
देहरादून वन प्रभाग की आर्केडिया बीट, आशारोड़ी क्षेत्र में आरक्षित वन भूमि पर अवैध कब्ज़े और निर्माण के गंभीर आरोप सामने आए हैं। ISRO-BHUVAN और Google Earth के सैटेलाइट साक्ष्यों के आधार पर HESCO NGO और उसके संस्थापक पर वन कानून उल्लंघन का आरोप लगाया गया है। प्रकरण की त्वरित जांच कर दोषियों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई की मांग की गई है।
- ISRO-BHUVAN और Google Earth से सामने आए वन अतिक्रमण के संकेत
- आरक्षित वन क्षेत्र में भवन और सड़क निर्माण पर सवाल
- Forest Conservation Act उल्लंघन का आरोप, केंद्र की अनुमति का अभाव
- वन विभाग से त्वरित जांच और सख्त कार्रवाई की मांग
देहरादून। देहरादून वन प्रभाग के अंतर्गत आर्केडिया बीट, आशारोड़ी रेंज में आरक्षित वन भूमि पर अवैध कब्ज़े, भवन और सड़क निर्माण को लेकर गंभीर आरोप सामने आए हैं। इस संबंध में प्रभागीय वन अधिकारी, देहरादून को एक लिखित शिकायत सौंपी गई है, जिसमें देश के प्रतिष्ठित पर्यावरणविद और HESCO (Himalayan Environmental Studies & Conservation Organization) के संस्थापक डॉ. अनिल प्रकाश जोशी पर आरक्षित वन भूमि अतिक्रमण का आरोप लगाया गया है।
शिकायत में कहा गया है कि HESCO NGO द्वारा वर्षों से वन भूमि पर कथित रूप से कब्ज़ा कर संस्थागत गतिविधियाँ संचालित की जा रही हैं, साथ ही बिना वैधानिक अनुमति के भवनों और सड़कों का निर्माण कराया गया है। यह पूरा मामला इसलिए भी गंभीर माना जा रहा है क्योंकि आरोपित क्षेत्र विधिवत आरक्षित वन क्षेत्र में आता है, जहाँ किसी भी प्रकार का गैर-वन उपयोग कानूनन प्रतिबंधित है।
शिकायतकर्ता के अनुसार, उपलब्ध ISRO-BHUVAN सैटेलाइट मानचित्र और Google Earth के तुलनात्मक चित्र (वर्ष 2011, 2013, 2024 और 2025) स्पष्ट रूप से यह दर्शाते हैं कि आरक्षित वन क्षेत्र के भीतर HESCO परिसर का निरंतर विस्तार किया गया। समय-समय पर लिए गए सैटेलाइट चित्रों में वन क्षेत्र में स्थायी ढाँचों, मार्गों और अन्य निर्माण गतिविधियों की बढ़ोतरी दिखाई देती है, जो प्रथम दृष्टया वन संरक्षण कानूनों के उल्लंघन की ओर संकेत करती है।
पत्र में विशेष रूप से Forest Conservation Act, 1980 का उल्लेख किया गया है। इसके अनुसार, किसी भी आरक्षित वन भूमि को गैर-वन प्रयोजन के लिए उपयोग करने से पहले केंद्र सरकार की पूर्व स्वीकृति अनिवार्य होती है। आरोप है कि संबंधित निर्माणों के लिए ऐसी कोई स्वीकृति नहीं ली गई, जिससे यह मामला कानून की धारा-2 के स्पष्ट उल्लंघन के दायरे में आता है।
यह भी उल्लेखनीय है कि डॉ. अनिल प्रकाश जोशी को पद्म श्री (2006) और पद्म भूषण (2020) जैसे प्रतिष्ठित राष्ट्रीय सम्मानों से सम्मानित किया जा चुका है। ऐसे में, शिकायतकर्ता का तर्क है कि एक ओर पर्यावरण संरक्षण के लिए सम्मानित व्यक्ति और संस्था पर आरक्षित वन भूमि में अवैध गतिविधियों के आरोप, प्रशासन और समाज—दोनों के लिए गंभीर चिंता का विषय हैं। इससे न केवल कानून की निष्पक्षता पर प्रश्न उठता है, बल्कि पर्यावरण संरक्षण के नाम पर संचालित संस्थाओं की पारदर्शिता भी कटघरे में आती है।
शिकायत में प्रभागीय वन अधिकारी से आग्रह किया गया है कि पूरे प्रकरण की निष्पक्ष और त्वरित जांच कराई जाए, सैटेलाइट साक्ष्यों का भौतिक सत्यापन कराया जाए और यदि आरोप सही पाए जाते हैं तो दोषियों के विरुद्ध वन अधिनियम और अन्य प्रासंगिक कानूनों के तहत कठोर कार्रवाई सुनिश्चित की जाए। साथ ही, आरक्षित वन भूमि को अतिक्रमण-मुक्त कर मूल स्वरूप में बहाल करने की मांग भी की गई है।
वन विभाग के स्तर पर इस शिकायत को गंभीरता से लिए जाने की उम्मीद जताई जा रही है। पर्यावरण और वन कानूनों के जानकारों का कहना है कि यदि सैटेलाइट साक्ष्य जांच में सही साबित होते हैं, तो यह मामला राज्य ही नहीं, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर भी चर्चा का विषय बन सकता है। अब सभी की निगाहें वन विभाग की आगामी कार्रवाई पर टिकी हैं, जिससे यह स्पष्ट हो सके कि आरक्षित वन क्षेत्रों की सुरक्षा को लेकर प्रशासन कितना सख्त और निष्पक्ष रुख अपनाता है।








