
देहरादून के बंजारावाला में आयोजित विराट हिन्दू सम्मेलन में जीवन में संस्कार और राष्ट्र के प्रति समर्पण भाव अपनाने पर जोर दिया गया। वक्ताओं ने कहा कि आज की पीढ़ी को सही मार्गदर्शन देना समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है। सम्मेलन में व्यक्तिगत आचरण से समाज को प्रेरणा देने का संदेश दिया गया।
- वक्ताओं ने कहा—संस्कारों की विरासत अगली पीढ़ी तक पहुंचाना जरूरी
- समाज और राष्ट्र के प्रति समर्पण से ही संभव है प्रगति
- प्रेरणास्त्रोत बनने का आह्वान, व्यक्तिगत जीवन से समाज को दिशा देने की बात
- राष्ट्र को सर्वोपरि मानकर कार्य करने पर दिया गया संदेश
ओ.पी. उनियाल
देहरादून। देहरादून के बंजारावाला क्षेत्र में विराट हिन्दू सम्मेलन का आयोजन किया गया, जिसमें समाज, संस्कार और राष्ट्र के प्रति कर्तव्यों पर गहन विचार-विमर्श हुआ। सम्मेलन में उपस्थित वक्ताओं ने कहा कि इस प्रकार के आयोजनों का मुख्य उद्देश्य आज की युवा पीढ़ी को सही मार्ग पर लाना और उन्हें जीवन के मूल्यों से जोड़ना है।
Government Advertisement...
वक्ताओं ने चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि हमें यह आत्ममंथन करने की आवश्यकता है कि जो संस्कार हमें अपने बुजुर्गों और पूर्वजों से प्राप्त हुए हैं, क्या हम वही संस्कार अपनी आने वाली पीढ़ी को दे पा रहे हैं। यदि समाज को मजबूत बनाना है तो संस्कारों की यह श्रृंखला निरंतर बनी रहनी चाहिए।
सम्मेलन में राष्ट्रभक्ति और समर्पण भाव पर विशेष जोर दिया गया। वक्ताओं ने कहा कि हमें यह समझना होगा कि जो कुछ भी हमें समाज से मिला है, वह केवल व्यक्तिगत नहीं बल्कि राष्ट्र और धरती की अमानत है। व्यक्ति का कर्तव्य है कि वह अपने विचारों, कर्मों और समर्पण के माध्यम से समाज और राष्ट्र के लिए योगदान दे।
उन्होंने कहा कि जब व्यक्ति का समर्पण भाव चरम पर पहुंचता है, तभी समाज उन्नति करता है। हमें ऐसे कार्य करने चाहिए जिनसे समाज प्रेरणा ले सके और हम स्वयं प्रेरणास्त्रोत बनें। व्यक्तिगत जीवन में नैतिकता, अनुशासन और संस्कारों को अपनाकर ही इन मूल्यों को समाज तक प्रभावी ढंग से पहुंचाया जा सकता है।
वक्ताओं ने आह्वान किया कि प्रत्येक नागरिक को अपने निजी जीवन के साथ-साथ सामाजिक और राष्ट्रीय जिम्मेदारियों को भी समझना चाहिए। तभी एक सशक्त, संस्कारित और राष्ट्रनिष्ठ समाज का निर्माण संभव है।





