
🌟🌟🌟
उत्तराखंड में बाघ, गुलदार, भालू, हाथी सहित अन्य वन्यजीवों के बढ़ते हमलों से आमजन भय के साए में जीने को मजबूर हैं। मानव-वन्यजीव संघर्ष अब एक गंभीर सामाजिक और प्रशासनिक चुनौती बन चुका है, जिससे निपटने के लिए सरकार ने कई कदम उठाने की घोषणा की है।
- पहाड़ से मैदान तक बढ़ता मानव-वन्यजीव संघर्ष
- बाघ, गुलदार और हाथी के हमलों से दहशत में लोग
- खेती और मवेशियों पर वन्यजीवों का बढ़ता खतरा
- वन्यजीव संरक्षण और मानव सुरक्षा के बीच चुनौती
ओम प्रकाश उनियाल
उत्तराखंड में कहीं बाघ, गुलदार, भालू और हाथी के इंसानों पर हमले हो रहे हैं तो कहीं बंदरों, सूअरों और लंगूरों का उत्पात लोगों के लिए बड़ी परेशानी बन गया है। ये घटनाएं राज्य में आए दिन घट रही हैं। जंगली जानवरों की दहशत इतनी बढ़ चुकी है कि कई क्षेत्रों में लोग दिन में भी घर से बाहर निकलने में डर महसूस कर रहे हैं। हर समय यह आशंका बनी रहती है कि न जाने कब कौन-सा जंगली जानवर अचानक हमला कर दे। ऐसी स्थिति में भय का माहौल बनना स्वाभाविक है।
हालांकि मानव-वन्यजीव संघर्ष कोई नई समस्या नहीं है, लेकिन अब यह संघर्ष इस हद तक बढ़ चुका है कि इससे पूरी तरह छुटकारा पाना लगभग असंभव-सा प्रतीत होता है। पहाड़ी इलाकों में बाघ, गुलदार, भालू, सूअर, बंदर और लंगूर की संख्या अधिक है, जबकि राज्य के मैदानी क्षेत्रों में इनके साथ-साथ हाथियों की समस्या भी बनी हुई है। बाघ, गुलदार, भालू और हाथी इंसानों पर जानलेवा हमले कर रहे हैं, वहीं बाघ और गुलदार जैसे जानवर आदमखोर भी बनते जा रहे हैं।
मवेशियों को मारना इनके लिए आसान होता जा रहा है। दूसरी ओर बंदर, लंगूर, सूअर और हाथी खेती को भारी नुकसान पहुंचा रहे हैं, जिससे किसानों की आजीविका पर सीधा असर पड़ रहा है। एक तरफ लोग यह सवाल उठा रहे हैं कि आखिर जंगली जानवरों की आबादी लगातार कैसे बढ़ रही है। सरकार से बार-बार यह मांग भी की जा रही है कि खूंखार और आदमखोर जानवरों को मारा जाए। दूसरी तरफ वन्यजीवों को वन-संपदा का अहम हिस्सा माना जाता है और वन्यजीव संरक्षण अधिनियम का पालन करना भी अनिवार्य है।
प्रकृति का संतुलन बनाए रखने में वन्यजीवों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। ऐसे में मानव और वन्यजीवों के बीच बढ़ते संघर्ष पर नियंत्रण पाना बेहद आवश्यक हो गया है। राज्य सरकार ने इस चुनौती से निपटने की घोषणा तो की है, लेकिन देखना यह है कि इन घोषणाओं पर अमल कितना प्रभावी होता है। राज्य में मानव-वन्यजीव संघर्ष की गंभीरता को देखते हुए मुख्यमंत्री श्री पुष्कर सिंह धामी ने इस समस्या से निपटने के लिए कई महत्वपूर्ण कदम उठाने की घोषणा की है।
इसके तहत सोलर फेंसिंग और सेंसर आधारित अलर्ट सिस्टम स्थापित करने, आधुनिक वन्यजीव बंध्याकरण (नसबंदी) केंद्र और जिलों में रिहैबिलिटेशन सेंटर खोलने की योजना बनाई गई है। इसके साथ ही वन विभाग को जाल, पिंजरा, ट्रैंक्विलाइजेशन गन जैसे संसाधन उपलब्ध कराने के लिए ₹5 करोड़ की अतिरिक्त धनराशि की व्यवस्था की गई है। वन्यजीव अधिनियम के सुसंगत प्रावधानों के तहत हिंसक जीवों को नियंत्रित करने के लिए अधिकारों के विकेंद्रीकरण की बात भी कही गई है, जिससे रेंजर स्तर के अधिकारियों को अधिक सशक्त बनाया जा सके।







