
सुनील कुमार माथुर
साहित्यकार समाज का सजग प्रहरी होता है। उसके मन और मस्तिष्क में हर समय विचारों का मंथन चलता रहता है। नित नए विचार मन-मस्तिष्क के मंथन से ही उत्पन्न होते हैं, न कि उलजलूल बातों से। जब मन में मंथन होता है, तभी नए-नए विचार आते हैं और साहित्यकार की लेखनी स्वतः प्रवाहित होने लगती है।
प्रायः लोग कहते हैं कि साहित्यकार बैठे-बैठे कुछ न कुछ लिखते ही रहते हैं, पर वे यह भूल जाते हैं कि उनका मस्तिष्क कोई संतरा या नींबू नहीं है कि थोड़ा दबाव डालने पर तुरंत रस निकल आए। चिंतन और मनन के लिए दिमाग में शब्दों और विचारों का मंथन आवश्यक है। तभी उस मंथन का श्रेष्ठ परिणाम सामने आता है।
चिंतन के बिना जीवन सूना-सूना लगता है। तभी तो कहा गया है कि जहाँ चिंतन-मनन और संवाद होता है, जहाँ विचारों का आदान-प्रदान होता है, वहीं “मक्खन-स्वरूप” श्रेष्ठ विचारों का उदय होता है। इसलिए सदैव मुस्कुराते हुए चिंतन-मनन करते रहिए और शब्दों के समुद्र में डुबकियाँ लगाते हुए हीरे-जवाहरात और मोतियों-स्वरूप रचनाओं का सृजन कीजिए।
श्रेष्ठ साहित्य सृजन हेतु संवाद, चिंतन और मनन का होना नितांत आवश्यक है। जहाँ सकारात्मक सोच होती है, वहीं साहित्य सृजन का आनंद मिलता है; अन्यथा यह धूल में लठ चलाने जैसा ही होता है।
सुनील कुमार माथुर
सदस्य, अणुव्रत लेखक मंच (स्वतंत्र लेखक व पत्रकार) जोधपुर, राजस्थान







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