
ओम प्रकाश उनियाल, स्वतंत्र पत्रकार
हिमालय बचाने की याद हमें केवल ‘हिमालय दिवस’ पर ही आती है। इस दिन रैलियां निकाल कर, चर्चाएं व गोष्ठियां कर यूं लगता है जैसे हम हिमालय को बचाने के लिए सचमुच समर्पित हैं। लेकिन महत्वपूर्ण सवाल तो यह है कि आज तक जो भी प्रयास हुए हैं वे कितने प्रभावी हुए हैं? यदि वास्तव में हमारे मन में हिमालय को बचाने की इच्छा है तो फिर इस मिशन में सबको एकजुट होकर कार्य करना चाहिए। हिमालय पर जिस प्रकार के खतरे मंडरा रहे हैं उनका परिणाम हम भुगत ही रहे हैं।
भूकंप, हिमखडों का टूटना, हिमालय का खिसकना, पिघलना, अति बर्फबारी जैसी आपदाएं हर साल घट रही हैं। वैसे तो हिमालयी क्षेत्र पर कुछ न कुछ घटता ही रहता है। इसी साल फरवरी माह में हिमालय ने उत्तराखंड के रैणी क्षेत्र में जो भयानक तबाही मचायी उससे भी हमने सबक नहीं लिया। हिमालयी राज्यों में जिस प्रकार से विकास का खाका खींचकर हिमालय का दोहन किया जा रहा है वह हिमालय को खोखला कर रहा है। हिमालय को सैरगाह बनाकर वहां पर जिस प्रकार से प्रदूषण फैलाया जाता है उससे समूचे हिमालय की आबोहवा दूषित हो रही है।
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हिमालय केवल एक बर्फ की पर्वत श्रृखंला नहीं अपितु अपार प्राकृतिक संपदा का भंडार होने के साथ-साथ देश की दुश्मनों से सुरक्षा करने वाला प्रहरी भी है। भारत का मुकुट है वह। तमाम सजीव व निर्जीव वस्तुओं को जीवन देने वाली प्रणाली है। इसीलिए इसको बचाने में सबकी भूमिका बराबर होनी चाहिए। हिमालयी राज्यों को इसके लिए धरातल पर कार्य करना होगा।
“मन में हिमालय को बचाने की इच्छा है तो सबको एकजुट होकर कार्य करना चाहिए”
हिमालयी क्षेत्र में वृक्षारोपण को बढ़ावा देना, ट्रैकिंग, पर्वतारोहण करने वालों द्वारा किसी प्रकार से वहां गंदगी फैलाने पर रोक लगाना जैसी पहल करनी होगी। तभी हिमालय बचेगा। प्राकृतिक तौर पर हिमालय पर जो हलचल समय-समय पर होती रहती है उसे पूरी तक तो रोक नहीं जा सकता। क्योंकि भू-गर्भीय परिवर्तन होना भी एक प्रक्रिया है। लेकिन इंसानी प्रयासों से कम जरूर किया जा सकता है।





