
यह आलेख जिम्मेदारी के महत्व, कर्तव्यनिष्ठा और आत्मबोध पर केंद्रित है। लेखक जीवन में जिम्मेदारी निभाने, आंतरिक शुद्धि और नैतिक मूल्यों को अपनाने को सच्ची सफलता और ईश्वर अनुभूति का मार्ग मानते हैं।
- जिम्मेदारी से ही मिलती है जीवन को दिशा
- कर्तव्य निभाने से महानता का मार्ग
- परमात्मा की अनुभूति और आत्मशुद्धि
- भीतर की शुद्धि से सच्चा जीवन सौंदर्य
सुनील कुमार माथुर
कहते हैं कि ज़िम्मेदारी वह पिंजरा है, जहाँ इंसान आज़ाद होकर भी क़ैद है। जो व्यक्ति जिम्मेदारी से अपने कर्तव्यों का पालन करता है, वही महान कहलाता है। इसलिए हमें अपनी जिम्मेदारियों से कभी भी मुँह नहीं मोड़ना चाहिए, अपितु पूरी ईमानदारी व निष्ठा से उन्हें निभाना चाहिए। जो लोग जिम्मेदारी से मुँह मोड़ते हैं, वे जीवन में कभी भी सफल नहीं होते हैं। जिम्मेदारी ही हमें सफलता की सीढ़ियों की ओर ले जाती है। वैसे भी देखा जाता है कि ज़िम्मेदारी उन्हीं लोगों को सौंपी जाती है, जिनमें कुछ कर गुजरने का जज़्बा हो। अतः जीवन में अपने को सौंपी गई जिम्मेदारी को निभाने का हर संभव प्रयास करें।
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ज्ञानी लोग कहते हैं कि “परमात्मा” शब्द नहीं है, जो तुम्हें पुस्तक में मिलेगा। “परमात्मा” मूर्ति नहीं है, जो तुम्हें मंदिर में मिलेगी। “परमात्मा” मनुष्य नहीं है, जो तुम्हें समाज में मिलेगा। “परमात्मा” जीवन है, जो तुम्हें अपने भीतर मिलेगा। कहने का तात्पर्य यह है कि परमात्मा हमारे भीतर ही है, लेकिन हम उसे महसूस नहीं कर पा रहे हैं, क्योंकि हमारे मन में विकारों का कूड़ा-कचरा भरा पड़ा है। जब तक हम बुराइयों से मुक्त नहीं होंगे, तब तक मन गंगा की तरह पवित्र नहीं हो सकता। हम रात-दिन दूसरों की चुगली करते फिरते हैं, राग-द्वेष रखते हैं, अहंकार के नशे में डूबे रहते हैं। भला ऐसे में कैसे परमात्मा के दर्शन कर पाएँगे।
जीवन अनमोल है। इसे बाहर से सँवारने की ज़रूरत नहीं है, अपितु भीतर से सँवारें। सभी के साथ मैत्री भाव रखें। अपने से बड़ों का, सच्चे साधु-संतों का, अपने माता-पिता व गुरुजनों का सदैव सम्मान करें। उनका कभी भी अनादर न करें, क्योंकि वे हमारे सच्चे मार्गदर्शक होते हैं।
सुनील कुमार माथुर
सदस्य, अणुव्रत लेखक मंच
39/4, पीडब्ल्यूडी कॉलोनी, जोधपुर, राजस्थान






