
(राज शेखर भट्ट)
भारत के हृदय में स्थित हिमालय की गोद में बसा राज्य उत्तराखण्ड अपनी प्राकृतिक संपदा, आध्यात्मिक आस्था और वीरता के लिए प्रसिद्ध है। बर्फ से ढकी चोटियाँ, पवित्र नदियाँ, घने वन, और सादगी से भरा लोकजीवन इस राज्य की पहचान हैं। हर वर्ष 9 नवम्बर का दिन इस भूमि के लिए विशेष होता है, क्योंकि इसी दिन वर्ष 2000 में उत्तराखण्ड भारत का 27वाँ राज्य बना। यह केवल एक तिथि नहीं, बल्कि दशकों तक चले संघर्ष, बलिदान और जनआकांक्षाओं का परिणाम है।
उत्तराखण्ड राज्य स्थापना दिवस उस अदम्य जज़्बे का प्रतीक है जिसने पहाड़ के लोगों को अपनी अस्मिता के लिए संगठित किया और एक नये राज्य की नींव रखी। उत्तराखण्ड का इतिहास प्राचीन काल से अत्यंत गौरवशाली रहा है। वैदिक साहित्य में इसे केदारखण्ड और मानसखण्ड के नामों से उल्लेखित किया गया है। यहाँ की भूमि पर ऋषि-मुनियों ने तपस्या की और अनेक पवित्र नदियों का उद्गम हुआ।
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मध्यकाल में यहाँ कत्यूर, चंद, और बाद में गढ़वाल के शासकों ने शासन किया। 1815 में गढ़वाल क्षेत्र ब्रिटिश शासन के अधीन आ गया और स्वतंत्रता के बाद यह क्षेत्र उत्तर प्रदेश राज्य का हिस्सा बना। हालाँकि, प्रशासनिक दृष्टि से उत्तराखण्ड उत्तर प्रदेश का हिस्सा था, परंतु भौगोलिक, सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियों में अत्यधिक भिन्नता थी। पहाड़ी इलाकों की दुर्गमता, सीमित संसाधन और सरकारी उदासीनता ने यहाँ के लोगों के मन में अलग राज्य की आवश्यकता की भावना उत्पन्न कर दी।
अलग राज्य आंदोलन का उद्भव
- उत्तराखण्ड राज्य आंदोलन कोई अचानक हुई घटना नहीं थी, बल्कि यह कई दशकों के संघर्ष और उपेक्षा का परिणाम था।
- 1950 के दशक में ही बुद्धिजीवियों और युवाओं ने यह विचार व्यक्त किया कि हिमालयी क्षेत्र के विकास के लिए पृथक राज्य आवश्यक है।
- 1979 में प्रोफेसर देवसिंह बिष्ट, इंद्रमणि बडोनी, और अन्य जननेताओं ने मिलकर उत्तराखण्ड क्रान्ति दल (UKD) की स्थापना की, जिसने इस आंदोलन को दिशा दी।
- 1990 के दशक में यह आंदोलन व्यापक जनआन्दोलन का रूप ले चुका था।
- 2 अक्टूबर 1994 को मुज़फ़्फ़रनगर काण्ड की दुखद घटना ने इस आंदोलन को निर्णायक मोड़ दिया।
- सैकड़ों आंदोलनकारी शहीद हुए, लेकिन उनके बलिदान व्यर्थ नहीं गए।
अंततः, लंबे संघर्ष के बाद 9 नवम्बर 2000 को भारत की संसद ने उत्तर प्रदेश पुनर्गठन अधिनियम, 2000 पारित कर नया राज्य अस्तित्व में लाया — प्रारंभिक नाम “उत्तरांचल” रखा गया।
उत्तराखण्ड नाम का महत्व
राज्य का नाम “उत्तराखण्ड” ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। संस्कृत ग्रंथों में “उत्तराखण्ड” शब्द का उल्लेख हिमालय के उत्तरी भाग के लिए किया गया है, जो देवताओं की भूमि मानी जाती है। इसलिए 1 जनवरी 2007 को सरकार ने राज्य का नाम औपचारिक रूप से “उत्तराखण्ड” कर दिया, जो इस भूमि की सांस्कृतिक पहचान को सटीक रूप में व्यक्त करता है।
भौगोलिक स्वरूप और प्रशासनिक ढाँचा
उत्तराखण्ड का कुल क्षेत्रफल लगभग 53,483 वर्ग किलोमीटर है। राज्य दो प्रमुख मंडलों में विभाजित है —
- गढ़वाल मंडल
- कुमाऊँ मंडल
गढ़वाल में सात जिले — देहरादून, हरिद्वार, पौड़ी, टिहरी, उत्तरकाशी, रुद्रप्रयाग और चमोली।
कुमाऊँ में छह जिले — नैनीताल, अल्मोड़ा, बागेश्वर, पिथौरागढ़, चंपावत और ऊधमसिंह नगर।
राज्य की अस्थायी राजधानी देहरादून है, जबकि गैरसैंण (भराड़ीसैंण) को भविष्य की स्थायी राजधानी और ग्रीष्मकालीन राजधानी घोषित किया गया है।
संस्कृति और लोकजीवन
उत्तराखण्ड की संस्कृति उसकी आत्मा है। यहाँ की लोकसंस्कृति में गढ़वाली और कुमाऊँनी परंपराएँ झलकती हैं। लोकगीत जैसे — बेडू पाको बारो मासा, झोड़ा, छपेली, चाँचरी, थड्या — यहाँ के जनजीवन की सादगी और हर्ष को दर्शाते हैं। ढोल, दमाऊँ, रंठूली, और हुड़का जैसे लोक वाद्य यहाँ के संगीत का आधार हैं। यह राज्य धार्मिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। केदारनाथ, बद्रीनाथ, गंगोत्री, और यमुनोत्री जैसे चार धाम इसी राज्य में स्थित हैं, जो हर वर्ष लाखों श्रद्धालुओं को आकर्षित करते हैं। इसलिए उत्तराखण्ड को आदरपूर्वक “देवभूमि” कहा जाता है।
प्राकृतिक सौंदर्य और पर्यटन
- उत्तराखण्ड का सौंदर्य अद्वितीय है।
- यहाँ के पर्वत, घाटियाँ, नदियाँ और झीलें इसे धरती पर स्वर्ग जैसा बनाते हैं।
- नैनीताल, मसूरी, औली, चोपता, कौसानी, टिहरी झील, पिथौरागढ़ और हरिद्वार-ऋषिकेश जैसे स्थल विश्व प्रसिद्ध हैं।
- पर्यटन राज्य की अर्थव्यवस्था का प्रमुख आधार बनता जा रहा है, जिससे ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के अवसर बढ़े हैं।
- साथ ही, साहसिक पर्यटन (ट्रेकिंग, राफ्टिंग, स्कीइंग, पैराग्लाइडिंग आदि) भी यहाँ तेजी से विकसित हो रहा है।
विकास की चुनौतियाँ
- राज्य निर्माण के 25 वर्षों के पश्चात् भी अनेक चुनौतियाँ बनी हुई हैं।
- पलायन सबसे बड़ी समस्या है — रोजगार और शिक्षा की कमी के कारण लोग पहाड़ छोड़ रहे हैं।
- कृषि और पशुपालन पर निर्भर ग्रामीण अर्थव्यवस्था अब भी पिछड़ी हुई है।
- इसके अतिरिक्त, भूकंप, भूस्खलन और प्राकृतिक आपदाएँ यहाँ के जीवन को प्रभावित करती हैं।
फिर भी, उत्तराखण्ड ने शिक्षा, ऊर्जा उत्पादन, सड़क निर्माण, स्वास्थ्य और पर्यटन के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की है। सरकार और स्थानीय संगठन अब स्थानीय संसाधनों पर आधारित आत्मनिर्भर अर्थव्यवस्था के विकास की दिशा में कार्य कर रहे हैं।
राज्य स्थापना दिवस का उत्सव
हर वर्ष 9 नवम्बर को उत्तराखण्ड के सभी जिलों में राज्य स्थापना दिवस बड़े हर्ष और गर्व के साथ मनाया जाता है। राज्य स्तर पर मुख्य समारोह देहरादून या गैरसैंण में आयोजित होता है, जिसमें मुख्यमंत्री और राज्यपाल राज्य के शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। सांस्कृतिक झांकियाँ, लोकनृत्य, कवि सम्मेलन, पुरस्कार वितरण और विकास योजनाओं का उद्घाटन इस दिवस की शोभा बढ़ाते हैं। यह दिन हमें यह स्मरण कराता है कि राज्य केवल सीमाओं का नाम नहीं होता, बल्कि यह लोगों की आकांक्षाओं, संस्कृति और स्वाभिमान का प्रतीक होता है।
उत्तराखण्ड की उपलब्धियाँ
राज्य निर्माण के बाद से उत्तराखण्ड ने कई क्षेत्रों में प्रगति की है:
- शिक्षा: विश्वविद्यालयों और तकनीकी संस्थानों की संख्या में वृद्धि हुई है।
- ऊर्जा: जलविद्युत परियोजनाओं से राज्य “ऊर्जा प्रदेश” बनता जा रहा है।
- पर्यावरण संरक्षण: जैव विविधता और हिमालय संरक्षण के लिए कई योजनाएँ लागू हैं।
- महिला सशक्तिकरण: स्व-सहायता समूहों और महिला उद्यमों के माध्यम से महिलाओं की भागीदारी बढ़ी है।
- स्वास्थ्य: पर्वतीय क्षेत्रों में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों का विस्तार हुआ है।
उत्तराखण्ड राज्य स्थापना दिवस केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि आत्ममंथन का अवसर भी है — कि हम अपने राज्य को किस दिशा में ले जा रहे हैं। यह दिन हमें याद दिलाता है कि यह राज्य उन असंख्य लोगों की कुर्बानी का परिणाम है जिन्होंने अपने अधिकारों और पहचान के लिए संघर्ष किया। आज उत्तराखण्ड के सामने अवसर भी हैं और चुनौतियाँ भी। आवश्यकता है कि हम अपनी संस्कृति, पर्यावरण और संसाधनों को सँजोते हुए विकास की राह पर आगे बढ़ें।
“जय उत्तराखण्ड, जय देवभूमि — हम सबका गर्व, हमारी पहचान।”







