
उत्तराखंड के उच्च हिमालयी क्षेत्रों में औषधीय बुरांस के फूल समय से पहले खिलने लगे हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार जनवरी में ही मार्च जैसा तापमान मिलने से बुरांस का जीवन चक्र प्रभावित हो रहा है। एफआरआइ के दीर्घकालिक अध्ययन ने इसे जलवायु परिवर्तन का गंभीर संकेत बताया है।
- उत्तराखंड में बुरांस के फूल समय से पहले खिल रहे
- जनवरी में मिल रहा मार्च-अप्रैल जैसा तापमान
- जलवायु परिवर्तन से बुरांस का जीवन चक्र अस्त-व्यस्त
- एफआरआइ के 16 वर्षों के अध्ययन में खतरे की पुष्टि
देहरादून। उत्तराखंड के ऊंचे हिमालयी क्षेत्रों में पाया जाने वाला औषधीय गुणों से भरपूर बुरांस (रोडोडेंड्रान) अब जलवायु परिवर्तन की गंभीर मार झेल रहा है। बिना पर्याप्त वर्षा के तापमान में असामान्य वृद्धि के कारण बुरांस के फूल अपने सामान्य समय से पहले खिलने लगे हैं, जिससे इसके प्राकृतिक जीवन चक्र पर संकट खड़ा हो गया है। सामान्य परिस्थितियों में बुरांस का डीएनए पौधे की कोशिकाओं को मार्च–अप्रैल में फूल बनने के संकेत देता है, जब तापमान 20 से 25 डिग्री सेल्सियस तक पहुंचता है। लेकिन अब यही तापमान जनवरी माह में ही मिलने लगा है।
नतीजतन फूल बनने की प्रक्रिया समय से पहले शुरू हो जाती है, जबकि मौसम की अस्थिरता के कारण ये फूल टिक नहीं पाते। जनवरी में बुरांस की कलियां ठंड से बचने के लिए सेपल्स (अंखुड़ियों) से ढकी रहती हैं। स्थायी तापमान वृद्धि होने पर ही ये सेपल्स हटते हैं। लेकिन जब कुछ दिनों के लिए तापमान अचानक बढ़ता है, तो डीएनए तुरंत हार्मोनल संकेत दे देता है। इसके बाद तापमान दोबारा गिरने पर कोमल पुंकेसर और स्त्रीकेसर इस झटके को सहन नहीं कर पाते और फूल असमय नष्ट हो जाते हैं।
वन अनुसंधान संस्थान (एफआरआइ) की बाटनी और फॉरेस्ट फिजियोलॉजी डिविजन ने बुरांस के समय से पहले खिलने की प्रवृत्ति पर 16 वर्ष पहले अध्ययन शुरू किया था। चमोली जिले के तुंगनाथ–चोपता क्षेत्र में किए गए अध्ययन में लगातार कई वर्षों से बुरांस के असामान्य फूलने की पुष्टि हुई है। तत्कालीन वरिष्ठ विज्ञानी डॉ. सुभाष नौटियाल के नेतृत्व में शुरू हुए इस शोध को अब डॉ. हुकुम सिंह आगे बढ़ा रहे हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि यही स्थिति बनी रही, तो आने वाले वर्षों में बुरांस के नए पौधों की संख्या तेजी से घटेगी और यह हिमालयी प्रजाति संकटग्रस्त हो सकती है।
हिमालय में पाई जाने वाली चार प्रजातियों में से रोडोडेंड्रान अर्बोरियम (लाल बुरांस) पर जलवायु परिवर्तन का सबसे गंभीर प्रभाव देखा गया है। यह प्रजाति मानव बस्तियों के निकट और अपेक्षाकृत निचली ऊंचाई पर पाई जाती है, इसलिए तापमान में हो रहे बदलाव का असर सबसे पहले इसी पर दिख रहा है। उत्तराखंड में बुरांस की प्रजातियां और ऊंचाई-
- रोडोडेंड्रान अर्बोरियम: 5,000 – 8,500 फीट
- रोडोडेंड्रान बार्बेटम: 7,000 – 9,000 फीट
- रोडोडेंड्रान कैंपनुलटम: 10,000 – 11,000 फीट
- रोडोडेंड्रान लेपीडोटम: 12,000 फीट से अधिक
🌳 अन्य पेड़ों पर भी असर
एफआरआइ की इकोलॉजी, क्लाइमेट चेंज एवं इंफ्लुएंस डिविजन ने अर्जुन (टर्मिनलिया अर्जुना) पर भी तापमान वृद्धि का परीक्षण किया। प्रयोगशाला में पौधे को 2.5 डिग्री सेल्सियस अधिक तापमान देने पर नई पत्तियां मार्च के बजाय फरवरी में ही निकल आईं। यह दर्शाता है कि मामूली तापमान वृद्धि भी पौधों की जैविक घड़ी को बदल रही है।
🌧️ वर्षा की बेरुखी से बढ़ा संकट
दिसंबर 2025 में उत्तराखंड में लगभग 100 प्रतिशत वर्षा घाटा दर्ज किया गया। जहां सामान्यतः 7.9 से 23.7 एमएम वर्षा होती है, वहां लगभग शून्य बारिश दर्ज हुई।
- 2021: 182 एमएम
- 2024: 12 एमएम
- 2025: 04 एमएम
इसका असर कृषि, जलस्रोत, पर्यटन और जंगलों पर साफ दिखाई देने लगा है। गेहूं और सरसों की फसल को 25 प्रतिशत तक नुकसान, जल स्रोतों में कमी, औली-चकराता जैसे पर्यटन स्थलों पर पर्यटकों की घटती संख्या और जंगल की आग का बढ़ता खतरा इसी का परिणाम है।








