
राज शेखर भट्ट
उत्तराखण्ड का खान-पान केवल भोजन भर नहीं, बल्कि एक ऐसी सांस्कृतिक धरोहर है जो सदियों से पर्वतीय जीवन, प्रकृति, मौसम और स्थानीय आवश्यकताओं के अनुसार विकसित हुई है। हिमालय की शांत वादियों में बसे गांवों में तैयार होने वाले सरल, सादे, पौष्टिक और स्वादिष्ट व्यंजन आज भी अपनी पारंपरिक शैली और प्राकृतिक स्वाद के कारण विशेष माने जाते हैं। यह भोजन न केवल शरीर को मजबूती देता है, बल्कि पहाड़ के कठिन जीवन, ठंडे वातावरण और मेहनत-भरे दिनचर्या के अनुरूप बनाया गया है। उत्तराखण्ड का खान-पान कुमाऊँ और गढ़वाल—दोनों क्षेत्रों में थोड़ा भिन्न दिखाई देता है, लेकिन दोनों की जड़ें एक ही सांस्कृतिक धरातल पर आधारित हैं।
पहाड़ों में भोजन का मूल आधार है—स्थानीय अनाज, दालें, पहाड़ी सब्ज़ियाँ, जंगली फल, हर्बल मसाले और दूध-दही से बनने वाले पदार्थ। यहां के भोजन में तेल-घी का अत्यधिक उपयोग नहीं होता, फिर भी यह अत्यंत पोषक और स्वाद में बेजोड़ होता है। पारंपरिक धूप में सुखाई गई सब्ज़ियाँ, जंगली कंद-मूल, दालों से बने व्यंजन और पहाड़ी मसालों की हल्की सुगंध भोजन को बिल्कुल अलग पहचान देते हैं। गढ़वाल और कुमाऊँ में दाल और अनाज का बहुत महत्व है। कढ़ी-जैसा ‘झोली’, भट की दाल, गहत (कुल्थ) का रस, मास (मांस), भरूली (हरी सब्ज़ियाँ), और फाणु जैसे व्यंजन दैनिक भोजन का हिस्सा हैं। ठंडे मौसम में शरीर को गर्म रखने के लिए गहत की दाल, चैंसू और मंडवे का रोटी विशेष रूप से उपयोगी मानी जाती है। कुमाऊँ में बनता भट का दुगुला और गढ़वाल का फाणु हल्के मसालों के साथ पकाया जाता है, जिसमें पहाड़ी घी की खुशबू स्वाद बढ़ा देती है।
उत्तराखण्ड के पर्वतीय क्षेत्रों में झंगोरा (बाजरा जैसे अनाज) बहुत लोकप्रिय है। झंगोरे की खीर अपने स्वाद और पौष्टिकता के कारण आज पूरे देश में प्रसिद्ध हो चुकी है। वहीं मंदुए का आटा (रागी) कैल्शियम का बड़ा स्रोत है, जो पहाड़ी लोगों की हड्डियों को मज़बूती देता है। पहाड़ की ठंड में गर्माहट प्रदान करने वाला गहत का रस, मूली का थेचुआ, पकौड़ी के साथ झंगोरा, सिसुणे की सब्ज़ी (बिच्छू घास) और काफल जैसे जंगली फल भोजन को प्राकृतिक और स्वास्थ्यवर्धक बनाते हैं। मिठाइयों की बात करें तो उत्तराखण्ड की अपनी विशिष्ट पहचान वाली मिठाइयाँ हैं जैसे—गुलगुला, अरसा, बाड़ी, जलेबी, और सिंगोरी। खासकर सिंगोरी, जो माल्टा या मालू के पत्ते में लपेटकर बनाई जाती है, कुमाऊँ की प्रसिद्ध मिठाई है और इसकी ख्याति पूरे देश में है। गढ़वाल की दहीं-चावल आधारित डिश ज्योंती, और मेले-त्योहारों में बनने वाला अरसा पर्वतीय मिठास की अद्भुत परंपरा है।
उत्तराखण्ड का खान-पान केवल स्वाद तक सीमित नहीं, बल्कि यहाँ की सामाजिक संरचना और रीति-रिवाजों में भी रचा-बसा है। शादी-ब्याह, त्यौहार और धार्मिक अनुष्ठानों में विशेष व्यंजन बनाए जाते हैं—जैसे काफल की चटनी, बाड़ा, पुरी-भाजी, झोली-भात, खीर, गुलगुला। गांवों की बुग्यालों पर चरने वाली गायों और भैंसों के दूध से बनने वाले घी, दही, छाछ और चैंस का स्वाद किसी भी औद्योगिक उत्पाद से कई गुना बेहतर होता है। उत्तराखण्ड के खान-पान में जड़ी-बूटियों का उपयोग भी एक प्रमुख विशेषता है। पहाड़ में उगने वाली गुलगुल, बुरांश, माल्टा, गिंडौर, मुन्ना, तिमूर (सिचुआन पेपर), जखिया, भंग के बीज (हनप) जैसे प्राकृतिक मसाले भोजन को एक विशिष्ट स्वाद देते हैं। बुरांश का शरबत और माल्टा का रस स्वास्थ्यवर्धक पेयों के रूप में प्रसिद्ध हैं। बुरांश फूलों से तैयार होने वाला रस एंटीऑक्सीडेंट्स से भरपूर होता है और हृदय के लिए लाभकारी माना जाता है।
इसके अलावा, पहाड़ का भोजन मौसम के अनुसार बदलता रहता है। सर्दियों में अधिकतर लोग झोली-भात, गहत, कुल्थ, चैंसू, मांस, और घी आधारित व्यंजन लेते हैं, जबकि गर्मियों में हल्की और ताज़गी देने वाली चीज़ें जैसे भट्ट की दाल, दही, छाछ, और जंगली फलों का प्रयोग होता है। यही मौसमी अनुकूलता भोजन को अधिक प्राकृतिक बनाती है। आज जब आधुनिक खान-पान का चलन बढ़ रहा है, उत्तराखण्ड का पारंपरिक भोजन अपनी शुद्धता और स्वास्थ्य-benefits के कारण फिर से लोकप्रिय हो रहा है। देशभर में आज ‘मंडुवा’, ‘झंगोरा’, ‘गहत’, ‘जखिया’, और ‘बुरांश’ के उत्पादों की मांग तेजी से बढ़ रही है। पहाड़ी महिलाओं के स्व-रोज़गार समूह (SHG) इन उत्पादों को बाजार तक पहुंचा रही हैं, जिससे स्थानीय अर्थव्यवस्था मजबूत हो रही है।
अंततः, उत्तराखण्ड का खान-पान पहाड़ की मिट्टी, प्रकृति, संस्कृति और जनजीवन का जीवंत प्रतिबिंब है। यह भोजन न केवल स्वादिष्ट है, बल्कि स्वास्थ्यवर्धक, पर्यावरण-संवेदनशील और स्थानीय संसाधनों पर आधारित है। उत्तराखण्ड का हर व्यंजन एक कहानी कहता है—संघर्ष की, सादगी की, पर्वतीय जीवन की, और उस गहरी संवेदनशीलता की जो इस हिमालयी राज्य की आत्मा है।







