
प्रेम बजाज
कानून का विस्तार हुआ है लेकिन कानून आज भी सभी प्रकार के रिश्तों को एक समान सुरक्षा या अधिकार नहीं देता और ना ही एक स्तर की प्राथमिकता। लेकिन हमारी अपनी सोच क्या है?? क्यों हम विवाह को इसलिए सिरियस टापिक मानते हैं क्योंकि ये कानून कहता है, और अन्य रिश्तों को इसलिए सिरियस नहीं मानते क्योंकि कानून ऐसा कहता है, लेकिन हमें अपने अन्दर से क्या महत्वपूर्ण लगता है, कानून समाज और लोगों की सोच के साथ ही बदलता है।
क्या हम स्वयं को परखते हैं? क्या हम आज भी लव मैरिज या इंटरकास्ट मैरिज को स्वीकार करते हैं? नहीं! यदि लव मैरिज या इंटरकास्ट मैरिज को स्वीकार करते तो इस तरह कोर्ट मैरिज में लगातार इजाफा ना हुआ होता। लव मैरिज+अरेंज मैरिज, अर्थात मां-बाप सहमत हैं। लव-मैरिज+कोर्ट मैरिज, अर्थात मां-बाप सहमत नहीं। कोर्ट मैरिज करने वालों की संख्या में लगातार इजाफा हो रहा है। कारण???
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इंटरकास्ट मैरिज जिसमें माता-पिता की असहमति, या कभी पैसे की दीवार, तो कभी विचारों में मतभेद, जिसकी वजह से दो प्रेमी कोर्ट मैरिज करने को मजबूर हो जाते हैं। प्यार जात-पात या ओहदा नहीं देखता, प्यार तो केवल प्यार को पहचानता है। लेकिन ज्यादातर माता-पिता समाज की इन खोखली बातों से डर कर बच्चों का साथ नहीं देते तब मजबूरन बच्चों को ये रास्ता चुनना पड़ता है।
जबकि विवाह अधिनियम 1954 के अन्तर्गत भारत के संविधान ने सभी को हक दिया है वो अपनी पसंद की लड़की या लड़के से शादी कर सकते हैं
कोर्ट मैरिज एक विशेष विवाह अधिनियम ( special merriage act) के तहत विवाह होता है जिसमें कोई समारोह नहीं होता, केवल सरकारी अधिकारी और दुल्हा-दुल्हन एक डाक्यूमेंट पर हस्ताक्षर करके प्रक्रिया पूरी करते हैं। पहले शादी के लिए आवेदन किया जाता है, जिसमें 30 दिन का समय होता है, इस अवधि में एल आई यू और संबंधित थाने में रिपोर्ट की जाती है। लड़के की उम्र 21 और लड़की की 18 से कम तो नहीं, कोई पहले से शादीशुदा ना हो, लड़का-लड़की दोनों पक्षों की रज़ामंदी होनी चाहिए।
यदि दोनों में से कोई पहले से शादीशुदा हो तो या उसका तलाक होना चाहिए या उसके पति या पत्नी का देहांत हो गया हो, दोनों में से एक स्थायी निवासी हैं या नहीं, उस पर तीन गवाहो की भी गवाही दी जाती है, विवाह के लिए आने वाले हर आवेदन की पूरी जांच कराई जाती है, पूर्ण रूप से संतुष्टि होने के बाद ही शादी का सर्टिफिकेट जारी किया जाता है। सोचिए क्या कोर्ट आंखें मूंद कर हर किसी को शादी की इज़ाजत दे देता है? नहीं!
अगर आवेदनकर्ता कोर्ट की हर शर्त पर खरा नहीं उतरता तो आवेदन खारिज भी किया जाता है। लेकिन कोर्ट मैरिज की नौबत ही क्यों आए, अगर माता-पिता बच्चों की भावनाओं को समझे, और बच्चे भी माता-पिता को समझें। जहां बेटा या बेटी कुछ ग़लत फैसला लेते हैं उन्हें समझाएं, क्या सही हे क्या ग़लत उन्हें बताएं। बच्चों के साथ दोस्ताना व्यवहार रखें,और अगर वो सही है अपनी पसंद से जीवन साथी चुनते हैं तो उनका साथ दे। बच्चों को भी चाहिए कि माता-पिता से कुछ ना छिपाए, उन्हें अपना दोस्त समझे और हर बात उनसे साझा करें।
यदि हर माता-पिता और बच्चे अपनी सोच को एक-दूसरे पर ना थोप कर एक-दूसरे के साथ कदम से कदम मिलाकर चले तो अवश्य ही माता-पिता के विरुद्ध जाकर कोर्ट मैरिज करने का नाम खत्म हो जाएगा।







