
लेख में हरियाणवी संगीत में बढ़ती दोअर्थी भाषा और महिलाओं के अपमानजनक चित्रण पर चिंता व्यक्त की गई है। सोशल मीडिया और वायरल संस्कृति के कारण कई गीत सनसनी और लोकप्रियता के लिए बनाए जा रहे हैं। लेखक का मानना है कि संगीत को समाज की संस्कृति और बेटियों की गरिमा का सम्मान करते हुए आगे बढ़ना चाहिए।
- दोअर्थी गीतों से बदलती संगीत की दिशा
- वायरल संस्कृति और गिरती सांस्कृतिक संवेदनशीलता
- मनोरंजन के नाम पर महिलाओं का अपमान
- हरियाणवी लोक संस्कृति की असली पहचान पर संकट
डॉ. सत्यवान सौरभ
हरियाणा की मिट्टी केवल खेती-किसानी की ताकत से ही नहीं, बल्कि अपनी समृद्ध लोक संस्कृति से भी पहचानी जाती है। यहाँ की चौपालों में गूँजती रागनियाँ, शादी-ब्याह के लोकगीत, खेतों में काम करती महिलाओं की सामूहिक आवाजें और तीज-त्योहारों पर गाए जाने वाले पारंपरिक गीत—ये सब मिलकर हरियाणवी समाज की सांस्कृतिक आत्मा को जीवित रखते आए हैं। इन गीतों में प्रेम भी था, व्यंग्य भी था, जीवन का संघर्ष भी था और सामाजिक चेतना भी। सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी कि इन गीतों में मनोरंजन के साथ-साथ मर्यादा और संवेदनशीलता भी होती थी।
लेकिन पिछले कुछ वर्षों में हरियाणवी संगीत की दिशा तेजी से बदलती दिखाई दे रही है। आधुनिक बीट्स, तेज रफ्तार रैप, ग्लैमर और सोशल मीडिया की वायरल संस्कृति ने इस संगीत को लोकप्रिय तो बनाया है, लेकिन इसके साथ कई चिंताजनक प्रवृत्तियाँ भी उभर कर सामने आई हैं। आज हरियाणवी गीतों का एक बड़ा हिस्सा केवल मनोरंजन तक सीमित नहीं रहा, बल्कि कई बार वह दोअर्थी शब्दों, भद्दे संकेतों और महिलाओं के अपमानजनक चित्रण का माध्यम बनता जा रहा है।
यह बदलाव केवल भाषा तक सीमित नहीं है। कई गीतों के वीडियो में महिलाओं को ऐसे रूप में प्रस्तुत किया जाता है, जहाँ उनका अस्तित्व केवल आकर्षण या मनोरंजन की वस्तु बनकर रह जाता है। यह प्रवृत्ति न केवल संगीत की गुणवत्ता को प्रभावित करती है, बल्कि समाज में स्त्री के प्रति दृष्टिकोण को भी प्रभावित कर सकती है।
आज हरियाणा तेजी से बदल रहा है। यहाँ की बेटियाँ शिक्षा, खेल, प्रशासन और विज्ञान के क्षेत्र में नए मुकाम हासिल कर रही हैं। गाँवों से निकलकर देश-दुनिया में नाम रोशन कर रही इन बेटियों ने यह साबित कर दिया है कि अवसर मिलने पर वे किसी भी क्षेत्र में पीछे नहीं हैं। लेकिन दूसरी ओर, लोकप्रिय संस्कृति के कुछ हिस्सों में उनका चित्रण जिस तरह से किया जा रहा है, वह चिंताजनक है। जब लोकप्रिय गीतों में महिलाओं को हल्के या दोअर्थी संदर्भों में दिखाया जाता है, तो यह केवल मनोरंजन का विषय नहीं रह जाता। यह धीरे-धीरे एक सामाजिक मानसिकता को भी जन्म देता है, जिसमें स्त्री को सम्मानित व्यक्ति के रूप में नहीं बल्कि मनोरंजन की वस्तु के रूप में देखा जाने लगता है।
हरियाणवी समाज में परिवार और सामाजिक सम्मान की अवधारणा हमेशा महत्वपूर्ण रही है। यहाँ बेटियों को घर की इज्जत माना जाता है। लेकिन विडंबना यह है कि वही समाज कई बार ऐसे गीतों को भी उत्साह से सुनता है, जिनमें महिलाओं के लिए इस्तेमाल की गई भाषा सम्मानजनक नहीं होती। इस पूरे परिदृश्य में सोशल मीडिया की भूमिका भी कम नहीं है। आज गीत केवल रेडियो या कैसेट तक सीमित नहीं हैं। यूट्यूब, इंस्टाग्राम और अन्य डिजिटल प्लेटफॉर्म ने संगीत को लाखों लोगों तक पहुँचाने का रास्ता खोल दिया है। एक गीत कुछ ही घंटों में वायरल हो सकता है और करोड़ों लोग उसे देख सकते हैं।
समस्या यह है कि इस वायरल संस्कृति में कई बार गुणवत्ता से ज्यादा सनसनी को महत्व मिलने लगता है। विवादास्पद या दोअर्थी शब्दों वाले गीत जल्दी ध्यान आकर्षित करते हैं और इसलिए कुछ निर्माता जानबूझकर ऐसी सामग्री तैयार करते हैं, जो चर्चा पैदा कर सके। लेकिन सवाल यह है कि क्या कुछ लाख व्यूज़ और लाइक्स के लिए समाज की संवेदनशीलता को नजरअंदाज किया जा सकता है?
हरियाणवी संस्कृति की असली पहचान उसकी सादगी, स्पष्टता और स्वाभिमान से रही है। यहाँ के लोकगीतों में हास्य होता था, लेकिन वह मर्यादित होता था। व्यंग्य होता था, लेकिन उसमें अपमान नहीं होता था। आज जब हम कई आधुनिक गीतों को देखते-सुनते हैं, तो लगता है कि संस्कृति केवल एक “देसी पैकेज” बनकर रह गई है—जिसमें ट्रैक्टर, खेत, देसी पहनावा और गाँव का दृश्य तो दिखाया जाता है, लेकिन भाषा और भावनाओं में वह संवेदनशीलता नहीं दिखाई देती, जो असली संस्कृति की पहचान होती है।
संस्कृति केवल बाहरी प्रतीकों से नहीं बनती। संस्कृति का असली अर्थ समाज के मूल्यों और संवेदनाओं से होता है। यदि किसी संस्कृति को केवल बाजार और मनोरंजन का साधन बना दिया जाए, तो धीरे-धीरे उसकी गरिमा कम होने लगती है।
यह मुद्दा केवल कलाकारों तक सीमित नहीं है। समाज के हर हिस्से की इसमें भूमिका है। कलाकारों को यह समझना होगा कि लोकप्रियता के साथ जिम्मेदारी भी आती है। उनके गीत लाखों युवाओं तक पहुँचते हैं और वे अनजाने में समाज की सोच को प्रभावित कर सकते हैं। इसी तरह दर्शकों और श्रोताओं की भी जिम्मेदारी है। जब तक लोग ऐसे गीतों को उत्साह से सुनते रहेंगे, तब तक बाजार में उनकी मांग बनी रहेगी। इसलिए समाज को भी यह तय करना होगा कि वह किस तरह की संस्कृति को बढ़ावा देना चाहता है।
सरकार और सांस्कृतिक संस्थाओं की भूमिका भी यहाँ महत्वपूर्ण हो जाती है। रचनात्मक अभिव्यक्ति पर अनावश्यक प्रतिबंध लगाना किसी भी लोकतांत्रिक समाज के लिए उचित नहीं है। लेकिन यह सुनिश्चित करना भी जरूरी है कि सार्वजनिक मंचों पर प्रस्तुत सामग्री में न्यूनतम सामाजिक संवेदनशीलता बनी रहे। हरियाणवी संगीत की असली ताकत उसकी लोक परंपरा में रही है। यही संगीत चौपालों से निकलकर मंचों तक पहुँचा और फिर पूरे देश में अपनी पहचान बना सका। यदि इसी संगीत को केवल सनसनी और विवाद का माध्यम बना दिया जाएगा, तो यह उसकी आत्मा के साथ अन्याय होगा।
मनोरंजन समाज का जरूरी हिस्सा है। संगीत लोगों को जोड़ता है, खुशियाँ देता है और जीवन के तनाव को कम करता है। लेकिन मनोरंजन तब तक ही सुंदर लगता है, जब तक वह समाज की गरिमा और संवेदनशीलता का सम्मान करता है। हरियाणा की असली पहचान उसकी मेहनती जनता, उसकी मजबूत संस्कृति और उसकी बेटियाँ हैं। यदि संगीत सच में इस संस्कृति का प्रतिनिधित्व करना चाहता है, तो उसे इस गरिमा का सम्मान भी करना होगा।
आज जरूरत इस बात की है कि हरियाणवी संगीत केवल तेज बीट्स और वायरल वीडियो तक सीमित न रह जाए, बल्कि वह अपनी मूल पहचान—सादगी, संवेदनशीलता और सम्मान—को भी साथ लेकर चले। क्योंकि जब संस्कृति का नाम लेकर गंदगी परोसी जाने लगे, तो यह केवल संगीत का संकट नहीं होता, बल्कि समाज की सोच का भी संकट बन जाता है। और किसी भी समाज की सबसे बड़ी पहचान उसकी संस्कृति और उसकी बेटियों की गरिमा ही होती है।
(डॉ. सत्यवान सौरभ, पीएचडी (राजनीति विज्ञान), एक कवि और सामाजिक विचारक हैं।)








