
राजेश ध्यानी सागर
चांदनी सो गयीं
चांद के साथ।
सूरज फंस गया आग में,
मन तो शांत हो गया
तन में आग लग गयीं।
तू समय कैंसा
कभी दिखता हें
कभीं छुप जाता हैं
चाहता हूं
समय सामने आजा
देख मैं शांत होकर जल रहा हूं।
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क्या धुआं तुझें
नजर आता नहीं,
थोड़ी खुशबूं ले ले इसकी।
सांसों में समेट तो सहीं
मैं हूं इसमे,
तू शान्त है
मैं जल रहा हूं
तेरी शीतलता को
तरस रहा हूं
¤ प्रकाशन परिचय ¤
![]() | From »राजेश ध्यानी “सागर”वरिष्ठ पत्रकार, कवि एवं लेखकAddress »144, लूनिया मोहल्ला, देहरादून (उत्तराखण्ड) | सचलभाष एवं व्हाट्सअप : 9837734449Publisher »देवभूमि समाचार, देहरादून (उत्तराखण्ड) |
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