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रेशमी धागों में उलझी उजाले में निश्छल प्रेम का यह अनंतिम जो बना रहा प्रण रेत पर बहती नदी का किनारा किसकी देह से सुरभित बना है। किरणों ने हंसकर # राजीव कुमार झा
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प्रेम की सुरभि से
सराबोर होता
सबका सहज मन
धूप की
गुनगुनाहट में
बारिश से पहले
फुहारों की भीगी
महक से
जिंदगी मानो
रेशमी धागों में
उलझी
उजाले में
निश्छल प्रेम का
यह अनंतिम
जो बना रहा प्रण
रेत पर बहती
नदी का किनारा
किसकी देह से
सुरभित बना है।
किरणों ने हंसकर
कहा है
सुबह बाग बगीचों से
गुजरते रास्ते पर
जाना
चैत में जीवन का
गीत धूप के
आने पर गाना
धूप में हवा को
बुलाना








