
श्रद्धांजलि के शब्द पुष्प, हो पितातुल्य, मार्ग के दर्शक,जो हमारे l हम सबके दिलों में हो, चमकते से सितारेll करती हूँ समर्पित, ये शब्द, हृदय पटल से l लाई हूँ संजो, ये सुमन, श्रद्धा से प्रेम से ll अंतर से प्रसफुटित हुए, ये शब्द पुष्प से l श्रद्धा के पुष्प लाई हूँ परिपूर्ण प्रीति से ll #सत्यवती आचार्य, चंडीगढ़
श्रद्धा के पुष्प लाई हूँ, परिपूर्ण प्रीति से l
अंतर से प्रस्फुटित हुए ये शब्द-पुष्प से ll
मिलने की थी जो चाह, वह हृदय में रह गईl
बाकायदा विफल, हर युक्ति थी हुई ll
ये भाव के हैं फूल, मैं लाई हूँ पिरो के l
अर्पित हैं तुम्हें, लाई हूँ, धो-धो के अश्रु से ll
साहित्य का वह प्रेम, दूरदर्शिता तेरी l
आत्मीयता तेरी, अनंतता को छू गईll
हालाँकि पथ हमारा, कुछ अलग-अलग ही था l
साहित्य की यह डोर, हमें साथ ले चली ll
‘अभिव्यक्ति’ की इस डोर को, चलेंगे ले के साथ l
साहित्य के इस मार्ग, निरंतर ‘विजय’के साथ ll
हो पितातुल्य, मार्ग के दर्शक,जो हमारे l
हम सबके दिलों में हो, चमकते से सितारेll
करती हूँ समर्पित, ये शब्द, हृदय पटल से l
लाई हूँ संजो, ये सुमन, श्रद्धा से प्रेम से ll
अंतर से प्रसफुटित हुए, ये शब्द पुष्प से l
श्रद्धा के पुष्प लाई हूँ परिपूर्ण प्रीति से ll
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