
पन्तनगर। विश्व बांस दिवस के अवसर पर पन्तनगर विश्वविद्यालय में बांस विशेषज्ञ रमेश चौहान और पवन दूबे द्वारा बांस का पौधा रोपित किया गया। बांस को हरा सोना अर्थात ग्रीन गोल्ड कहा जाता है क्योंकि इसका महत्व केवल पर्यावरणीय दृष्टि से ही नहीं, बल्कि आर्थिक और सामाजिक दृष्टि से भी अत्यधिक है। इस अवसर पर किसानों को बांस की उपयोगिता के बारे में जानकारी दी गई। पवन दूबे ने बताया कि पर्वतीय क्षेत्रों में यदि बांस का रोपण बड़े पैमाने पर किया जाए तो भूस्खलन जैसी गंभीर समस्या से निजात पाया जा सकता है।
हाल में ही जो आपदा में हालात हुए उससे बचाव का भी बेहतर विकल्प हो सकता है। बताया कि बांस की जड़ें भूमि को मजबूती प्रदान करती हैं, जिसके कारण मिट्टी का कटाव कम होता है। इसी कारण नदी किनारे की भूमि के कटाव को रोकने में भी बांस अत्यंत कारगर सिद्ध होता है। खेती-बाड़ी की दृष्टि से भी बांस के कई फायदे हैं। जानवरों से फसलों की सुरक्षा के लिए खेतों की बाड़ बनाने में कांटा बांस सबसे उत्तम विकल्प माना जाता है। इससे न केवल खेत सुरक्षित रहते हैं बल्कि यह दीर्घकालीन समाधान भी उपलब्ध कराता है।
किसानों की आर्थिक स्थिति सुधारने के लिए बांस का महत्व और भी बढ़ जाता है। रमेश चौहान ने बताया कि बांस की खेती को बड़े पैमाने पर अपनाकर किसान अपनी आय को दोगुना करने की दिशा में ठोस कदम उठा सकते हैं। बांस से फर्नीचर, कागज, झाड़ू, टोकरी और विभिन्न हस्तशिल्प उत्पाद तैयार किए जाते हैं, जिनकी बाजार में भारी मांग रहती है। इस कारण कृषि के साथ-साथ ग्रामीण कुटीर उद्योगों और स्वरोज़गार को भी बढ़ावा मिलता है।
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रमेश चौहान और पवन दूबे, जोकि पन्तनगर विश्वविद्यालय के कृषिवानिकी अनुसंधान केन्द्र में कार्यरत हैं, ने किसानों से अपील की कि वे बांस को केवल सजावटी या वनों तक सीमित न मानकर इसे अपनी आजीविका सुधारने का मजबूत साधन बनाएं। उन्होंने कहा कि बांस का पौधा पर्यावरण संरक्षण, मिट्टी और जल संरक्षण के साथ-साथ किसानों की समृद्धि का भी आधार बन सकता है। बांस की खेती और उससे जुड़ी किसी भी विस्तृत जानकारी हेतु किसान सीधे कृषिवानिकी अनुसंधान केन्द्र, पन्तनगर के विशेषज्ञों से संपर्क कर सकते हैं।





