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पाठक ने कहा कि वर्ष 2007 में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने इस दिवस के नाम में महत्वपूर्ण परिवर्तन करते हुए “अंतर्राष्ट्रीय विकलांग दिवस” को “अंतर्राष्ट्रीय दिव्यांगजन दिवस” नाम दिया। यह बदलाव केवल शब्दों का परिवर्तन नहीं था, बल्कि समाज में एक अधिक मानवीय, सम्मानजनक और समावेशी दृष्टिकोण स्थापित करने का गंभीर प्रयास था।
जहानाबाद। अंतर्राष्ट्रीय दिव्यांगजन दिवस के अवसर पर आचार्यकुल के राष्ट्रीय प्रवक्ता, साहित्यकार एवं इतिहासकार सत्येन्द्र कुमार पाठक ने कहा कि यह दिवस न केवल दिव्यांगजनों के अधिकारों और सम्मान को बढ़ावा देने का संकल्प है, बल्कि समाज को यह याद दिलाने का भी अवसर है कि दिव्यांग व्यक्ति हमारे सामाजिक ताने-बाने के अभिन्न हिस्से हैं। उन्होंने बताया कि यह दिवस संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा 3 दिसंबर 1992 को आधिकारिक रूप से घोषित किए जाने के बाद से हर वर्ष दुनिया भर में मनाया जा रहा है।
पाठक ने इस दिवस के इतिहास पर प्रकाश डालते हुए कहा कि इसकी नींव बहुत पहले रखी जा चुकी थी। संयुक्त राष्ट्र ने 1976 में दिव्यांगजन दिवस की शुरुआत की और इसके बाद 1981 को “विकलांगजनों का अंतर्राष्ट्रीय वर्ष” घोषित किया गया, जिसने वैश्विक स्तर पर दिव्यांगजनों के अधिकारों से जुड़े प्रयासों को नई दिशा और गति प्रदान की। इस घोषणा ने विश्वभर की सरकारों, सामाजिक संगठनों और नीति-निर्माताओं को इस दिशा में गंभीर और ठोस कदम उठाने के लिए प्रेरित किया।
उन्होंने बताया कि अंतर्राष्ट्रीय दिव्यांगजन दिवस का मूल उद्देश्य दिव्यांगता से जुड़े मुद्दों के प्रति वैश्विक जागरूकता बढ़ाना है, ताकि दिव्यांग व्यक्ति शिक्षा, रोजगार, चिकित्सा, सार्वजनिक सुविधाओं और सामाजिक जीवन में पूर्ण सम्मान और समान अवसर प्राप्त कर सकें। यह दिन समाज में मौजूद उन बाधाओं और पूर्वाग्रहों की ओर भी ध्यान आकृष्ट करता है जो दिव्यांग व्यक्तियों को अपनी प्रतिभा और क्षमता का पूरा उपयोग करने से रोकते हैं।
पाठक ने कहा कि वर्ष 2007 में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने इस दिवस के नाम में महत्वपूर्ण परिवर्तन करते हुए “अंतर्राष्ट्रीय विकलांग दिवस” को “अंतर्राष्ट्रीय दिव्यांगजन दिवस” नाम दिया। यह बदलाव केवल शब्दों का परिवर्तन नहीं था, बल्कि समाज में एक अधिक मानवीय, सम्मानजनक और समावेशी दृष्टिकोण स्थापित करने का गंभीर प्रयास था। “दिव्यांग” शब्द उस विशिष्ट क्षमता को रेखांकित करता है जो प्रत्येक व्यक्ति अपने भीतर संजोए रहता है और समाज को यह समझाने का प्रयास करता है कि शारीरिक अथवा मानसिक चुनौतियाँ मानवीय मूल्य को कम नहीं करतीं।
उन्होंने कहा कि यह दिवस हम सभी को यह याद दिलाता है कि दिव्यांगजन समाज के सक्रिय, रचनात्मक और महत्वपूर्ण सदस्य हैं। उनके लिए सुलभ भवन, सार्वजनिक परिवहन, रोजगार के बेहतर अवसर, समुचित स्वास्थ्य सेवाएँ और शिक्षा तक सुगम पहुँच सुनिश्चित करना केवल दायित्व ही नहीं, बल्कि सामाजिक दायित्व और संवेदनशीलता का प्रश्न भी है। समाज तभी समावेशी माना जाएगा जब हर व्यक्ति, चाहे उसकी क्षमता कुछ भी हो, गरिमा और स्वतंत्रता के साथ जीवन जी सके।
सत्येन्द्र कुमार पाठक ने सभी नागरिकों, संस्थाओं और सरकारों से अपील की कि वे दिव्यांगजनों के अधिकारों की रक्षा, उनके सशक्तिकरण और उनके लिए न्यायसंगत, समान और सम्मानपूर्ण दुनिया बनाने के प्रयासों में सहयोग करें। उन्होंने कहा कि एक विकसित और संवेदनशील समाज वही है जो अपने सबसे कमजोर वर्ग के लिए सबसे मजबूत सहारा बन सके, और अंतर्राष्ट्रीय दिव्यांगजन दिवस इसी भावना को आगे बढ़ाने का संकल्प है।







