल तो पत्र-पत्रिकाओं की डेस्क पर तो कोई संपादक भी नहीं बैठता है। मात्र कंप्यूटर ऑपरेटर ही अपनी इच्छा अनुसार समाचार व आलेख लगाकर कागज काले कर रहे हैं, तो आप भी इस बहती गंगा में डुबकी लगा लीजिए।
इस पर वे सज्जन बोले, नहीं सर, आपकी लेखनी में एक तरह का जादू है। शब्दों का आपके पास अथाह भंडार है। हम तो आपके सामने कुछ भी नहीं हैं। हमारी इच्छा है कि आप हमारा इंटरव्यू प्रकाशित करा देंगे तो हम धन्य हो जाएंगे। मैंने उन सज्जन से पूछा कि आपको साहित्य सृजन करते कितना वक्त हुआ। हमने तो कभी आपका नाम भी नहीं सुना।
तब वे सज्जन शर्माते हुए बोले, सर, हकीकत यह है कि मैं पिछले छह महीने से लिख रहा हूं और हर रोज मेरी रचनाएं प्रकाशित हो रही हैं, पूरे नाम-पते व फोटो सहित।
मैं आश्चर्यचकित होकर बोला, मात्र छह महीने में वरिष्ठ साहित्यकार बन गए! बधाई हो आपकी लेखनी को और आपको।
वे सज्जन कुछ झेंपते हुए बोले, सर, लेखन मेरा धर्म है और समाज को नई दशा व दिशा प्रदान करता हूं।
अब देखिए उन सज्जन द्वारा दिए गए जवाब और लेखक द्वारा पूछे गए सवाल—
लेखक — आप किन-किन विषयों पर लिखते हैं?
सज्जन — हर विषय पर लिखता हूं।
लेखक — रोज कितनी रचनाएं प्रकाशित हो जाती हैं?
सज्जन — पांच-सात तो प्रकाशित हो ही जाती हैं।
लेखक — छह महीने में आप वरिष्ठ साहित्यकार कैसे बन गए?
सज्जन — सर, इन पत्र-पत्रिकाओं वालों ने ही हमें वरिष्ठ साहित्यकार बनाया है।
लेखक — आप साहित्य सृजन में कितना समय देते हैं?
साहित्यकार सज्जन — सर, आप से क्या छिपाना, कबाड़ी बाजार से पुरानी किताबें लाकर उनमें से लिखकर भेज देता हूं। मेरे को कौन सा लिखना आता है।
लेखक — आप कभी पकड़े नहीं गए?
साहित्यकार सज्जन — अरे सर, किसके पास इतना समय है जो रचनाओं को पढ़े। हर कोई बहुत अच्छा, वाह बहुत खूब, शानदार आलेख लिखकर इतिश्री कर लेते हैं।
लेखक — रोज इतनी रचनाएं कैसे प्रकाशित हो जाती हैं?
साहित्यकार सज्जन — सर, हर माह ऑनलाइन इन प्रकाशकों के खाते में दो-दो हजार रुपए चाय-नाश्ते हेतु सुविधा शुल्क डाल देता हूं, ताकि मेरी रचनाएं हर रोज मय फोटो प्रकाशित होती रहें।
लेखक — अब तक आपकी कितनी किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं?
साहित्यकार सज्जन — यहीं कोई दस-बारह।
लेखक — क्या वे भी चुराई हुई हैं?
साहित्यकार सज्जन — हां, करीब-करीब।
लेखक — आप कितनी बार सम्मानित हो चुके हैं?
साहित्यकार सज्जन — सर, सम्मान इतने मिल चुके हैं कि उनकी कोई गिनती नहीं है। आप कभी समय निकालकर हमारे बंगले आइए। पूरा कमरा प्रशंसा पत्रों और स्मृति-चिन्हों से भरा पड़ा है। आप उन्हें देखकर दंग रह जाएंगे।
लेखक — आपका यह साहित्य सृजन गैरकानूनी है। यह तो सरासर साहित्य की चोरी व नियमित रूप से साहित्य का सृजन करने वाले सरस्वती के उपासकों के साथ घोर अन्याय है। आप जैसे लोगों की वजह से आज साहित्यकार पिट रहा है और उनकी लेखनी दम तोड़ रही है। आपको ऐसा करते समय आपकी आत्मा धिक्कारती नहीं है? आपको शर्म नहीं आती?
साहित्यकार सज्जन — सर, जहां हमें सम्मान मिलता हो, प्रोत्साहन मिलता हो, वहां अगर किसी के साथ हमारी वजह से घोर अन्याय भी हो तो हमें उसकी चिंता नहीं करनी चाहिए। चूंकि आज के दौर में पैसा ही माई-बाप है। अतः पैसा फेंको और सम्मान पाओ।
उन साहित्यकार सज्जन का उत्तर सुनकर लेखक दंग रह गया और मन ही मन सोचने लगा कि हमने पांच दशक तक जो गहन चिंतन-मनन कर साहित्य सृजन किया और समाज को एक नई दशा व दिशा देने के लिए जो अपनी लेखनी चलाई, वह आज ऐसे छपास के रोगियों के कारण दम तोड़ रही है।
और हम अब अपनी रचनाओं को प्रकाशित कराने के लिए पत्र-पत्रिकाओं के कंप्यूटर ऑपरेटरों के समक्ष नाक रगड़ रहे हैं, गिड़गिड़ा रहे हैं। यह कैसी विडंबना! जिन्होंने आज साहित्य सृजन का बेड़ा गर्क कर दिया।
उन सज्जन के जवाब सुनकर चेतन चौहान, चांद मोहम्मद घोसी और गोपाल सिंह राठौड़ दंग रह गए कि आज का इंसान मान-सम्मान पाने के लिए कितना गिर गया है।
सुनील कुमार माथुर
सदस्य अणुव्रत लेखक मंच एवं
स्वतंत्र लेखक व पत्रकार
33 वर्धमान नगर, शोभावतों की ढाणी, खेमे का कुआं, पाल रोड, जोधपुर, राजस्थान









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धन्यवाद
वरिष्ठ साहित्यकारों के अनुभव और विचार समाज की अमूल्य धरोहर हैं।
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