
(राज शेखर भट्ट)
भारतवर्ष अनेकता में एकता का अद्भुत उदाहरण है, जहाँ प्रत्येक राज्य अपनी विशिष्ट भौगोलिक, सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और सामाजिक पहचान रखता है। इन्हीं राज्यों में से एक है उत्तराखण्ड, जो अपनी प्राकृतिक सुंदरता, धार्मिक आस्था और वीरता की परंपरा के लिए प्रसिद्ध है। 9 नवम्बर 2000 का दिन भारतीय इतिहास में एक महत्वपूर्ण तिथि के रूप में अंकित है, क्योंकि इसी दिन उत्तराखण्ड भारत के 27वें राज्य के रूप में अस्तित्व में आया। इस दिन को प्रत्येक वर्ष “उत्तराखण्ड राज्य स्थापना दिवस” के रूप में अत्यंत हर्ष और गौरव के साथ मनाया जाता है।
उत्तराखण्ड के गठन का इतिहास लम्बे संघर्ष और जनआंदोलन से जुड़ा हुआ है। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद उत्तर प्रदेश राज्य का निर्माण हुआ, जिसमें हिमालयी क्षेत्र के पर्वतीय जिले — जैसे कि गढ़वाल और कुमाऊँ — सम्मिलित थे। लेकिन भौगोलिक कठिनाइयों, सामाजिक परिस्थितियों, विकास की असमानता और प्रशासनिक उपेक्षा के कारण पर्वतीय क्षेत्र के लोगों को अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता था।
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इन कठिनाइयों से त्रस्त होकर धीरे-धीरे “अलग राज्य” की मांग प्रबल होती गई। 1950 के दशक से ही इस क्षेत्र में अलग राज्य की भावना पनपने लगी थी। 1979 में उत्तराखण्ड क्रान्ति दल का गठन हुआ, जिसने इस आंदोलन को एक राजनीतिक रूप प्रदान किया।
1990 के दशक में यह आंदोलन और अधिक तीव्र हुआ। 2 अक्टूबर 1994 को मुज़फ़्फ़रनगर काण्ड जैसी दुखद घटनाओं ने आंदोलन को जन-जन का आंदोलन बना दिया। पूरे उत्तराखण्ड में गाँव-गाँव से लोग सड़कों पर उतर आए। महिलाओं, युवाओं और आम नागरिकों ने भी सक्रिय रूप से भाग लिया। अन्ततः वर्षों के संघर्ष, बलिदान और दृढ़ संकल्प के परिणामस्वरूप 9 नवम्बर 2000 को उत्तर प्रदेश पुनर्गठन अधिनियम के अंतर्गत उत्तराखण्ड राज्य अस्तित्व में आया।
राज्य का नामकरण और भौगोलिक स्थिति
प्रारम्भ में इस राज्य का नाम “उत्तरांचल” रखा गया था, जिसे बाद में 1 जनवरी 2007 को आधिकारिक रूप से “उत्तराखण्ड” नाम दिया गया — जो ऐतिहासिक और सांस्कृतिक दृष्टि से अधिक उपयुक्त था। उत्तराखण्ड भौगोलिक दृष्टि से अत्यंत विशिष्ट है। यह हिमालय की गोद में बसा राज्य है, जिसकी सीमाएँ उत्तर में चीन (तिब्बत), पूर्व में नेपाल, दक्षिण में उत्तर प्रदेश और पश्चिम में हिमाचल प्रदेश से लगती हैं। राज्य का कुल क्षेत्रफल लगभग 53,483 वर्ग किलोमीटर है।
राज्य को दो मुख्य मंडलों में बाँटा गया है —
- गढ़वाल मंडल
- कुमाऊँ मंडल
देहरादून राज्य की अस्थायी राजधानी है, जबकि गैरसैंण को गर्मी की राजधानी और भविष्य की स्थायी राजधानी घोषित किया गया है।
संस्कृति और परंपरा
उत्तराखण्ड को “देवभूमि” कहा जाता है क्योंकि यहाँ अनेकों प्राचीन मंदिर, तीर्थस्थल और धार्मिक स्थल हैं — जैसे केदारनाथ, बद्रीनाथ, गंगोत्री, यमुनोत्री इत्यादि। यहाँ की संस्कृति में लोकगीत, लोकनृत्य, पारंपरिक वेशभूषा, और पर्व-त्योहारों की झलक देखने को मिलती है। गढ़वाली और कुमाऊँनी लोकसंस्कृति की अपनी अलग पहचान है। लोकगीतों में जीवन के हर पहलू — जन्म, विवाह, प्रेम, श्रम, और प्रकृति — का मधुर वर्णन मिलता है। “झोड़ा, छपेली, चाँचरी, ढोल-दमाऊँ” जैसे लोकनृत्य यहाँ के लोकजीवन का हिस्सा हैं।
प्राकृतिक संपदा और पर्यटन
उत्तराखण्ड की पहचान उसकी अद्भुत प्राकृतिक संपदा से जुड़ी है। हिमालय की ऊँची चोटियाँ, हरे-भरे जंगल, नदियाँ, झीलें और झरने इसे स्वर्ग समान बनाते हैं। नैनीताल, मसूरी, औली, टिहरी झील, हरिद्वार, ऋषिकेश, चंपावत, अल्मोड़ा, पौड़ी आदि स्थान विश्वप्रसिद्ध पर्यटन स्थल हैं। यह राज्य न केवल आध्यात्मिक और प्राकृतिक पर्यटन के लिए, बल्कि साहसिक पर्यटन (Adventure Tourism) के लिए भी प्रसिद्ध है। ट्रैकिंग, राफ्टिंग, स्कीइंग, कैंपिंग जैसी गतिविधियाँ यहाँ के पर्यटन को और आकर्षक बनाती हैं।
विकास की दिशा में प्रयास
राज्य निर्माण के बाद उत्तराखण्ड ने शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क निर्माण, ऊर्जा उत्पादन, पर्यटन और ग्रामीण विकास के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की है। लेकिन भौगोलिक कठिनाइयाँ और पलायन जैसी समस्याएँ आज भी चुनौती बनी हुई हैं। सरकार और स्थानीय समुदायों द्वारा ग्रामीण क्षेत्रों में स्वरोज़गार, महिला सशक्तिकरण, जैविक खेती, और पर्यटन को बढ़ावा देने के प्रयास किए जा रहे हैं। गैरसैंण को राजधानी के रूप में विकसित करने की दिशा में भी कार्य जारी है ताकि राज्य का संतुलित विकास हो सके।
राज्य स्थापना दिवस का महत्व
प्रत्येक वर्ष 9 नवम्बर को पूरे राज्य में उत्तराखण्ड स्थापना दिवस मनाया जाता है। इस अवसर पर राज्य की राजधानी देहरादून सहित सभी जिलों में सांस्कृतिक कार्यक्रम, प्रदर्शनी, सम्मान समारोह और विकास योजनाओं की घोषणाएँ की जाती हैं। यह दिन उन वीर शहीदों को स्मरण करने का भी अवसर है, जिन्होंने राज्य निर्माण के लिए अपना जीवन न्योछावर किया। यह दिवस न केवल गौरव का प्रतीक है, बल्कि आत्ममंथन का अवसर भी है — कि राज्य को किन लक्ष्यों की ओर ले जाना है और किस प्रकार इसे आत्मनिर्भर, समृद्ध और सुखी बनाया जा सकता है।
उत्तराखण्ड राज्य की स्थापना केवल एक भौगोलिक घटना नहीं थी, बल्कि यह जनभावनाओं, संघर्ष और आत्मबलिदान का परिणाम थी। इस राज्य ने अपनी सांस्कृतिक समृद्धि, प्राकृतिक सौंदर्य और मानवीय मूल्यों से पूरे भारत को गौरवान्वित किया है। आज आवश्यकता है कि हम राज्य स्थापना दिवस के अवसर पर यह संकल्प लें कि हम उत्तराखण्ड को ऐसा राज्य बनाएँगे जहाँ विकास, शिक्षा, पर्यावरण संरक्षण और सामाजिक समानता के आदर्श साकार हों।
“जय उत्तराखण्ड – जय देवभूमि!”







