
स्वामी आनंद स्वरूप ने सार्वजनिक तौर पर स्वघोषित शंकराचार्य जगदगुरू रामभद्राचार्य पर विवादित टिप्पणी की है। उनके अनुसार, रामभद्राचार्य किसी वैध पीठ या गुरु द्वारा जगदगुरू नहीं बनाए गए हैं। स्वामी आनंद स्वरूप ने कहा कि रामभद्राचार्य स्वयं पीठ बनाकर स्वयं आचार्य बने हैं और शास्त्रों के अनुसार ऐसा संभव नहीं है।
- स्वामी आनंद स्वरूप का विवादित दावा: स्वघोषित शंकराचार्य रामभद्राचार्य भाजपा के एजेंट
- रामभद्राचार्य पर सवाल उठाया, स्वामी आनंद स्वरूप बोले – स्वयं बनाई पीठ और खुद बने आचार्य
- धार्मिक विवाद: स्वामी आनंद स्वरूप ने कहा – रामभद्राचार्य शास्त्रों के अनुसार नहीं हैं जगदगुरू
- स्वामी आनंद स्वरूप ने उठाए गंभीर आरोप, रामभद्राचार्य पर राजनीति और धर्म से जुड़े सवाल
देहरादून। धार्मिक और सांस्कृतिक क्षेत्रों में लंबे समय से विवादों में रहने वाले स्वघोषित शंकराचार्य जगदगुरू रामभद्राचार्य को लेकर स्वामी आनंद स्वरूप ने कड़ा बयान दिया है। उन्होंने कहा कि रामभद्राचार्य भाजपा के एजेंट/दला** के रूप में कार्य कर सकते हैं। स्वामी आनंद स्वरूप ने इस संदर्भ में स्पष्ट किया कि यह उनके व्यक्तिगत और धार्मिक दृष्टिकोण पर आधारित आरोप हैं, जिन्हें उन्होंने सार्वजनिक रूप से रखा है। स्वामी आनंद स्वरूप ने आगे कहा कि रामभद्राचार्य ने स्वयं अपनी पीठ स्थापित की और स्वयं को आचार्य घोषित कर लिया, जबकि शास्त्रों और धार्मिक परंपराओं के अनुसार आचार्य का चयन सर्वांगसम्पन्न, योग्य और पारंपरिक गुरु द्वारा होना आवश्यक है।
उन्होंने सवाल उठाया कि यदि किसी व्यक्ति की दृष्टि और अनुभव सीमित हैं, तो वह दूसरों को सही मार्ग कैसे दिखा सकता है। स्वामी आनंद स्वरूप ने तुलसी पीठ का भी उल्लेख किया। उनके अनुसार, रामभद्राचार्य जिस तुलसी पीठ का हवाला देते हैं, वह उनकी स्वयं निर्मित पीठ है, न कि किसी पारंपरिक या मान्यता प्राप्त पीठ का हिस्सा। उन्होंने कहा कि शास्त्रों में स्पष्ट रूप से यह नियम है कि आचार्य को पूर्ण योग्यता और अनुभव के साथ ही नियुक्त किया जाना चाहिए, और यह केवल किसी व्यक्ति के स्वघोषण से संभव नहीं है।
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इसके साथ ही उन्होंने धर्म और राजनीति दोनों ही क्षेत्रों को जोड़ते हुए कहा कि ऐसे मामलों में पारंपरिक नियमों और धार्मिक शास्त्रों का पालन न होना गंभीर चिंता का विषय है। स्वामी आनंद स्वरूप ने यह भी कहा कि धर्म और राजनीति का इस्तेमाल करते हुए समाज में भ्रम फैलाना और स्वयं को प्रतिष्ठित पद पर प्रस्तुत करना अनुचित है। स्वामी आनंद स्वरूप का यह बयान उन विवादों में एक नया मोड़ जोड़ता है जो लंबे समय से धार्मिक संगठनों और राजनीतिक सन्दर्भों में चल रहे हैं।
उन्होंने यह भी कहा कि धर्म के नाम पर समाज को दिशा देने वाले व्यक्तियों के लिए पारंपरिक और शास्त्रीय योग्यता का होना अनिवार्य है, ताकि उनके मार्गदर्शन से समाज में सही ज्ञान और आध्यात्मिक अनुशासन स्थापित हो सके। इस बयान के बाद धार्मिक और राजनीतिक हलकों में चर्चा शुरू हो गई है। कई विशेषज्ञों का कहना है कि इस प्रकार के आरोप न केवल धार्मिक क्षेत्र में बल्कि राजनीतिक मंच पर भी सवाल खड़े करते हैं। वहीं कुछ लोग इसे धार्मिक अनुशासन और पारंपरिक नियमों की रक्षा के लिए एक आवश्यक आलोचना मान रहे हैं।
स्वामी आनंद स्वरूप के इस बयान ने स्पष्ट किया कि धार्मिक और आध्यात्मिक नेतृत्व में पारंपरिक योग्यता, अनुभव और शास्त्रीय नियमों का पालन होना अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने यह भी संदेश दिया कि धर्म और राजनीति दोनों क्षेत्रों में पारदर्शिता और नैतिक जिम्मेदारी का पालन करना समाज की बेहतरी के लिए जरूरी है।








