
सुनील कुमार माथुर
जीवन में सदा दया का भाव रखे । वहीं अंहकार से दूर रहें चूंकि अंहकार हमारा सबसे बडा शत्रु है । प्रायः हर किसी के मुख से यहीं सुनने को मिलता है कि क्या करे दु:ख पीछा ही नहीं छोडता है ।लेकिन जब हम सुख में होते है तब कभी भी भगवान से यह नहीं कहते हैं कि हे प्रभु ! मेरी झोली में एक साथ इतने सुख क्यों डाल दिये । दुख – सुख हमारे अपने ही कर्मों का फल है जिसे हमें स्वंय ही भोगने है किसी और को नहीं । अतः जहां तक हो सके जीवन में लोगों की भलाई करना सीखें न कि किसी को दुख देना ।
कहने का तात्पर्य यह है कि हर परिस्थिति में एक समान सोच रखें । हर वक्त अच्छे कार्य के लिए भगवान को धन्यवाद दे और कहे कि हे प्रभु ! आपकी वजह से हम यह सुखमय जीवन व्यतीत कर रहें हैं । जैसा आप फल बोओगे वैसा ही तो फल मिलेगा । अतः हर परिस्थितियों में समान रहे और ईश्वर को सुख में कभी भी न भूलें । उसे भूल जाने का अर्थ ही विपदा है । अतः दया का भाव रखकर जरुरतमंद लोगों की सेवा अवश्य करें ।
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जीव जन्तुओं के प्रति दया व करुणा का भाव रखे । उन्हें किसी भी प्रकार से न सताए । मूक पशु पक्षियों की सेवा करना सबसे बडी सेवा है । सेवा का भाव ही हमें अपनी मंजिल तक ले जाता है । अंहकार में आकर कोई भी निर्णय न लें । अंहकार हमारा सबसे बडा शत्रु है । जीवन में प्यार ही करनाज्ञहै तो हर वक्त ईश्वर से ही कीजिए । ईश्वर के प्रति सच्ची प्रार्थना यही है कि हम दुखीजन की निस्वार्थ भाव से सेवा करें.
जिनकी सोच सकारात्मक होती है उनके मन में सदैव अच्छे विचार आते हैं और वह उन पर अमल करके अपने पथ कि ओर अग्रसर होकर अपनी मंजिल हासिल करता है । बच्चों को सदैव कथा , भजन कीर्तन सुनने के लिए अपने साथ ले जाये । चूंकि सत्संग से ही कुसंगत का नाश होता हैं और व्यक्ति संस्कारवान व चरित्रवान बनता है।
¤ प्रकाशन परिचय ¤
![]() | From »सुनील कुमार माथुरस्वतंत्र लेखक व पत्रकारAddress »33, वर्धमान नगर, शोभावतो की ढाणी, खेमे का कुआ, पालरोड, जोधपुर (राजस्थान)Publisher »देवभूमि समाचार, देहरादून (उत्तराखण्ड) |
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