
देहरादून। उत्तराखंड में नवीकरणीय ऊर्जा संभावनाओं को नया आयाम देने की दिशा में ओएनजीसी ने एक महत्वपूर्ण कदम बढ़ाया है। ऑयल एंड नेचुरल गैस कॉरपोरेशन लिमिटेड ने राज्य के विभिन्न पर्वतीय क्षेत्रों में कुल 62 जियोथर्मल (भू-तापीय) स्रोतों की पहचान की है, जिन्हें भविष्य में स्वच्छ ऊर्जा उत्पादन के लिए उपयोग किया जा सकता है। यह सर्वे भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण—जीएसआई के साथ मिलकर शुरू किया गया है और इसका उद्देश्य उत्तराखंड की जियोथर्मल ऊर्जा क्षमता को वैज्ञानिक रूप से समझना और इसे ऊर्जा उत्पादन में बदलने की दिशा में ठोस आधार तैयार करना है।
राज्य सरकार ने हाल ही में जियोथर्मल एनर्जी पॉलिसी-2025 को मंजूरी दी है, जिसके अनुरूप ओएनजीसी ने अपनी अध्ययन टीम गठित की और सरकार को विस्तृत प्रस्ताव भेजा है। नई नीति के तहत, कंपनियों को 30 वर्षों के लिए लाइसेंस दिए जाएंगे तथा प्रतिस्पर्धात्मक बोली प्रक्रिया के माध्यम से परियोजनाओं का आवंटन होगा। जियोथर्मल ऊर्जा का उपयोग केवल बिजली उत्पादन तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि हीटिंग-कूलिंग, जल शुद्धिकरण और स्थानीय ग्रामीण अर्थव्यवस्था के विकास जैसे कई क्षेत्रों में इसका उपयोग किया जा सकता है, जिससे पहाड़ी क्षेत्रों में स्थायी विकास को बढ़ावा मिलेगा।
ओएनजीसी द्वारा चिन्हित किए गए भू-तापीय क्षेत्रों में बदरीनाथ का तप्तकुंड, यमुनोत्री क्षेत्र, तपोवन का तप्तकुंड, तथा अलकनंदा, मंदाकिनी, भागीरथी, यमुना और टौंस नदी घाटियों के कई स्थल शामिल हैं। ये स्रोत 1000 से 4000 मीटर की ऊंचाई पर स्थित हैं और इनका तापमान 25 डिग्री से 90 डिग्री सेल्सियस के बीच पाया गया है, जो इन्हें जियोथर्मल ऊर्जा उत्पादन के लिए उपयुक्त बनाता है।
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हालांकि परियोजना के साथ चुनौतियाँ भी कम नहीं हैं। हिमालयी क्षेत्र की भूकंपीय सक्रियता, भूमि धंसाव की संभावनाएं, जलस्रोतों पर संभावित दबाव, पर्यावरणीय प्रतिबंध और ऊंचाई वाले इलाकों में ट्रांसमिशन क्षमता की सीमाएँ विशेषज्ञों के लिए चिंता का विषय हैं। पर्यावरणविद लगातार चेतावनी दे रहे हैं कि तेजी से बढ़ते पर्यटन दबाव और भू-विनियोजन में बदलाव के कारण पहले से संवेदनशील पहाड़ी पारिस्थितिकी को और अधिक संभालकर कदम बढ़ाने की आवश्यकता है। समुदाय, भूमि अधिकार, वन-संवेदनशील क्षेत्र, और पर्यावरणीय मंजूरियाँ इस परियोजना के कार्यान्वयन में प्रमुख भूमिका निभाएँगी।
ओएनजीसी के मुख्य महाप्रबंधक संजय मुखर्जी के अनुसार, इस पहल का उद्देश्य केवल ऊर्जा उत्पादन नहीं, बल्कि वैज्ञानिक अध्ययन के आधार पर पर्यावरण-संगत विकास मॉडल तैयार करना भी है। उनकी राय में, जियोथर्मल ऊर्जा राज्य के भविष्य के ऊर्जा ढांचे में एक निर्णायक भूमिका निभा सकती है, बशर्ते इसे अत्यधिक सावधानी, तकनीकी विशेषज्ञता और स्थानीय परिस्थितियों की समझ के साथ लागू किया जाए।





