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कोई कमी नहीं, ईश्वर को पाने के लिए अपने आपकों उनके चरणों में अर्पित करना होगा। सच्चे साधु संतों की यही पहचान है कि वे ज्ञानी, संयमी, सहनशील, धैर्यवान, विनम्र स्वभाव के व उनके चेहरे पर तेज होता हैं। ✍🏻 सुनील कुमार माथुर, जोधपुर (राजस्थान)
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किसी महापुरूष ने बहुत सुंदर बात कही है कि ईश्वर के खजाने में कृपा की कोई कमी नहीं हैं। बस हमे़ ही अपनी झोली में झांक कर यह देखना है कि कहीं उसमे़ छेद तो नही़ हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि ईश्वर अपने भक्तों के साथ किसी भी प्रकार का कोई भेदभाव नही़ करते है। वे तो हर वक्त अपने भक्तों पर कृपा बरसाते ही रहते है। बस हम ही अपनी अल्प बुध्दि के कारण उसे समझ नहीं पाते है।
परमात्मा को हम सच्चे साधु संतों का संग करके ही पा सकते है। चू़कि हमारे सच्चे साधु संत उस पारसमणि की तरह है जिसे लोहे पर रगडने से (इंसान का संपर्क होने पर) परमात्मा रूपी सोने के दर्शन होते हैं। मगर हम अपने अंहकार के कारण उन संतों के पास नहीं जाते हैं। हम अपने आपकों ही महान मानते है जो एक भम्र हैं।
ईश्वर को पाने के लिए अपने आपकों उनके चरणों में अर्पित करना होगा। सच्चे साधु संतों की यही पहचान है कि वे ज्ञानी, संयमी, सहनशील, धैर्यवान, विनम्र स्वभाव के व उनके चेहरे पर तेज होता हैं। अतः साधु-संतों, माता-पिता, गुरुजनों व अपने से बडों का कभी भी अनादर नहीं करना चाहिए। ईश्वर की कृपा तभी बरसती हैं जब हम अपना कर्म पूरी ईमानदारी व निष्ठा के साथ करें।
हमें अपने आदर्श संस्कारों व अपनी सभ्यता एवं संस्कृति को कभी भी नहीं भूलना चाहिए। आदर्श संस्कार हमें अपने परिवार से ही मिलते हैं न कि किसी बाजार में या गूगल से मिलते हैं।
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