
नारी सम्मान का उद्देश्य महिलाओं को समाज में उनकी वास्तविक भूमिका और योगदान के लिए पहचान देना होना चाहिए। लेकिन जब सम्मान केवल फोटो, प्रमाणपत्र और सोशल मीडिया पोस्ट तक सीमित रह जाए, तो वह सम्मान नहीं बल्कि सम्मान का बाज़ार बन जाता है। महिलाओं को ट्रॉफियों से ज्यादा जरूरत है समान अवसर, सुरक्षा, शिक्षा और सम्मानजनक जीवन की। उन्हें ऐसे समाज की जरूरत है जहाँ उनकी मेहनत को मंच की चमक के बिना भी पहचाना जाए।
- क्या दिखावे में बदल रहे हैं नारी सम्मान
- मंच की चमक में छिपता असली सशक्तिकरण
- सम्मान समारोहों की बढ़ती होड़
- असली संघर्षशील महिलाएँ क्यों रह जाती हैं पीछे
डॉ. प्रियंका सौरभ
समाज में सम्मान का अर्थ कभी बहुत गहरा हुआ करता था। किसी को सम्मानित करना केवल एक औपचारिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि उसके संघर्ष, श्रम और योगदान को सार्वजनिक रूप से स्वीकार करने का एक नैतिक दायित्व माना जाता था। सम्मान का अर्थ था समाज की ओर से यह स्वीकार करना कि किसी व्यक्ति ने अपने जीवन से दूसरों के लिए रास्ता बनाया है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में एक अजीब प्रवृत्ति तेजी से उभरी है—“नारी सम्मान” के नाम पर पुरस्कारों का बाज़ार।
आज ऐसा लगता है मानो हर संस्था, हर मंच और हर संगठन “नारी शक्ति सम्मान”, “वुमन आइकन अवॉर्ड”, “वुमन लीडरशिप अवॉर्ड”, “ग्लोबल वुमन एक्सीलेंस अवॉर्ड” जैसे भव्य नामों से पुरस्कार बाँटने की होड़ में लगा है। सोशल मीडिया खोलिए तो हर दूसरे दिन किसी न किसी महिला को “अंतरराष्ट्रीय महिला सम्मान” या “राष्ट्रीय महिला रत्न” से सम्मानित किए जाने की तस्वीरें दिखाई देती हैं। मंच पर मुस्कुराते चेहरे, हाथों में चमकती ट्रॉफियाँ और पीछे बड़े-बड़े बैनर—सब कुछ देखने में बेहद आकर्षक लगता है। लेकिन इस चमकदार तस्वीर के पीछे कई ऐसे सवाल छिपे हैं जिन्हें अक्सर पूछने से बचा लिया जाता है। सवाल यह नहीं कि महिलाओं को सम्मान क्यों दिया जा रहा है; सवाल यह है कि क्या ये सम्मान सचमुच सम्मान हैं, या केवल दिखावे और प्रचार का साधन बनते जा रहे हैं?
दरअसल आज “नारी सशक्तिकरण” एक ऐसा शब्द बन गया है जिसका प्रयोग जितना ज्यादा होता है, उसका वास्तविक अर्थ उतना ही कमजोर होता जाता है। मंचों पर बड़ी-बड़ी बातें होती हैं, भाषणों में महिलाओं की शक्ति और क्षमता का गुणगान किया जाता है, लंबी-लंबी सूची में पुरस्कार बाँटे जाते हैं, फोटो खिंचते हैं, सोशल मीडिया पोस्ट बनते हैं और अगले दिन सब कुछ सामान्य हो जाता है। इस पूरे क्रम में अक्सर वह महिला गायब रहती है जिसके जीवन में सशक्तिकरण की सबसे ज्यादा जरूरत है।
भारतीय समाज में सम्मान का अर्थ केवल ट्रॉफी या प्रमाणपत्र नहीं था। किसी को सम्मानित करना उस व्यक्ति के सामाजिक योगदान को स्वीकार करना था। यह एक तरह से समाज की ओर से कहा गया धन्यवाद होता था—कि आपने अपने जीवन से दूसरों के लिए रास्ता बनाया। लेकिन जब सम्मान का उद्देश्य बदलकर प्रचार, नेटवर्किंग और व्यक्तिगत ब्रांडिंग बन जाए, तो उसका मूल्य भी धीरे-धीरे कम हो जाता है। आज कई पुरस्कार समारोह ऐसे होते हैं जिनमें वास्तविक चयन प्रक्रिया अस्पष्ट होती है। कई बार प्रतिभागियों को स्वयं नामांकन करना पड़ता है, कुछ जगहों पर नामांकन के साथ शुल्क भी लिया जाता है और अंत में एक भव्य समारोह में लगभग सभी को सम्मानित कर दिया जाता है। ऐसे आयोजनों में सम्मान की गरिमा से ज्यादा महत्व मंच की सजावट, कैमरों की फ्लैश और सोशल मीडिया पोस्ट को दिया जाता है।
सोशल मीडिया के दौर ने इस प्रवृत्ति को और तेज कर दिया है। आज सम्मान केवल एक प्रमाणपत्र नहीं, बल्कि डिजिटल पहचान का हिस्सा बन गया है। किसी को भी कोई पुरस्कार मिलते ही उसकी तस्वीरें फेसबुक, इंस्टाग्राम और व्हाट्सऐप पर साझा की जाती हैं। कैप्शन में लिखा जाता है—“मुझे अंतरराष्ट्रीय महिला सम्मान प्राप्त हुआ।” इन पोस्टों को देखकर ऐसा प्रतीत होता है कि मानो सम्मान प्राप्त करना ही सशक्तिकरण का अंतिम लक्ष्य हो। धीरे-धीरे यह स्थिति बन जाती है कि सम्मान पाने की होड़ असली काम से ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाती है।
यह प्रवृत्ति केवल व्यक्तिगत स्तर पर ही नहीं, बल्कि संस्थागत स्तर पर भी दिखाई देती है। कई संगठन सम्मान समारोहों को अपने प्रचार का साधन बना लेते हैं। वे बड़ी-बड़ी उपाधियाँ देते हैं, मंच पर भव्य आयोजन करते हैं और फिर उस कार्यक्रम का उपयोग अपने संगठन की पहचान बढ़ाने के लिए करते हैं। कभी-कभी तो यह स्थिति भी देखने को मिलती है कि एक ही व्यक्ति कुछ महीनों के भीतर कई अलग-अलग संस्थाओं से सम्मानित हो जाता है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि अगर इतने पुरस्कार दिए जा रहे हैं, तो क्या वास्तव में समाज की मेहनती और संघर्षशील महिलाएँ सामने आ रही हैं? ग्रामीण भारत में लाखों महिलाएँ हैं जो अपने परिवार, समाज और समुदाय के लिए अद्भुत काम कर रही हैं। वे स्वयं सहायता समूह चला रही हैं, गाँवों में शिक्षा का प्रचार कर रही हैं, पर्यावरण संरक्षण में योगदान दे रही हैं या घरेलू हिंसा और सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ संघर्ष कर रही हैं। कई महिलाएँ सीमित संसाधनों के बावजूद अपने बच्चों को शिक्षित करने के लिए अथक मेहनत कर रही हैं। कई महिलाएँ समाज की बंदिशों को तोड़कर अपने पैरों पर खड़ी हो रही हैं।
लेकिन इन महिलाओं के पास न तो बड़े मंचों तक पहुँच होती है और न ही प्रचार का साधन। इसलिए उनका काम अक्सर गुमनाम रह जाता है। वे सम्मान की सूची में शायद ही कभी दिखाई देती हैं। इसके विपरीत, कुछ लोग बार-बार सम्मानित होते रहते हैं। कभी किसी संस्था से “महिला शक्ति सम्मान”, कभी किसी संगठन से “महिला प्रेरणा अवॉर्ड”, तो कभी किसी मंच से “राष्ट्रीय महिला रत्न”। यह स्थिति सम्मान की विश्वसनीयता पर भी प्रश्नचिह्न लगा देती है।
आज यह कहना गलत नहीं होगा कि कुछ जगहों पर “अवार्ड इंडस्ट्री” विकसित हो चुकी है। इस उद्योग का एक तय ढाँचा होता है। पहले एक आकर्षक नाम से पुरस्कार की घोषणा की जाती है। फिर नामांकन आमंत्रित किए जाते हैं। इसके बाद चयन समिति का गठन होता है, जिसकी प्रक्रिया अक्सर पारदर्शी नहीं होती। अंत में किसी बड़े होटल या सभागार में समारोह आयोजित किया जाता है, जहाँ दर्जनों लोगों को सम्मानित किया जाता है।
कई बार इन आयोजनों में वास्तविक उपलब्धियों से ज्यादा महत्व संपर्क, पहचान और भुगतान को मिल जाता है। कुछ जगहों पर नामांकन या पंजीकरण शुल्क भी लिया जाता है। जब सम्मान भी एक उत्पाद की तरह बिकने लगे, तो उसकी नैतिकता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
महिलाओं का सशक्तिकरण केवल पुरस्कारों से नहीं होगा। असली सशक्तिकरण तब होगा जब समाज महिलाओं को समान अवसर देगा। आज भी भारत में लाखों लड़कियाँ शिक्षा से वंचित हैं। कई महिलाएँ आर्थिक रूप से निर्भर हैं। घरेलू हिंसा, लैंगिक भेदभाव और सामाजिक दबाव जैसी समस्याएँ आज भी मौजूद हैं। अगर इन समस्याओं को दूर किए बिना केवल सम्मान बाँटे जाते रहेंगे, तो यह सशक्तिकरण का समाधान नहीं, बल्कि समस्या का सौंदर्यीकरण होगा।
सम्मान तब सार्थक होता है जब वह संघर्ष की पहचान बने, न कि केवल मंच की सजावट। अगर सम्मान प्रेरणा बनता है, तो वह समाज को आगे बढ़ाता है। लेकिन अगर वह केवल प्रतिष्ठा और प्रचार का साधन बन जाए, तो वह धीरे-धीरे अपना अर्थ खो देता है।
यह जिम्मेदारी केवल संस्थाओं की नहीं, बल्कि समाज की भी है। हमें यह समझना होगा कि सम्मान का मूल्य तभी है जब वह ईमानदारी और पारदर्शिता से दिया जाए। हमें यह भी देखना होगा कि जिन लोगों को सम्मान दिया जा रहा है, उनका काम वास्तव में समाज को किस तरह प्रभावित कर रहा है। अगर हम केवल चमक-दमक और बड़े नामों के आधार पर सम्मान तय करेंगे, तो वास्तविक योगदान करने वाले लोग हमेशा पीछे रह जाएँगे।
नारी सम्मान का उद्देश्य महिलाओं को समाज में उनकी वास्तविक भूमिका और योगदान के लिए पहचान देना होना चाहिए। लेकिन जब सम्मान केवल फोटो, प्रमाणपत्र और सोशल मीडिया पोस्ट तक सीमित रह जाए, तो वह सम्मान नहीं बल्कि सम्मान का बाज़ार बन जाता है। महिलाओं को ट्रॉफियों से ज्यादा जरूरत है समान अवसर, सुरक्षा, शिक्षा और सम्मानजनक जीवन की। उन्हें ऐसे समाज की जरूरत है जहाँ उनकी मेहनत को मंच की चमक के बिना भी पहचाना जाए।
क्योंकि इतिहास यह नहीं पूछता कि किसी को कितने पुरस्कार मिले थे; इतिहास यह पूछता है कि उसने समाज के लिए क्या बदला। और शायद यही सवाल आज हमें खुद से भी पूछना चाहिए—कि हम सचमुच महिलाओं को सम्मान दे रहे हैं, या केवल सम्मान का एक नया बाज़ार खड़ा कर रहे हैं।
(डॉ. प्रियंका सौरभ, पीएचडी (राजनीति विज्ञान), कवयित्री एवं सामाजिक चिंतक हैं।)








