
देहरादून में आध्यात्मिक गुरु देवकीनंदन ठाकुर ने वक्फ बोर्ड की तर्ज पर सनातन बोर्ड बनाने की मांग उठाई। उन्होंने तीर्थ क्षेत्रों में गैर सनातनी प्रवेश पर रोक और मंदिरों की सुरक्षा को लेकर समान नियम लागू करने की बात कही। साथ ही गुरुकुल व्यवस्था, धार्मिक मूल्यों और सामाजिक संतुलन पर जोर दिया।
- देवकीनंदन ठाकुर बोले- हर तीर्थ क्षेत्र में लागू हो समान नियम
- ‘मक्का-मदीना उदाहरण’, तीर्थों की सुरक्षा पर उठी नई बहस
- गुरुकुल और सनातन उत्थान के लिए बोर्ड गठन की मांग
- मंदिरों की सुरक्षा और व्यवस्था पर देवकीनंदन ठाकुर का बयान
देहरादून: प्रसिद्ध कथावाचक और आध्यात्मिक गुरु देवकीनंदन ठाकुर महाराज ने देश में धार्मिक व्यवस्थाओं को लेकर बड़ा बयान देते हुए वक्फ बोर्ड की तर्ज पर ‘सनातन बोर्ड’ के गठन की मांग उठाई है। उन्होंने कहा कि यदि देश में वक्फ बोर्ड अस्तित्व में है तो सनातन धर्म के संरक्षण और उत्थान के लिए भी एक सशक्त बोर्ड का गठन होना चाहिए। इससे न केवल धार्मिक संरचनाओं को मजबूती मिलेगी बल्कि गुरुकुल व्यवस्था को बढ़ावा देकर रोजगार के नए अवसर भी पैदा किए जा सकते हैं।
एक विशेष बातचीत के दौरान उन्होंने चारधाम सहित देश के अन्य प्रमुख तीर्थ क्षेत्रों में गैर सनातनी लोगों के प्रवेश को लेकर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि जब मक्का और मदीना जैसे धार्मिक स्थलों पर अन्य धर्मों के लोगों के प्रवेश पर प्रतिबंध है, तो भारत के प्रमुख तीर्थ स्थलों—जैसे मथुरा और अयोध्या—में भी इस तरह के नियम लागू करने पर विचार किया जाना चाहिए। उनके अनुसार यह मांग किसी धर्म विशेष के विरोध में नहीं बल्कि तीर्थ स्थलों की गरिमा और सुरक्षा बनाए रखने के लिए है।
देवकीनंदन ठाकुर ने तीर्थ क्षेत्रों में बढ़ती चोरी और अन्य आपराधिक घटनाओं पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि मंदिरों और श्रद्धालुओं की सुरक्षा सुनिश्चित करना समय की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि अपनी बहन-बेटियों की सुरक्षा की बात करना अधर्म नहीं है, बल्कि यह सामाजिक जिम्मेदारी का हिस्सा है। उनका मानना है कि मंदिरों की आय पर सरकार का नियंत्रण नहीं होना चाहिए, बल्कि इसके लिए एक स्वतंत्र बोर्ड बनाकर उस धन का उपयोग धार्मिक और सामाजिक उत्थान में किया जाना चाहिए।
उन्होंने शिक्षा व्यवस्था पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि आज देश में बड़ी संख्या में मदरसे मौजूद हैं, लेकिन गुरुकुलों की संख्या बहुत कम है। यदि सनातन बोर्ड का गठन होता है तो गुरुकुल प्रणाली को पुनर्जीवित कर नई पीढ़ी को धार्मिक और नैतिक शिक्षा दी जा सकती है। उन्होंने विज्ञान और अध्यात्म के संतुलन पर जोर देते हुए कहा कि विज्ञान ने समाज को बहुत कुछ दिया है, लेकिन ईश्वर के अस्तित्व और आध्यात्मिक मूल्यों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। धार्मिकता की परिभाषा पर बात करते हुए उन्होंने कहा कि केवल तिलक लगाना या मंदिर जाना ही धर्म नहीं है, बल्कि धार्मिक ग्रंथों और मूल्यों को अपने जीवन में उतारना ही सच्ची धार्मिकता है।
उन्होंने समाज में बढ़ती असहिष्णुता पर चिंता जताते हुए कहा कि परिवारों में रामायण जैसे ग्रंथों का स्थान होना चाहिए, जिससे पारिवारिक मूल्यों को मजबूती मिले। परिवार और सामाजिक रिश्तों पर टिप्पणी करते हुए उन्होंने कहा कि बेटियां घर की जिम्मेदारी जरूर निभाती हैं, लेकिन उन्हें नौकरानी समझना गलत है। पति और परिवार का दायित्व है कि महिला का सम्मान हर स्थिति में बना रहे। उन्होंने राम और सीता के उदाहरण देते हुए कहा कि आदर्श परिवार वही होता है जहां सम्मान, त्याग और मर्यादा का पालन किया जाता है।





